भारत तोड़ो गैंग के साथ कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा
धरना, प्रदर्शन, यात्राएं, पदयात्राएं, रैलियां, रोड शो इत्यादि लोकतंत्र के श्रृंगार हैं। लेकिन इनमें से किसी राजनीतिक कार्यक्रम की सफलता उसके पीछे के मकसद, नीतियों, विचारों, नेताओं के कद, पद, प्रभाव, व्यवहार, मेहनत और सूझ-बूझ जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करती है। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस की 'भारत जोड़ो यात्रा' पांच महीने तक मीडिया-सुर्खियां तो ज़रूर बटोर सकती है, राहुल गांधी के कई दृश्य और वक्तव्य भी वायरल हो सकते हैं, लेकिन इसकी योजना में ऐसा कुछ भी नया, अलग या विशिष्ट नहीं दिखाई दे रहा, जिससे कांग्रेस को विशेष लाभ मिल सके।

भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव में महज डेढ़ साल रह गये हैं, लेकिन पार्टी का प्रभाव क्षीण है और कांग्रेस में 2024 का चुनाव अकेले लड़ने की शक्ति बची नहीं है। गठबंधन में सहयोगियों से सम्मानजनक संख्या में सीटें मांगना भी मुश्किल होता जा रहा है। पार्टी के लिए परेशानी की बात यह भी है कि अनेक प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रपों ने प्रधानमंत्री पद के लिए जहां अपने-अपने नाम आगे कर दिये हैं, वहीं राहुल गांधी का कोई नामलेवा तक नहीं। नामलेवा हो भी तो कैसे? जब अपनी ही पार्टी के अनेक लोग उन्हें नेता मानने को तैयार नहीं हैं, तो बाहरी कौन मानेगा उन्हें?
गुलाम नबी आज़ाद समेत हाल-फिलहाल जितने भी वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस से आज़ादी पाई है, लगभग सभी ने राहुल गांधी के खिलाफ ही भड़ास निकाली है। इसलिए राहुल गांधी की नये सिरे से ब्रांडिंग करने और पार्टी में असंतोष पर काबू पाने की जरूरत तो है ही, विपक्षी दलों को भी यह संदेश देना है कि तमाम कमज़ोरियों के बावजूद एक वही राष्ट्रीय पार्टी है, जो भाजपा को किसी हद तक चुनौती दे सकती है, ताकि गठबंधन सहयोगियों के बीच उसकी बार्गेनिंग कैपेसिटी कुछ बची रहे। हालांकि यह भी उल्टा पड़ सकता है क्योंकि कांग्रेस यदि अपनी ताकत बढ़ाने के प्रयास करेगी, तो सहयोगी क्षेत्रीय दल भी उसे खतरे के रूप में देखना शुरू कर देंगे, क्योंकि ये सभी दल कांग्रेस के कमज़ोर होने से ही मज़बूत हुए हैं।
भाजपा की 'एकता यात्रा' की नकल
कांग्रेस की इस पहल में मौलिकता का अभाव भी दिखाई दे रहा है। 'भारत जोड़ो यात्रा' के लिए उसने 117 लोगों की सूची जारी की है, जो राहुल गांधी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक लगभग 3570 किलोमीटर की दूरी को 150 दिनों में पैदल ही नापेंगे। यात्रियों के हाथों में कांग्रेस पार्टी का झंडा नहीं, बल्कि तिरंगा होगा।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी तिरंगे से लगभग दूर हो गई थी, इसलिए उसका पुनः तिरंगा थामना अच्छी बात है, लेकिन यह अच्छी बात भी भारतीय जनता पार्टी से प्रेरित लग रही है। सबसे पहले 1991-92 में भाजपा ने ही अपने तत्कालीन अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'एकता यात्रा' निकाली थी। इसे तिरंगा यात्रा के नाम से भी जाना गया, क्योंकि यात्रा के अंत में मुरली मनोहर जोशी ने श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था।
हाल में आजादी के अमृत महोत्सव के तहत भी मोदी सरकार ने 'हर घर तिरंगा अभियान' चलाया था। दिल्ली में लाल किला से विजय चौक तक तिरंगा बाइक रैली भी निकाली गई थी, जिसका बहिष्कार करने के कारण बाद में कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा।
इस तरह देखें तो जैसे भाजपाई हिन्दुत्व के दबाव में राहुल गांधी जनेऊधारी ब्राह्मण बनकर माथे पर चंदन घिसकर मंदिर-मंदिर यात्राएं करने लगे, ठीक उसी प्रकार अब भाजपाई राष्ट्रवाद के दबाव में तिरंगा यात्रा निकालने को भी विवश हो गये हैं।
केजरीवाल के ठगे राहुल के सगे
ऐसा लगता है कि भाजपा की नकल करने के साथ ही कांग्रेस आम आदमी पार्टी के मॉडल का भी अनुकरण करना चाहती है। इसीलिए इस यात्रा में उसने ऐसे लोगों का भी साथ लिया है, जो अन्ना आंदोलन में शामिल रहे और आम आदमी पार्टी बनने के बाद अरविंद केजरीवाल द्वारा ठगे गये। इनमें योगेंद्र यादव, अरुणा राय, मेधा पाटकर और पीवी राजगोपाल समेत लगभग 150 सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। समझना मुश्किल नहीं कि कांग्रेस आज इतनी कमज़ोर हो चुकी है कि एक यात्रा निकालने के लिए भी उसे सिविल सोसाइटी के कंधों पर सवार होना पड़ा है। शायद यह उसके साथ विश्वसनीयता के संकट को अधिक रेखांकित करता है, जिससे निपटने के लिए वह बीच-बीच में कुछ लेखकों, कलाकारों और इतिहासकारों का इस्तेमाल करती हुई भी दिखाई देती है।
कमज़ोर नैतिक और वैचारिक स्थिति
कांग्रेस ने 'भारत जोड़ो यात्रा' की वेबसाइट पर मुख्य रूप से चार नारे जारी किये हैं- 1. नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो; 2. महंगाई से नाता तोड़ो, मिलकर भारत जोड़ो; 3. बेरोज़गारी का जाल तोड़ो, भारत जोड़ो; और 4. संविधान बचाएंगे, मिलकर भारत जोड़ेंगे। इन चारों नारों में भी केवल 'नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो' ही किसी हद तक 'भारत जोड़ो यात्रा' के शाब्दिक अर्थ को अभिव्यक्त करता है। कांग्रेस की सरकारों में भी महंगाई और बेरोज़गारी ने लोगों को कम परेशान नहीं किया है। इसी तरह, देश में इमरजेंसी लगाने से लेकर धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए 93 चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने का रिकॉर्ड तो कांग्रेस के नाम है। फिर किस मुंह से वह संविधान बचाने की बात करेगी?
इसलिए ऐसा लगता है कि महंगाई, बेरोज़गारी और संविधान-सुरक्षा जैसे मुद्दे केवल आवरण पर सजाने के लिए हैं, केंद्रीय मुद्दा तो हिन्दू-मुस्लिम और कथित नफरती माहौल ही रहने वाला है। जिस तरह से पहले भी 'भगवा आतंकवाद' का छद्म नैरेटिव गढ़ने की कोशिशें की गई थीं, एक बार फिर से इस कथित नफरती माहौल के लिए हिन्दू संगठनों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।
खबरों के मुताबिक, यात्रा के मूल विचार को व्यक्त करते हुए राहुल गांधी ने कहा भी है कि वे लोगों को बताएंगे कि कैसे एक तरफ आरएसएस-भाजपा की नफरत फैलाने वाली विचारधारा है और दूसरी तरफ कांग्रेस की सबको साथ जोड़ने वाली विचारधारा है। यात्रा आयोजन समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह द्वारा ट्वीट किए गये एक विवादास्पद वीडियो में भी कुछ युवकों को भगवा झंडों और तलवारों के साथ दिखाया गया है। इतना ही नहीं, 7 सितंबर को यात्रा शुरू होने के दिन देश के हर ब्लॉक में 'सर्वधर्म प्रार्थना' का आयोजन किया जाएगा।
मतलब, इस यात्रा के दौरान भी कांग्रेस कोई नई बात नहीं करते हुए धर्मनिरपेक्षता-संबंधी उन्हीं विचारों को दोहराने वाली है, जिन्हें एकपक्षीय, मुस्लिम तुष्टीकरण पर आधारित और अन्यायपूर्ण मानते हुए जनता ने बार-बार खारिज कर दिया है। यहां तक कि खुद मुसलमानों के बीच भी धर्मनिरपेक्षता-संबंधी उसके इन विचारों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। यदि होती, तो ज्यादातर राज्यों में मुस्लिम समुदाय दूसरी पार्टियों को वोट नहीं दे रहे होते।
देश तोड़नेवाले देश कैसे जोड़ेंगे?
कांग्रेस यदि आरएसएस-भाजपा पर नफरत फैलाने के आरोप लगाती है, तो उसे यह भी जवाब देना चाहिए कि 1946 में डायरेक्ट एक्शन का एलान किसने किया था और किसकी प्रेस कांफ्रेंस के बाद किया था, जिसके कारण कलकत्ता समेत देश के अनेक हिस्सों में फैले दंगों में हज़ारों लोगों की जान गई? किसकी फैलाई नफरत से 1947 में फिर से भयावह दंगे हुए, लाखों लोग मारे गये और देश का विभाजन हुआ?
यदि उस नफरत में हिन्दुओं या हिन्दू संगठनों का भी हिस्सा था, तो जैसे पाकिस्तान मुस्लिम देश बना, वैसे ही भारत भी हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं बन गया? जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को लगभग निर्मूल कर दिया गया, वैसा भारत में क्यों नहीं हुआ? कैसे 1951 के 9.8 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते 2011 तक भारत में मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत हो गई थी? कांग्रेस को बताना चाहिए कि किसकी फैलाई नफरत के कारण 1984 में 3000 से ज्यादा सिखों का नरसंहार किया गया, फिर भी राजीव गांधी ने कहा कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है? जब कांग्रेस के सामने दंगों का इतिहास रखा जाएगा, तो तीन उंगलियां खुद उसी की नीतियों की तरफ होंगी।
कांग्रेस यदि कहती है कि भाजपा-आरएसएस के लोग देश तोड़ रहे हैं और वह देश को जोड़ रही है, तो उससे पूछा जाएगा कि 1948 में जब कश्मीर ने पाकिस्तान से अपने बचाव के लिए भारत से गुहार लगाई, तो उसी समय भारत में उसे पूरी तरह क्यों नहीं जोड़ा गया? अक्साइ चिन किसकी गलतियों से भारत से टूट गया? गोवा को आजादी के 15 साल बाद तक भी भारत से क्यों नहीं जोड़ा गया? 1971 के युद्ध में पश्चिमी पाकिस्तान के 5000 वर्ग मील पर कब्जा कर लेने के बावजूद उसे भारत से क्यों नहीं जोड़ा गया?
ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में पार्टी ने जिन 117 नेताओं के सहारे 'भारत जोड़ो यात्रा' का एलान किया है, उनमें से ज्यादातर जूनियर तो हैं ही, उनकी पहचान भी नहीं है। इससे जनता में तो आकर्षण कम रहेगा ही, पार्टी के बचे-खुचे वरिष्ठ नेता भी बिदक जाएंगे। विडंबना देखिए कि 'भारत जोड़ो यात्रा' के लिए सबसे अधिक जिस कन्हैया कुमार का प्रचार किया गया है, उन पर 2016 में जेएनयू में भारत तोड़ने के कार्यक्रम में हिस्सा लेने का आरोप है। इस प्रकार, 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान बार-बार झलकेगा कि कांग्रेस आज नेता, नीति और नैतिकता के धरातल पर कितनी कमज़ोर हो चुकी है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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