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Government run Gaushala: गाय की बर्बादी का जरिया बन रहीं सरकारी गौशालाएं

जैसे जैसे गौशालाएं बढ़ती गयी हैं, गाय का महत्व समाज से खत्म होता जा रहा है। अब उससे भी आगे बढ़कर सरकारी गौशालाएं बनायी जा रही हैं। गौ संरक्षण की राजनीति के लिए यह फायदेमंद सौदा तो हो सकता है लेकिन गाय के लिए नहीं।

condition of cows are poor in government Gaushala reality of Cowshed

Government run Gaushala: मध्य प्रदेश के एक समाचार पत्र में प्रकाशित जानकारी के अनुसार अखिल भारतीय सर्वदलीय गौरक्षा महाभियान समिति के गौरव मिश्रा द्वारा पशुपालन विभाग से आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से यह पता चला है कि भोपाल के पास बने जीव दया गौशाला से एक वर्ष में 2,131 गायें गायब हो गई हैं। पशुपालन विभाग की मानें तो गौशाला में जनवरी, 2022 में 1,961 गायें थीं। नगर निगम भोपाल ने एक वर्ष में यहां 2,236 गाय भेजीं जिनमें से 116 गायों की मृत्यु हो गई। इस गौशाला का संचालन करने वाली निर्मला शांडिल्य भाजपा नेत्री हैं जिन्हें भारी विरोध के चलते पहले तो गिरफ्तार किया गया किन्तु उनकी बढ़ती आयु का हवाला देकर तुरंत जमानत भी दे दी गई। हालांकि भाजपा नेत्री पर पशु क्रूरता अधिनियम को लेकर भी एफआईआर दर्ज हुई है। भाजपा सरकार इस पूरे मामले को फर्जी बता रही है वहीं कांग्रेस से लेकर अन्य हिन्दू संगठन भाजपा सरकार को घेरते जा रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

भोपाल की बैरसिया तहसील के बसई गाँव में बीते 20 वर्षों से संचालित हो गौशाला गोवंश के लिये कब्रगाह बन गई है। जब गायों के मृत मिलने और गायब होने की खबर आई तो ज्ञात हुआ कि शासन से लाखों रुपये के अनुदान के बावजूद गायों को चारा-पानी नहीं दिया जा रहा था। भीषण ठंड से बचाव के भी साधन नहीं थे। आक्रोशित ग्रामीणों की उपस्थिति में जब कलेक्टर अविनाश लवानिया गौशाला पहुँचे तो वहाँ 67 गायों के शव पाए गए। कलेक्टर ने तत्काल संचालन समिति के विरूद्ध एफआईआर दर्ज करवाते हुये समिति को गौशाला के संचालन से बेदखल कर दिया है। इस मामले में मध्य प्रदेश गोसंवर्धन आयोग के अध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरी ने भी कलेक्टर से रिपोर्ट तलब की है।

खानापूर्ति है सरकारी निरीक्षण और व्यवस्था

मध्य प्रदेश में गौ संरक्षण के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और ही है। प्रदेश में गैर सरकारी संगठनों द्वारा 628 गोशालाएं संचालित की जा रही हैं जबकि लगभग 2,200 गोशालाएं मनरेगा के माध्यम से बनी हैं जिनका संचालन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होता है। मध्य प्रदेश गोसंवर्धन आयोग प्रति गाय प्रतिदिन बीस रुपये के हिसाब से संस्थाओं को अनुदान देता है। जिला स्तरीय समिति के अध्यक्ष कलेक्टर होते हैं और पशुपालन विभाग के सहायक संचालक उसके सदस्य रहते हैं जो निरीक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं।

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आयोग द्वारा भी समय-समय पर गौशालाओं का अवलोकन किया जाता है किन्तु ऐसा लगता है मानो यह सारा उपक्रम मात्र कागजी है और इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। यदि निरीक्षण की व्यवस्था कड़ी और नियमित होती तो गौशाला में न तो अनियमिताएँ मिलती और न ही गायों की मृत्यु होती।

इसके अलावा अनियमिताओं से परे ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां गाजे-बाजे के साथ गौशाला का उद्घाटन किया गया किन्तु इसके बाद वहां गोवंश ढूंढने से भी नहीं मिलता। मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर की इछावर तहसील के आमला रामजीपुरा ग्राम में 37 लाख 85 हजार रुपये की लागत से भोलेनाथ गौशाला का निर्माण किया गया जिसका उद्घाटन 2021 में किया गया किंतु आज भी यहां कोई गोवंश नहीं है। सभी निर्माण कार्यों पर ताले पड़े हुये हैं।

गौशाला नीति में परिवर्तन भी दुर्दशा की जिम्मेदार

हाल ही में मध्य प्रदेश में गौशाला की नीतियों को लेकर बड़ा बदलाव हुआ है। अब सरकार की बनाई हुई गौशालाओं का संचालन एनजीओ करेंगे। गोपालन एवं पशु संवर्धन आयोग के स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरी के अनुसार गोवंश चलाना सरकार का काम नहीं है इसलिए सरकार सिर्फ अपने हिस्से का काम करेगी।

दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश में 1,000 गौशालाएं बनवाने की घोषणा की थी। सत्ता परिवर्तन के पश्चात मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 2,000 गौशालाएं बनवाने की घोषणा की जिनमें से अब तक 1,760 गौशाला ही अस्तित्व में आई हैं। इसके साथ ही ग्राम पंचायतों को 5 एकड़ जमीन में गौशालाओं की स्थापना करके उसके संचालन की जिम्मेदारी की बात भी सामने आई थी किंतु इनके जमीन पर उतरने से पहले ही नियमों में बदलाव हो गया और गौशालाओं की दशा बिगड़ती गई।

भाजपा शासित राज्य बैकफुट पर

भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हिंदुत्व, गाय और गंगा पर राजनीति करती रही हैं और ऐसा माना जाता है कि इनके शासनकाल में हिंदू हितों से जुड़े मुद्दे प्राथमिकता से हल होते हैं किन्तु हाल की कुछ घटनाएं कहीं ओर इशारा कर रही हैं।

सितंबर, 2022 में गुजरात के बनासकांठा में गौशाला संचालकों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए जिले भर में गौशालाओं की 10,000 से अधिक गायों को सड़कों पर छोड़ दिया था। दरअसल, गौशाला संचालकों को गुजरात सरकार ने मार्च, 2022 में गौशालाओं को चलाने के लिए 500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने का ऐलान किया था किन्तु 7 महीने बीत जाने के बाद भी उन्हें राशि नहीं दी गई थी। इस मामले में विरोध-प्रदर्शन कर रहे साधु-संतों को भी गुजरात सरकार ने गिरफ्तार किया था।

इसी प्रकार जनवरी, 2023 में हरियाणा के करनाल की एक गौशाला में 45 गायों की मौत होने का मामला सामने आया था। ऐसा दावा किया गया कि चारा खाने के बाद गौवंश की तबियत खराब हुई और 44 गायों और एक बैल ने दम तोड़ दिया। गौशाला के प्रधान के अनुसार गौवंश के लिए यह चारा उत्तर प्रदेश की एक मंडी से मंगवाया गया था। ऐसी आशंका है कि वह चारा विषाक्त था। वहीं उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में 15,000 से अधिक संरक्षित गोवंशों की संख्या है और बीते 6 महीने में करीब 500 से ज्यादा गोवंशों की मृत्यु अनियमिताओं तथा कड़ाके की ठंड से हो चुकी है। गोवंश का यही हाल अमेठी, भदोही, महाराजगंज आदि जिलों में भी है।

कुल मिलाकर भाजपा सरकारें गायों के मुद्दे पर अब सवालों के घेरे में आ रही हैं और उनका गौ-प्रेम बस राजनीति साधने का माध्यम बनता जा रहा है। इसके उलट राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा गौशालाओं को प्रति गाय 50 रुपये का अनुदान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री द्वारा गोवंश के संरक्षण तथा गो-उत्पाद के प्रयोग ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन राज्यों की पहल से गाय किसान के लिए घाटे का सौदा बनने की बजाय लाभ का जरिया बन रही है।

भाजपा सरकारें गौशाला की राजनीति करने की बजाय जनता में गाय के महत्व को स्थापित करने की दिशा में नीति निर्धारित करें तो शायद उसका अधिक लाभ होगा। वरना सरकारी गौशाला से तो गाय की बर्बादी होनी तय है। फिर वह चाहे उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश। सरकारी गौशालाएं सिर्फ सरकारी खानापूर्ति और ठेकेदारों की कमाई का जरिया बन रही हैं। गाय को इन गौशालाओं से कोई लाभ नहीं मिल रहा है।

यह भी पढ़ें: भारत के इस पड़ोसी देश ने इजाद की क्लोन की गई 'सुपर गाय', जो दे सकती है 1 लाख लीटर दूध

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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