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Love Jihad: शोर हर ओर, समाधान पर नहीं जोर

Love Jihad: वर्ष 2014 में झारखंड की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी तारा शाहदेव के प्रेम विवाह का मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था। यद्यपि वह अत्याचारों और यातनाओं के दौर से बच गईं और बाहर आ गईं, परन्तु जिस तरह से उनका मामला सुर्ख़ियों में आया था, उसके कारण जानने के प्रयास नहीं किये गये। मसलन रंजीत कुमार उर्फ़ रकीबुल हसन ने ऐसा जाल क्यों बिछाया था? इसके पीछे कौनसी मानसिकता काम कर रही थी? घटना के सामने आने के बाद रकीबुल हसन के साथ क्या हुआ? अदालत किस नतीजे पर पहुंची? रकीबुल हसन ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपना गवाह क्यों बनाया है?

यह मामला जब सामने आया था, तब लोगों को पहली बार संज्ञान में आया था कि ऐसा भी होता है। चूंकि तारा शाहदेव एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थी, तो जाहिर है कि मीडिया ने उनके मामले को, उनकी पीड़ा को तवज्जो दी और कई दिनों तक मीडिया में यह चलता रहा कि कैसे रंजीत कुमार बनकर रकीबुल हसन ने उनसे शादी की और फिर बाद में कैसे उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया। उन्हें कुत्ते से कटवाया गया और उनके साथ मारपीट भी की जाती थी। किसी तरह तारा की जान बची और वह रंजीत कुमार उर्फ रकीबुल हसन के जाल से छूट सकी थी।

concern on Love Jihad cases murdered of girls in different states of india

फिर भी मीडिया ने इसे एक प्रेम प्रसंग वाला मामला बनाकर रख दिया। इस बात की तह तक जाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि दरअसल जिसे लव-जिहाद कहा जा रहा है, वह और कुछ नहीं, लड़की की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान नष्ट करने का प्रयास है। यह परोक्ष रूप से अन्य सभ्यताओं पर बर्बरता पूर्ण अतिक्रमण और आक्रमण है। इस बात पर विमर्श ही नहीं हुआ कि क्यों एक तारा शाहदेव का धर्म परिवर्तन करने के लिए इतना बड़ा जाल बिछाया गया?

एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी द्वारा धर्म बदलकर अंतर्धार्मिक विवाह का असर युवा पीढ़ी पर पड़ता और फिर अन्य लड़कियां भी प्रेरित होती जातीं कि दूसरे धर्म में निकाह कोई टैबू नहीं है। यदि यह कथित प्यार सच्चा है तो फिर धर्म परिवर्तन का हठ क्यों? यह जिद्द क्यों? यह विषय न ही उतना साधारण है जितना इसे चर्चा करने वालों ने बना दिया है, और न ही उतना जटिल जितना इसका समाधान खोजने वालों ने बना दिया है। बस प्रश्न और समस्या की प्रवृत्ति को ही खोजने और टटोलने का सारा खेल है।

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी की नेता पंकजा मुंडे ने यह बयान देकर सभी को चौंका दिया कि प्यार में कोई दीवार नहीं होती और लव जिहाद जैसा कोई भी एजेंडा मोदी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इस पर विवाद आरम्भ हो गया। परन्तु यह सत्य है कि लव जिहाद जैसा कोई शब्द या अवधारणा है ही नहीं! यह केवल जिहाद ही है। जिहाद का कोई कुछ भी अर्थ निकाले, परन्तु यह गैर-इस्लामिक लड़कियों की धार्मिक पहचान पर होने वाला सबसे बड़ा आक्रमण है। उम्र कोई भी हो सकती है, वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो सकती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। योजना सिर्फ इतनी है कि गैर इस्लामिक लड़की की धार्मिक पहचान नष्ट करके उसे नयी इस्लामिक पहचान दिया जाए।

इसके लिए भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में गैर-इस्लामिक लड़कियों को ग्रूम किया जाता है। ऐसी तमाम घटनाएं इंटरनेट पर मौजूद हैं। तमाम उदाहरण मौजूद हैं, जो इस पूरे मॉड्यूल को परत दर परत बताते हैं। हाल ही में जब ग्रीस में ऐसी घटनाएं हुई थीं, तो वहां की मीडिया ने भी भारत का ही उदाहरण देते हुए लिखा था कि जैसे भारत में नाम बदलकर लड़कियों की धार्मिक पहचान नष्ट करने का कार्य मुस्लिम समाज के कुछ युवक कर रहे हैं। ग्रीस में भी पाकिस्तानी युवक ऐसी हरकतें वहां की लड़कियों के साथ कर रहे हैं।

पाकिस्तान में तो हिन्दू लड़कियों का अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन दैनिक स्तर पर हो ही रहा है। भारत में भी उत्तराखंड से लेकर मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि हर प्रान्त में ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें यदि कोई प्रतिष्ठित नाम सम्मिलित है तो कुछ अधिक समय तक चर्चा होती है, नहीं तो साधारण सी चर्चा "एक और लव जिहाद का मामला सामने आया" कहकर इतिश्री कर ली जाती है।

जब दिल्ली में साहिल के हाथों साक्षी की हत्या जैसा मामला सामने आता है तो कुछ दिनों तक चर्चा होती है, परन्तु उस घृणा पर चर्चा नहीं होती, जो उस लड़की के धार्मिक अस्तित्व से होती है। क्रूरता पर बात होती है, समाज के उत्तरदायित्व पर बात होती है, लोग तमाशबीन रहे उस पर बात होती है, पुलिस पर बात होती है, मगर जिस पर बात होनी चाहिए, उस पर नहीं होती कि आखिर गैर-मुस्लिम लड़कियों के धार्मिक अस्तित्व से इतनी घृणा का कारण क्या है? यही वह बिंदु है जिस पर बात होनी चाहिए कि क्यों किसी विधायक रूमीनाथ को भी मजहबी जाल में फंसाया जा सकता है और पति और बच्ची की चिंता किए बिना रूमीनाथ जैकी जाकिर के इश्क में रबिया सुल्ताना बन सकती है और बिना पति को तलाक दिए जैकी से निकाह कर सकती है?

विधायक रूमीनाथ हों या प्रगतिशील लेखिका कमला सुरैया, ये महिलाएं उन विवश महिलाओं जैसी नहीं थीं, जिन्हें बहला फुसला लिया जाता। लेकिन ये भी अगर किसी मुस्लिम के प्रेम में गयीं तो अपनी धार्मिक मान्यता को त्याग कर नयी पहचान धारण करनी पड़ी। असम में भारतीय जनता पार्टी की एक विवाहित महिला नेता की हत्या भी इन दिनों चर्चा में है, जिसमें पुलिस का कहना है कि उनका अफेयर हसनूर इस्लाम के साथ था, जिसमें झगड़ा हुआ और उसने उनकी हत्या कर दी। वहीं भाजपा नेता के पति का कहना है कि पुलिस आरोपी को बचाने के लिए मामले को गलत रूप दे रही है।

झारखण्ड की अंकिता शर्मा हो या हरियाणा की निकिता तोमर, या फिर दिल्ली की साक्षी या ऐसी तमाम लड़कियां जो अब अपनी कहानी बताने के लिए जीवित नहीं हैं कि कैसे उनके धार्मिक अस्तित्व से घृणा करने वालों ने उनका जीवन छीन लिया। इसके पीछे की मानसिकता पर जो सामाजिक विमर्श होना चाहिए वह एक वर्ग तक सिमटा हुआ है। कुछ लोग इसे कानून व्यवस्था की समस्या मानकर दरकिनार करना चाहते हैं। तो क्या यह मात्र कानूनी विषय है? यदि कानूनी विषय होता तो इतने क़ानून बनने के बाद इसमें कमी क्यों नहीं आ रही है? जिस उत्तराखंड के पुरोला कस्बे की देशभर में चर्चा हुई और उसे गलत ठहराने का प्रयास किया गया उस उत्तराखंड में ही लव जिहाद के इस साल 48 मामले दर्ज हुए हैं।

सारे शोरगुल के बीच अब इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि अगर ये समस्या है तो इसका समाधान क्या है? क्या कानून बनाने से ही काम हो जाएगा या फिर इसे लेकर सघन सामाजिक जागरण चलाने की जरूरत है जिसमें मुख्य रूप से महिलाओं को शामिल करना सबसे ज्यादा जरूरी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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