'क्लाईमेट एक्शन' की गारंटी क्यों नहीं देती सरकार?
"रोजगार गारंटी, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, शिक्षा की गारंटी, स्वास्थ्य की गारंटी", आपने अपनी सरकारों और उनके नुमाइंदों से इन जैसी शब्दावलियों को जरूर सुना होगा। लोकतंत्र में ये मुद्दे 'पीपुल्स च्वाइस' के तहत आते हैं क्योंकि इनसे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। इसीलिए सरकारें इनका वादा करने से हिचकती भी नहीं हैं। लेकिन क्या आपने सुना है कि किसी सरकार ने अपनी जनता के सामने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने की गारंटी ली है? शायद नहीं। आम तौर पर सरकारों के जेहन में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा बड़े सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का मसला भर है। जलवायु परिवर्तन को कभी जनता का मुद्दा नहीं समझा गया है।

हालांकि यूएन की नई रिपोर्ट इस बावत सरकारों की सोच बदल सकती है। जलवायु परिवर्तन जनता को प्रभावित करने वाला विषय है और बिजली-सड़क-पानी-रोजगार की तरह उसके लिए भी अपने एक्शन पर जनता का विश्वास जीतना कितना जरूरी है, यूएन की ये रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है। यूएनडीपी ने जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के पहले और सबसे बड़े पब्लिक पोल में पाया है कि 64% लोग जलवायु परिवर्तन को वैश्विक आपात स्थिति मानते हैं। 27 जनवरी 2021 को प्रकाशित हुई रिपोर्ट 50 देशों के 12 लाख लोगों के बीच हुए सर्वे पर आधारित है। इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया में यूएनडीपी के एडमिनिस्ट्रेटर एचिम स्टेनर ने कहा है कि, "सर्वे का नतीजा बताता है कि त्वरित क्लाइमेट एक्शन को दुनिया भर की सभी राष्ट्रीयताओं, उम्र, लिंग और शैक्षणिक स्तरों वाले लोग आम तौर पर समर्थन करते हैं।"

जलवायु परिवर्तन का विषय जनसंवाद का विषय नहीं रहा है, फिर भी जनता के बीच इसकी स्वीकृति बताती है कि कहीं न कहीं चेतन-अवचेतन में जलवायु परिवर्तन का असर लोगों पर बेहद गंभीर है।
28 दिसंबर 2020 को प्रकाशित क्रिश्चियन एड नाम की संस्था की रिपोर्ट - 'काउंटिंग द कॉस्ट 2020: ए ईयर ऑफ क्लाइमेट ब्रेकडाउन' ने बंगाल की खाड़ी से उठे तूफान अम्फान और जून से अक्टूबर के बीच भारत के अलग-अलग हिस्सों में आई बाढ़ को 2020 में दुनिया की 10 बड़ी ऐसी जलवायु घटनाओं में रखा है जिनसे सबसे ज्यादा आर्थिक चोट पहुंची। क्रिश्चियन एड की रिपोर्ट में बतायी गई 2020 में दुनिया की सबसे नुकसानदेह 10 जलवायु घटनाओं से करीब 10 लाख करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर चपत पड़ी है। रिपोर्ट में नुकसान का ज्यादातर आकलन बीमा की हुई चीजों के नुकसान पर आधारित है, इसका मतलब ये है कि वास्तविक आर्थिक नुकसान इससे कहीं ज्यादा होगा। रिस्क-सॉल्यूशंस देने वाली कंपनी Aon के मुताबिक प्राकृतिक आपदाओं से 2020 में 268 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है, जिनमें बीमा की हुई चीजों का नुकसान 97 अरब अमेरिकी डॉलर है।

जलवायु परिवर्तन से जनता पर पड़ रहे असर को लगातार वैश्विक तापमान बढ़ोत्तरी से भी समझ सकते हैं। अमेरिका के एनओएए का विश्लेषण कहता है कि 2020 रिकॉर्डेड तौर पर धरती का दूसरा सबसे गर्म वर्ष बन गया है। इसी के साथ 2019 तीसरा सबसे गर्म वर्ष के तौर पर गिना जाएगा। धरती के 7 सबसे गर्म वर्ष 2014 के बाद से ही दर्ज किए गए हैं। 2020 पृथ्वी का लगातार 44वां वर्ष रहा जिसका तापमान 20वीं सदी के औसत से ज्यादा रहा।
नवंबर 2021 में ग्लासगो (स्कॉटलैंड) में 26वां यूनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कॉन्फेरेंस (COP26) होने वाला है। इसके मद्देनजर जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर की सरकारें नई रणनीतियां अभी से बना रही होंगी। लेकिन इन रणनीतियों को व्यापक तौर पर जनता के मुद्दे के तौर पर देखे बिना सरकारों के लिए ये किसी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संभावनाओं से इतर नहीं साबित हो सकेंगी। जिस दिन जलवायु परिवर्तन सरकारी कल्याण की योजनाओं में गिना जाने लगेगा, वहां से ही क्लाइमेट एक्शन की सच मायने में शुरुआत हो सकेगी। COP26 अगर सरकारों से क्लाइमेट एक्शन की गारंटी स्कीम बनवा सके, तो उसकी सफलता सामने आएगी।
(लेखक अभय श्रीवास्तव टीवी पत्रकार हैं)












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