Silk Road Week: चीन का सिल्क रोड वीक समारोह और भारत की चिंताएं
Silk Road Week: आज यानि 12 जुलाई से चीन में 'सिल्क रोड वीक' शुरू होने जा रहा है। हांगझोऊ में स्थित नेशनल सिल्क म्यूजियम में यह आयोजन होगा। चीन की ओर से कहा जा रहा है कि इस समारोह का उद्देश्य सिल्क रोड के इतिहास को करीब से जानना और व्यापारिक व सांस्कृतिक साझेदारी को बढ़ावा देना है। अगर सिल्क रोड के इतिहास की बात करें, तो निश्चित रूप से इसने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के कई देशों को आपस में जोड़ा, सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान हुआ, लेकिन इस रूट पर किसी एक देश का नियंत्रण नहीं था। व्यापारियों ने यह रूट बनाया, जो कोई एक निश्चित मार्ग नहीं था, कई-कई उपमार्ग थे, जो उजाड़ इलाकों से गुजरते थे। तो क्या अब फिर से कोई ऐसा कोई रूट बनना संभव है?
सिल्क रोड वीक का चौथा संस्करण
हम जानते हैं कि सिल्क रूट को प्राचीन चीनी सभ्यता के व्यापारिक मार्ग के रूप में जाना जाता है। चीन के सिल्क व्यापारियों ने ही इसे यह नाम दिया था। धीरे-धीरे इस रूट का इतना विस्तार हुआ कि यह रोमन साम्राज्य तक फैल गया। ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए सिल्क रूट के चांगान तियान शान कॉरिडोर को 2014 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। पांच हजार किलोमीटर का यह कॉरिडोर चीन, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान तक फैला है।

चीन के मुताबिक इसी को सेलिब्रेट करने के लिए 2020 से सिल्क रोड वीक मनाना शुरू किया गया। नेशनल सिल्क म्यूजियम के निदेशक जी जियाओफेन के मुताबिक इस साल सिल्क रोड वीक का चौथा संस्करण आयोजित होगा, जिसकी थीम 'द सिल्क रोड्स: लॉन्ग रोड्स एंड म्युचुअल गोल्स' है। उन्होंने कहा, हम रेशम उत्पादन और रेशम संस्कृति को बढ़ावा देना जारी रखेंगे और दुनिया भर में शांति, सहयोग, आपसी सीख और पारस्परिक लाभ की सिल्क रोड भावना को बढ़ावा देगे। इस आयोजन में हंगरी सम्मानित अतिथि के रूप में मौजूद रहेगा। यह सिल्क रूट का महत्वपूर्ण देश होने के साथ ही चीन के बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) में शामिल होने वाला पहला यूरोपीय देश है।
बीआरआई यानी न्यू सिल्क रोड
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को न्यू सिल्क रोड भी कहा जाता है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत शी जिनपिंग ने 2013 में की थी। इसी बरस वो चाइना के प्रेजिडेंट बने थे। महत्वाकांक्षी जिनपिंग इस प्रोजेक्ट के जरिए वैश्विक स्तर पर चीन का भू-राजनीतिक प्रभुत्व कायम करना चाहते हैं। हालांकि इस योजना का प्रचार यह कहकर ही किया जाता रहा है कि बीआरआई के तहत एशिया, यूरोप व अफ्रीका के बीच भूमि और समुद्र क्षेत्र के जरिए कनेक्टिविटी बढ़ाई जाएगी, जहां दोनों पक्षों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।
ग्रीन फाइनेंस एंड डेवलपमेंट सेंटर के मुताबिक मार्च 2022 तक बीआरआई में चीन के साथ 148 देश एमओयू साइन कर चुके हैं। समय-समय पर इस योजना के नाम को भी बदला गया। शुरुआत में इसे वन बेल्ट वन रोड कहा जाता था, फिर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई कहा गया, अब इसे सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट या इक्कीसवीं सदी की सामुद्रिक सिल्क रोड भी कहा जाता है। नाम चाहे कुछ भी हो, चीन का उद्देश्य अपनी ताकत बढ़ाना ही है। इस योजना के तहत उसने अपने से कमजोर देशों को कर्ज के जाल में भी फंसा दिया है। ऐसे में भारत इस जाल से खुद को मुक्त ही रखना चाहता है।
भारत बना रहा नए समीकरण
भारत शुरुआत से ही बीआरआई का विरोध करता आ रहा है। भारत का कहना है कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का उल्लंघन करता है। दो देशों के बीच विवादित भूमि पर तीसरे देश की आर्थिक गतिविधि का स्वागत नहीं किया जा सकता।
इसी के साथ एक अहम बात यह भी सामने आई है कि इस प्रॉजेक्ट ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों को ऋण देकर उन्हें कर्ज के जाल में फांस लिया है। इस प्रोजेक्ट के निर्णयों में मेजबान देशों की भूमिका दिखाई ही नहीं देती। पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी हैं। चीन की बढ़ती हुई ताकत को देखते हुए भारत सहित कुछ देश इस पर मंथन कर रहे हैं। भारत से उम्मीद लगाई जा रही है कि चीन के इस न्यू सिल्क रूट के सामने भारत को भी स्पाइस रूट या मसाला रूट की संभावनाओं को फिर से तलाशना चाहिए।
बहरहाल भारत, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात की एक नई साझेदारी सक्रिय हो रही है। स्पाइस रूट में केरल और ओमान अहम पड़ाव थे, ऐसे में ओमान से नजदीकी बढ़ाना इस मसाला रूट को फिर से एक्सप्लोर करने और हिंद महासागर में अपना प्रभुत्व बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। परन्तु जिस तरह चीन खुलकर सामने आ रहा है और करीब डेढ़ सौ देशों को जोड़ चुका है, ऐसे में स्पाइस रूट की चुनौतियों को समझा जा सकता है।
सिल्क रोड वीक के जरिए चीन बेल्ट एंड रोड से जुड़े देशों को जोड़ने का काम कर रहा है। जाहिर तौर पर वह अपनी सांस्कृतिक छवि को पेश करना चाह रहा है, पर उद्देश्य तो अपनी ताकत को जताना ही है। लिहाजा इस सिल्क रोड वीक के दौरान होने वाली गतिविधियों पर नजर रखनी जरूरी है, क्योंकि किसी एक देश की चौधराहट में बनने वाला व्यापारिक रूट बाकी देशों के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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