China and India: क्या ऑस्ट्रेलिया के बहाने भारत पर डोरे डाल रहा है चीन?
China and India: चीन इस समय ख़राब आर्थिक हालात से गुजर रहा है। इसलिए बीजिंग की कोशिश सभी प्रमुख देशों से व्यापारिक संबंध सुधारने की है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसी महीने अमेरिका के दौरे कर वाशिंगटन के साथ स्थिति सामान्य करने का एक प्रयास किया था, पर बहुत कुछ हासिल नहीं हो पाया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर आये लेकिन तनाव ख़त्म नहीं हुआ।
अब चीन भारत को भी समझाने की कोशिश कर रहा है कि सीमा संबंधी विवाद के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं, बस भारत कुछ देशों के बहकावे में आकर चीन से संबंध बिगाड़ने की पहल न करे। चीन ने हाल ही में संपन्न ऑस्ट्रेलियाई उप प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के भारत दौरे को लेकर भारत को सावधान रहने को कहा है। बीजिंग का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया चीन और भारत के बीच कलह पैदा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।

चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने 22 नवंबर को अपने कॉलम जी टी वॉइस में कहा है चीन की कीमत पर भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया यदि अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश करता है तो यह उसका वास्तव में अनाड़ीपन और अनावश्यक कोशिश है। यह एक तरह से भारत को खुश करने की कोशिश है।
उल्लेखनीय है कि भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने भारत यात्रा पर आये मार्ल्स के इस बयान को काफी प्रमुखता दी, जिसमें उन्होंने कहा था - "हम दोनों (भारत और ऑस्ट्रेलिया) के लिए चीन सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों की सुरक्षा के मामले में चीन सबसे बड़ी चिंता का कारण भी है।" चीन का मानना है कि मार्ल्स का यह बयान गलत मंशा से दिया गया है और इसका मकसद चीन-भारत आर्थिक संबंधों में दरार पैदा करने की कोशिश करना है। चीन ने भारत को समझाते हुए कहा है कि दरअसल मार्ल्स ने बीजिंग के प्रति दुर्भावना तो दिखाई ही है, साथ ही नई दिल्ली का भी अनादर किया है।
भारत पर डोरे डालते हुए ग्लोबल टाइम्स कहता है कि क्या स्वयं भारतीय नहीं जानते कि चीन के साथ उनके संबंध और द्विपक्षीय आर्थिक आदान-प्रदान का कितना महत्त्व है। क्या ऑस्ट्रेलिया का भारत के सामने जानबूझकर दिया गया वक्तव्य अपने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए चीन के साथ भारत के तनाव का फायदा उठाने की कोशिश नहीं है? ग्लोबल टाइम्स आगे लिखता है - भारत जैसे प्रमुख देश ने निश्चित रूप से स्पष्ट देखा है कि ऑस्ट्रेलिया क्या कर रहा है, और उम्मीद है कि वह आसानी से मार्ल्स की सस्ती चाल में नहीं फंसेगा।
ग्लोबल टाइम्स खुद ही स्वीकार कर रहा है कि चीन और ऑस्ट्रेलिया के आपसी संबंध नाजुक मोड़ पर हैं । दबाव और विरोध के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने के लिए 4 से 7 नवंबर तक ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ ने चीन की ऐतिहासिक यात्रा की। जिसे वर्षों के उतार-चढ़ाव के बाद द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिरता बहाल होने की संभावना बन रही है। विवादों को धीरे-धीरे और ठीक से हल किया जा रहा है। पर साथ ही बीच- बीच में ऑस्ट्रेलिया की ओर से चीन विरोधी आवाजें भी सुनाई दे रही हैं, जो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के निरंतर सुधार और विकास को कमजोर करने की कोशिश में कुछ घटनाएं अलग संकेत देती हैं। पूरी उम्मीद है कि भारत भी चीन के व्यापार के महत्व और वस्तुनिष्ठ आवश्यकता को देख सकता है और व्यावहारिक सहयोग के लिए इस प्रवृत्ति को अपना सकता है।
ग्लोबल टाइम्स कहता है कि चीन विगत कई वर्षों से भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है, और द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापार सहयोग से दोनों देशों के व्यवसायों को ठोस लाभ हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि सीमा विवाद और अन्य भूराजनीतिक कारकों के कारण हाल के वर्षों में चीन-भारत आर्थिक और व्यापार संबंधों के विकास में बाधाएं खड़ी हुई हैं और फिर आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों का राजनीतिकरण करने की प्रवृत्ति के तहत, दिल्ली ने भारत के बाजार में काम कर रही चीनी कंपनियों पर कार्रवाई तेज कर दी है। बात यहां तक होती है कि भारत चीन से अलग होने की सोच रहा रहा है, जो कि व्यावहारिक नहीं है।
तमाम बाधाओं के बावजूद इन परिस्थितियों में भी, चीन-भारत व्यापार लगातार बढ़ रहा है, जो द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग के लचीलेपन को दर्शाता है। चीनी सीमा शुल्क डेटा से पता चला है कि इस साल के पहले 10 महीनों में द्विपक्षीय व्यापार 789.7 बिलियन युआन ($110.78 बिलियन) तक पहुंच गया, जो पिछले साल से 6.3 प्रतिशत अधिक है। पिछले कुछ वर्षों में, चीन से निर्मित वस्तुओं के भारतीय आयात ने भारतीय कंपनियों के लिए उत्पादन लागत को प्रभावी ढंग से कम कर दिया है, उत्पादन क्षमता में सुधार किया है और भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि की है।
ग्लोबल टाइम्स ने भारत को सुझाया है कि अपने विनिर्माण उद्योग को विकसित करने के लिए चीनी निवेश को कृत्रिम रूप से बाहर करने और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला बनाने की कोशिश करने की बजाय उद्योग श्रृंखला सहयोग में चीन के साथ बातचीत बढ़ाए क्योंकि चीन से अलग होने का प्रयास पूरी तरह से भारत के अपने विनिर्माण क्षेत्र को विकसित करने के लक्ष्य के विरुद्ध है। यदि भारत वास्तव में चीन के साथ व्यापार को कम करने की दिशा में आगे बढ़ता है या तथाकथित सुरक्षा मुद्दों के कारण वैश्विक उद्योग श्रृंखला में चीन की भूमिका को बदलना चाहता है, तो यह केवल अपने लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ाएगा बल्कि अपने स्वयं के निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर करेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications