जामिया की लड़कियों ने कैसे आँचल से परचम बना लिया: नज़रिया

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किसी भी प्रदर्शन को हम जनआंदोलन तब तक नहीं कह सकते जब तक उसमें हर वर्ग, जाति, समुदाय और जेंडर का प्रतिनिधित्व ना हो.

देखने की ज़रूरत है कि क्या ये सारे तत्व इस सीएए विरोधी आंदोलन मे हैं. ख़ास तौर से महिलाओं की भागीदारी.

वर्ष 1857 की क्रांति के विश्लेषण में यही सवाल थे कि वह सिपाही विद्रोह था, धर्मयुद्ध था या जनआंदोलन था.

इतिहासकारों के एक वर्ग ने माना कि ना तो यह पहला था, ना राष्ट्रीय था, ना ही जनआंदोलन था. कुछ ने इसे असंतुष्टों का राज्य के ख़िलाफ विद्रोह कहा, कुछ इतिहासकार इसे पहला जनआंदोलन मानते हैं जिसमें हिंदू और मुसलमान, महिलाओं और पुरुषों ने साथ मिलकर संघर्ष किया था.

आप देख सकते हैं कि किस तरह यह जनाआक्रोश रानी लक्ष्मी बाई, हज़रत महल या ज़ीनत महल तक सीमित नहीं था बल्कि इसमें आम महिलाओं की भागीदारी थी जिस पर अब तक इतिहास में ख़ामोशी थी.

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पिछले कुछ सालों में उस पर चर्चा होने लगी है कि कैसे राजनीति को सिर्फ़ पुरूषों का विषय मानकर संगठित तौर पर महिलाओं की भागीदारी को नज़रअंदाज़ किया गया है.

अब जाकर अज़ीजन बाई से लेकर झलकारी बाई, अदला, जमीला और हबीबी के रोल पर इतिहास लेखन का काम शुरू हुआ.

और यह परंपरा बहुत पुरानी रही है कि औरत को ऐसे मौक़े पर या तो घर संभालने तक सीमित कर दिया जाता है या उनके योगदान को पुरूष प्रधान समाज नज़रअंदाज कर देता है.

1857 के बाद संगठित तौर पर 1905 मे बंगाली महिलाओं का बंग-भंग आंदोलन अहम रहा.

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वास्तव में तक़रीबन हर भारतीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को अक्सर वक्त-ज़रूरत के हिसाब से पुरुष प्रधान नेतृत्व तय करता है.

जब ज़रूरत हुई उन्हें शामिल किया, जब ज़रूरत ख़त्म तब उन्हें घरेलू ज़िम्मेदारियाँ याद दिलाकर वापस घर की चारदीवारी में बंद कर दिया.

हाल के वर्षों में जाट और मराठा आंदोलन में हमें देखने को मिला कि पुरुष प्रधान नेतृत्व ने महिलाओं और लड़कियों को आगे कर दिया था लेकिन वे अपनी मर्ज़ी से आंदोलन चलाती नहीं दिख रही थीं.

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जामिया का आंदोलन क्यों एक मिसाल है?

गाँधी जी ने महिलाओं को राष्ट्रव्यापी आंदोलन से जोड़ा और उसके पीछे कहीं-न-कहीं उनकी कल्पना थी कि महिला अपने स्वभाव से अहिंसक है इसलिए उनके अहिंसा के सिद्धांत को वह पूरा कर सकती है और आज़ादी मिलने तक महिलाओं की उपयोगिता बनी रही. उसके बाद एक बार फिर वह वापस घर में बंद.

1947 से आज तक किसी आंदोलन में आम महिला की इतनी भावनात्मक भागीदारी शायद ही देखने को मिले जो सीएए विरोधी आंदोलन में दिखती है.

नागरिकता के मुद्दे ने पुरूषों की तरह महिलाओं को भी झकझोर के रख दिया. यहाँ तक कि मैंने देखा 13-14 वर्ष की लड़कियाँ सड़क पर झुंड बनाकर नारे लगा रही हैं- 'निकलो-निकलो, घर से निकलो', 'अभी नहीं तो कभी नहीं'.

इन बच्चियों के इन नारों में कहीं-न-कहीं अपने अस्तित्व को लेकर डर और गहरी पीड़ा है. कई बूढ़ी औरतों ने रिक्शा पर बैठकर प्रदर्शन में हिस्सा लिया.

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पूरा आंदोलन गाँधीवादी अंहिसा पर आधारित था कि किसी भी रूप मे इसे हिंसक नहीं होने देनी है. बार-बार ना सिर्फ़ सड़कों पर यह एलान हो रहा था, बल्कि मस्जिदों से शांतिपूर्ण विरोध की अपील ख़ुद इमाम करते नज़र आए.

जो विरोध 13 दिसंबर को यूनिवर्सिटी कैंपस में शुरू हुआ उसमें औरतों की तादात ख़ास तौर पर महिला टीचर्स की तादाद ना के बराबर थी. लेकिन 15 दिसंबर की पुलिस कारवाई के बाद पूरा का पूरा शांतिपूर्ण प्रदर्शन एक जनआंदोलन में बदल गया जिसमें पूरी सड़क को महिलाओं ने घेर लिया, यहाँ तक कि अगुवाई भी की.

इतिहास उन वृतांतों से भरा पड़ा है कि औरतों की भागीदारी तब-तब हुई है जब-जब उन्हें अपने परिवार या समुदाय पर ख़तरा नज़र आया.

जैसा कि कन्फिल्क्ट ज़ोन के विश्लेषण में महिलाविद उर्वशी बुटालिया का भी मानना है कि औरत ऐसे एरिया में जब किसी गतिविधि में हिस्सा लेती हैं तो एक शांतिदूत के रूप मे एक स्टेटमेकर के रूप में आ जाती हैं जिसकी कुछ तत्कालिक वजह होती है कि अपने परिवार को कैसे बचाएँ, ना कि मरने-मारने की बात करती हैं.

मर्द की तुलना में औरत राजनीतिक दबाव के आगे झुकती नहीं क्योंकि मर्दों की तरह उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं होती बल्कि यह उनके लिए एक भावनात्मक मुद्दा होता है.

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'औरतें ज़्यादा संजीदा'

जैसा कि इन दिनों शाहीनबाग में सत्याग्रह पर बैठी औरतों की ज़िद को स्पष्ट देखा जा सकता है. यहाँ भी कुछ ऐसा नज़र आया उन्हें सीएए क़ानून के बारे में पता हो या नहीं पर उन्हें यह पता है कि यह अस्तित्व की लड़ाई है.

दरअसल महिला एक ऐसा वर्ग है कि वह अपनी जड़ से जल्दी नहीं हिलती. यहाँ तक कि विभाजन की भी कई ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें महिलाओं ने हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में आने-जाने को साफ़ तौर पर मना किया.

विभाजन के परिणाम की वेदना से आज भी जब मुसलमानों को गुज़रना पड़ रहा है, बावजूद इसके कि 99 प्रतिशत मुसलमानों ने अपना घर भारत को चुना, आकंड़े पुख्ता तौर पर बताते हैं कि यूपी से बमुश्किल एक प्रतिशत मुसलमान पाकिस्तान गए.

तो यह महिलाएँ सड़कों पर याद दिला रही हैं हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान, क्या पूछते हो, वह ताजमहल है, हमारा पता लाल किला है.

इस कड़ाके की ठंड में 6 माह के बच्चे को गोद में लेकर रात-रात भर धरने पर बैठी महिला साबित करती है कि किस क़दर ये औरतें मुद्दे को लेकर संजीदा हैं.

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शायद यह जगह उन्हें प्रेरणा देती है कि अगर चंदा यादव अपने मुसलमान भाई-बहनों के लिए प्रशासन से टकरा सकती हैं तो वह ख़ुद क्यों नहीं अपने हक़ के लिए खड़ी हो सकतीं.

चंदा यादव करोड़ों मुस्लिम लड़कियों के लिए एक आदर्श बन चुकी हैं.

इस आंदोलन की चर्चा का विषय जामिया की वो लड़कियाँ रहीं, ठसाठस भीड़ में लड़कियाँ ललकार रहीं थीं, लड़कियों ने पूरे देश को झकझोर दिया कि आख़िर यह चंदा, सृजन और ईमान क्यों वहाँ डटी हैं?

कभी ना भूलने वाली चंदा की ललकार इस आंदोलन की एक अहम कड़ी रही. फिर खुली पीठ ठिठुरती ठंड मे जामिया के छात्रों के 16 दिसंबर के मार्च ने पूरे देश के विश्वविधालयों को एकजुट कर दिया.

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'गुलाब क्रांति'

एक तरह से ये सारी घटनाएँ छात्र आंदोलन का प्रतीक बन गईं, ठीक उसी वक़्त ऐसी ही घटनाएँ अलीगढ़ में हो रही थीं पर वो चर्चा का विषय नहीं बनीं क्योंकि वहाँ लड़कियां लीड नहीं कर रही थीं.

दिल्ली पुलिस के जवानों को गुलाब देती और गाना गाती लड़कियाँ, 'दिल्ली पुलिस हमसे बात करो' ने सचमुच 'गुलाब क्रांति' कर दी और संदेश गया कि वे इतिहास पढ़ने नहीं, बनाने निकली हैं.

वास्तव मे दिल्ली के आंदोलन में गुलाब को प्रेम के प्रतीक की तरह प्रयोग करना बड़ा विशिष्ट अंदाज़ था जिसने काफी ध्यान खींचा.

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जामिया के मसले को यूनिवर्सिटी की वीसी प्रोफ़सर नजमा अख़्तर ने इस पूरे मामले में जो सहज संवेदनशीलता और दृढ़ता दिखाई वैसा रुख़ अलीगढ़ विश्वविद्यालय में देखने को नहीं मिला, यहां भी यही साबित हुआ कि महिलाएं जब अगुआई करती हैं तो उनके भीतर की निडर और भावुक स्त्री एक अहम किरदार अदा करती है.

दिल्ली के इस आंदोलन ने साबित किया महिलाएं शांतिपूर्ण प्रतिरोध बहुत बेहतर तरीके से कर सकती हैं.

इतिहास के पन्नों में दर्ज पेड़ से चिपक कर पर्यावरण की रक्षा करतीं चिपको आंदोलन की महिलाएँ और अपने अस्तित्व के लिए कड़ाके की ठंड में दिन-रात सड़क पर घरने पर बैठी शाहीनबाग की औरतों को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं, वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के सरोजिनी नायडू सेंटर फ़ॉर वीमेन स्टडीज़ में पढ़ाती हैं.)

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