Congress on Adani: बड़े पूंजीपतियों के साथ खड़े होने में दिक्कत किसे है?
मंगलवार को लोकसभा में राहुल गांधी ने मोदी के अडानी से संबंधों पर जमकर हमला बोला। उन्होंने चुनौती देते हुए मोदी से कहा कि वो अडानी से अपने संबंधों के बारे में सार्वजनिक रूप से सच बचाएं कि ये रिश्ता क्या कहलाता है?

Congress on Adani: आज कांग्रेस के नेता राहुल गांधी मोदी अडानी संबंधों पर जिस तरह का सवाल पूछ रहे हैं कुछ इसी तरह का सवाल भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस के रिलायंस से संबंधों पर उठाया था। संसद में बोलते हुए उन्होंने कांग्रेस और रिलायंस के संबंधों को रियल एलायंस करार दिया था। कांग्रेस का अंबानी परिवार के संबंधों पर यहां तक कहा जाने लगा था कि कांग्रेस पार्टी अंबानी की दुकान है।
इसमें बहुत हद तक गलत भी नहीं था। अंबानी परिवार का कांग्रेस में अत्यधिक दखल था। मुरली देवड़ा और प्रणव मुखर्जी के जरिए अंबानी परिवार ने जबर्दस्त घुसपैठ बनायी थी। अपने व्यापारिक लाभ के लिए अंबानी जैसा चाहते, कांग्रेस वैसी नीति बना देती। अंबानी का मशहूर वाक्य कि कानून मत तोड़ो, कानून को बदल दो, इसी की ओर संकेत करता है। लेकिन 2014 से पहले दोनों के संबंध बिगड़ गये। 5जी स्पेक्ट्रम को लेकर दोनों में शुरु हुई कलह अलगाव तक चली गयी और अंबानी ने अपने लिए नया खेवनहार चुन लिया। दूसरी तरफ गांधी परिवार ने इसे अपने साथ व्यक्तिगत धोखाधड़ी माना और अंबानी को निशाने पर ले लिया।
2014 आम चुनाव से पहले मोदी की अगुवाई में देश के बड़े उद्योगपति बदलाव की पहल में जुट गये। उनका वाइब्रंट गुजरात कार्यक्रम इसका बड़ा जरिया बना। इसमें ज्यादातर उद्योगपति गुजरात के थे और मोदी भी गुजरात से ही आते थे। अंबानी से भी ज्यादा मोदी के करीब अडानी थे जिनका मोदी से व्यक्तिगत संबंध पुराना था। मोदी के कठिन दिनों में जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब अडानी ही एकमात्र ऐसे उद्योगपति थे जो पूरी तरह से संकट काल में मोदी के साथ थे।
2014 आमचुनाव से पहले 2013 में मोदी ने देशभर में चुनावी रैलियां की थीं। इन रैलियों में पहुंचने के लिए मोदी अडानी का निजी विमान इस्तेमाल करते थे। यह सब कोई गुप्त रहस्य नहीं है। ये सब सार्वजनिक तथ्य हैं जो हर जागरुक मतदाता को पता हैं। शायद यही कारण है कि 2018 में यूपी में निवेशकों के भूमिपूजन कार्यक्रम में उन्होंने साफ तौर पर कहा भी कि "हमें पूंजीपतियों का अपमान क्यों करना चाहिए? उन्हें चोर डकैत कहना जरूरी है? ये सब क्या है?" इस मौके पर उन्होंने साफ कहा था कि "हमें पूंजीपतियों के साथ खड़ा होने में डरना नहीं चाहिए। अगर आपका मन साफ है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसके साथ खड़े दिखाई देते हैं।"
स्वाभाविक है कांग्रेस हो या बीजेपी। सोशलिस्ट युग की समाप्ति के बाद दोनों आर्थिक विकास का साझीदार पूंजीपतियों को ही मानते हैं। 2009 के आम चुनाव से पहले लालकृष्ण आडवाणी ने देश के बड़े पूंजीपतियों के साथ बैठक की थी। अपने पृथ्वीराज रोड स्थित आवास पर उन्होंने देश के प्रमुख पूंजीपतियों को बुलाया था ताकि वो भविष्य के विकास की रुपरेखा खींच सके। हालांकि 2009 में भाजपा चुनाव नहीं जीत पायी और उद्योगपतियों के साथ हुई बैठक सिर्फ एक इवेन्ट बनकर रह गयी।
लेकिन भाजपा की राजनीति में यह पहला प्रयोग था जहां बड़े उद्योगपतियों के साथ सार्वजनिक रूप से बैठक की गयी। भाजपा की झोली में कभी बड़े उद्योगपति रहे भी नहीं। भाजपा को छोटे कारोबारियों और बनिया समाज का समर्थन मिलता रहा था। बड़े कॉरपोरेट कांग्रेस के इर्द गिर्द ही मंडराते रहे क्योंकि कांग्रेस ही थी जो सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही थी।
लेकिन 2013 में मोदी ने देश के बड़े उद्योगपतियों को भरोसा दिलाया कि वो ज्यादा बेहतर माहौल उपलब्ध करा सकते हैं। संभवत: इसीलिए पहली बार बड़े उद्योगपति मोदी के पीछे खड़े दिखे। भाजपा के लिए यह बिल्कुल नयी बात थी। भाजपा के लोग आज भी नहीं जानते कि बड़े उद्योगपतियों से किस तरह का रिश्ता रखना चाहिए। उनका इस तरह का अभ्यास ही नहीं रहा है कभी। वैसे भी जो उद्योगपति भाजपा के करीब दिख रहे हैं वो ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के ही करीब रहे हैं। आज वो मोदी के करीब हैं। शायद कल मोदी के हटने के बाद वो भी भाजपा से दूर हट जाएं।
ऐसे में इतना तो साफ है कि कांग्रेस अगर अंबानी अडानी के साथ मोदी के संबंधों को मुद्दा बना रही है तो उसका दोहरा लक्ष्य है। एक यह कि वो मोदी को बदनाम कर सके कि वो जनता के लिए नहीं बल्कि पूंजीपतियों के लिए काम करते हैं। दूसरा, वह बड़े पूंजीपतियों को संदेश भी दे रही है कि जिस कांग्रेस ने उनको बढ़ाया उसकी अनदेखी करके वो निश्चिंत नहीं रह सकते।
लेकिन कांग्रेस भाजपा की कलह से अलग सच्चाई ये है कि देश में आर्थिक असमानता बहुत तेजी से बढ़ रही है। दुनिया में आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखनेवाली निजी संस्था ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 100 सबसे धनी लोगों की कुल संपत्ति 660 अरब डॉलर (54.12 लाख करोड़ रुपये) है। इनमें भी भारत के 21 सबसे अमीर अरबपतियों के पास मौजूदा समय में देश के 70 करोड़ लोगों से ज्यादा दौलत है।
"सर्वाइवल आफ द रिचेस्ट" नाम से जारी ऑक्सफैम की रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना काल में जब औसत भारतीय के सामने सर्वाइव करने का संकट पैदा हो गया था ठीक उसी दौर में हमारे देश के अरबपतियों की पूंजी में रॉकेट की तरह उछाल आया। नवंबर 2022 तक उनकी संपत्तियों में 121 प्रतिशत का उछाल आया। अर्थात दोगुने से भी अधिक। कोरोना काल में भारत के औसत अरबपति कारोबारी ने हर मिनट अपनी संपत्ति में 2.5 करोड़ रूपये की वृद्धि की।
भारतीय अर्थव्यवस्था में यह विरोधाभास ही किसी भी सरकार या पार्टी की आर्थिक नीति पर सवाल खड़ा करता है। ऐसा नहीं है कि आज मोदी सरकार कोई पहली बार पूंजीपतियों को ग्रोथ इंजिन बता रही है। सरकार कोई भी हो, वो पूंजीपतियों के विकास को ही राष्ट्र का विकास मानती रही है। उसके पीछे सरकारों का तर्क होता है कि पूंजीपति जितना व्यापार करेगा, सरकार को उतना अधिक टैक्स मिलेगा। सरकार को जितना अधिक टैक्स मिलेगा, सरकार उतना लोककल्याणकारी कार्य करेगी।
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इसी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। 100 अरबपति की बजाय 100 करोड़ लखपति पैदा करने की नीति से भारत आंतरिक रूप से ज्यादा समृद्ध होगा। आंकड़ों में भारत को मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने से ज्यादा जरूरी है कि व्यावहारिक स्तर पर उसे मजबूत बनाने का प्रयास किया जाए। उत्पादन और वितरण का केन्द्रीकरण भारत के लोगों केे लिए 5 किलो चावल और 5 किलो मुफ्त गेहूं तो दे सकता है उसको समान रूप से विकसित होने का अवसर नहीं देगा। जो भी नेता या सरकार इस दिशा में काम करेगा, उसे न तो बड़े पूंजीपतियों के साथ खड़े होने की जरूरत रहेगी और न ही डर लगेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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