British Democracy: अविकसित लोकतंत्र का अशक्त प्रधानमंत्री होता है ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर
यूनाइटेड किंगडम, जिसमें ब्रिटेन या इंग्लैण्ड सम्मिलित है, उसके नाम में ही संयुक्त राजशाही है। वह यूके, ब्रिटेन या फिर इंग्लैण्ड आज भी संवैधानिक लोकतंत्र नहीं वरन 'संवैधानिक राजशाही' है।

ब्रिटेन में प्रधानमंत्री की शक्तियों और कार्य को लेकर उसके संवैधानिक राजशाही के तीन सौ साल बाद भी कुछ स्पष्ट नहीं है। इस मामले में दुनिया के उपनिवेशों को "लोकतंत्र का पाठ" पढानेवाला ब्रिटेन स्वयं भ्रमित है।
ब्रिटिश व्यवस्था में उसके प्रधानमंत्री की जो सबसे बड़ी ताकत है वह यह कि वह किंग/क्वीन के हाथों को चूमने की ताकत रखता है। असल में ब्रिटिश राजशाही में यह नियम है कि वह जब किसी अधिकारी/मंत्री को नियुक्त करता है तो वह अधिकारी/मंत्री राजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए उसके हाथों को चूमता है और राजशाही के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
इसे ही ब्रिटिश व्यवस्था में "किस आफ द हैण्ड्स" कहा जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री के लिए राजा के हाथ को चूमने का एक अर्थ और होता है। वह राजा की सहमति से अपने मंत्रिमंडल का गठन करता है।
आज ब्रिटेन में "किस आफ द हैण्ड्स" की पॉवर होने का मतलब होता है कि प्रधानमंत्री अपना मंत्रिमंडल स्वयं बना सकता है। यही उसकी राजा की दृष्टि में सबसे बड़ी विश्वसनीयता है।
अपना व्यावसायिक शोषण स्थापित करने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप की राजशाही व्यवस्था को बदनाम करके उसे खत्म कर देनेवाला ब्रिटेन आज भी राजशाही को समाप्त नहीं कर पाया है।
इसलिए ब्रिटेन में प्रधानमंत्री कोई वैसा संप्रभु नीति निर्धारक नहीं होता जैसा भारत जैसे देश में होता है। इसके दो तीन प्रमुख कारण हैं।
पहला और सबसे बड़ा कारण यह है कि ब्रिटेन में बहुदलीय शासन नहीं है। वहां दो दल ही प्रमुख हैं। 1920 से वहां द्वि दलीय व्यवस्था लागू है जिसमें एक कन्जर्वेटिव पार्टी है और दूसरी लेबर पार्टी। द्वि दलीय लोकतंत्र होने के कारण वहां प्रधानमंत्री को असाधारण प्रतिभावान होने की जरूरत नहीं होती।
जब आपको पता है कि आपके पास लोकतंत्र का बहुत सीमित विकल्प है तो आप एकदम से कोई नयी बात या नया विचार लेकर नहीं आ सकते। आपको स्थापित विचारों और परंपराओं के बीच ही रहना होता है।
ब्रिटिश डेमोक्रेसी की एक और खामी है वह है प्रधानमंत्री की शक्तियों का अस्पष्ट उल्लेख। प्रधानमंत्री की शक्तियों का पता लगाने और ब्रिटेन में संवैधानिक लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए 2011 में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति का नाम था "पोलिटिकल एण्ड कांस्टीट्यूशनल रिफार्म सेलेक्ट कमेटी।"
इस कमेटी ने प्रधानमंत्री की शक्तियों को जांचने का काम भी किया था। अपनी रिपोर्ट में लार्ड हेनेसी के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि: "प्रधानमंत्री की भूमिका समग्र रूप से ब्रिटिश संविधान की तरह है। आपको लगता है कि आप करीब आ रहे हैं और यह धुंध में गायब हो जाता है।"
ब्रिटेन में प्रधानमंत्री की भूमिका को परिभाषित करना कठिन होने के कारण, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री की भूमिका निभानेवाले व्यक्ति की शक्तियों को रेखांकित करना समान रूप से समस्याग्रस्त हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा प्रयोग की जाने वाली अधिकांश शक्तियां क़ानून में परिभाषित नहीं हैं और एक ही स्थान पर नहीं पाई जाती हैं।
लॉर्ड हेनेसी ने अपनी पुस्तक "द प्राइम मिनिस्टर: द ऑफिस एंड इट्स होल्डर्स सिन्स 1945" में कहा है: "ब्रिटिश प्रधान मंत्री की शक्तियों के बारे में लगभग 300 वर्षों से बहस चल रही है।"
रिपोर्ट कहती है कि "हालांकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भूमिका की स्पष्ट परिभाषा के बिना भी प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ी शक्तियां सैकड़ों वर्षों से क़ानून द्वारा बिना किसी बाधा के कायम हैं। लेकिन कानूनी रूप से प्रधानमंत्री जिन शक्तियों का प्रयोग करते हैं, उनके लिए कोई एक आधिकारिक स्रोत नहीं है।"
2011 की इस रिपोर्ट से दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो जाती हैं कि ब्रिटिश संविधान और ब्रिटिश प्रधानमंत्री दोनों की शक्तियां अस्पष्ट हैं। वहां का राज काज कानून और संविधान की बजाय राजशाही की छत्रछाया में विकसित हो चुकी पंरपराओं पर अधिक निर्भर है। यह बहुत स्वाभाविक है।
राजशाही वाली व्यवस्थाएं लिखित संविधान की बजाय परंपरा पर अधिक निर्भर रहती हैं। ऐसे में ब्रिटेन का प्रधानमंत्री राजशाही वाली व्यवस्था का एक ऐसा प्रधानमंत्री होता है जो लिखित संवैधानिक अधिकारों की बजाय राजशाही की परंपराओं से अपनी शक्तियों को प्राप्त करता है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के अशक्त होने का एक और बड़ा कारण वहां की संसद है जिसे हाउस ऑफ कामन्स और हाउस ऑफ लार्ड्स कहा जाता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हाउस ऑफ कामन्स का प्रतिनिधि होता है जिसे निचला सदन कहा जाता है। हाउस ऑफ लार्ड्स को ब्रिटेन का उच्च सदन कहा जाता है जिसका इतिहास कुख्यात और लोकतंत्र विरोधी रहा है।
हाउस ऑफ लार्ड्स लगभग सात सौ साल पुराना है और मुख्य रूप से यह ब्रिटिश जमींदारों और प्रभुत्वशाली लोगों का समूह होता था। सात सौ सालों में इसमें समय समय पर कई बार सुधार आये लेकिन इसका सामंती स्वरूप आज भी बरकार है।
हाउस ऑफ लार्ड्स संसार के दूसरे संसदीय लोकतंत्र जैसा उच्च सदन नहीं होता। यह दुनिया का इकलौता ऐसा उच्च सदन है जहां निचले सदन से अधिक सदस्य होते हैं। ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में 650 सदस्य हैं तो ब्रिटिश हाउस ऑफ लार्ड्स में 758 सदस्य। हाउस ऑफ लार्ड्स परोक्ष रूप से ब्रिटिश राजा का सदन होता है। ब्रिटेन के राजा या रानी को जब संबोधित करना होता है तो इसी सदन को संबोधित करते हैं।
हाउस ऑफ लार्ड्स के सदस्यों की नियुक्ति भले ही प्रधानमंत्री की सलाह से ब्रिटेन का किंग करता हो लेकिन यहां सलाह देने में भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री के पास बहुत सीमित अवसर होते हैं। हाउस ऑफ लार्ड्स आज भी मुख्य रूप से उन्हीं परिवारों के सदस्यों के लिए आरक्षित रहता है जो कभी इस उच्च सदन के सदस्य रह चुके हैं।
इसके साथ ही हाउस ऑफ लार्ड्स में उनको सदस्यता दी जाती है जो चर्च आफ इंग्लैण्ड के सर्वोच्च 26 बिशप होते हैं। हालांकि 1999 के बाद से कुछ सामाजिक और राजनीतिक लोगों को भी इस सदन में स्थान मिलने लगा है लेकिन इस सदन की सामंती सोच में कोई बहुत अंतर नहीं आया है। आज भी यह सदन ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स में बननेवाले कानूनों की कांट छांट करने की ताकत रखता है।
अब क्योंकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री हाउस ऑफ कॉमन्स के सबसे बड़े दल का लीडर होता है इसलिए उसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने की बजाय राजा और उसके सदन हाउस ऑफ लार्ड्स के तहत ही काम करना होता है। इसलिए ब्रिटेन के औपनिवेशिक अतीत के कारण भले ही आज लोगों को ऐसा लगता है कि 10 डाउनिंग स्ट्रीट में भारतीय मूल के वंशज का पहुंचना कोई ऐतिहासिक घटना है तो यह प्रतीकात्मक रूप से ठीक है, व्यावहारिक रूप से नहीं।
ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर भारतीय प्रधानमंत्री की शक्तियों के सामने कहीं नहीं ठहरता। हालांकि ब्रिटिश हुक्मरानों का अहंकार इसे किसी और रूप में ही परिभाषित करता रहा है। मसलन, जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तब उस समय 1940 से 1945 के बीच विंस्टन चर्चिल प्रधानमंत्री थे। भारतीय लोगों और खासकर गांधी के देशी तरीकों से चिढनेवाले चर्चिल ने अपने मंत्रिमंडल सहयोगी से एक मीटिंग में कहा था, वो (भारतीय) जानवर हैं और उनका नेता (गांधी) भी जानवर जैसा है।"
भारतीयों को जानवर समझने वाले चर्चिल बहुत ठसक के साथ कहते थे कि भारतीय स्वतंत्र भी हो गये तो लोकतंत्र के तहत राज काज नहीं कर सकते। जब वो ऐसा कहते थे तब उनकी अपनी हैसियत संवैधानिक रूप से क्या रही होगी, उसे आज की समीक्षा से समझा जा सकता है।
लेकिन चर्चिल के उन्हीं "जानवरों" ने भारत में लोकतंत्र को ब्रिटेन से बेहतर विकसित किया और प्रधानमंत्री को वास्तविक शक्तियां प्रदान कीं। ब्रिटेन इस मामले में आज भी एक अविकसित लोकतंत्र है जिसके प्रधानमंत्री पद पर भारतीय मूल के एक हिन्दूवंशी ऋषि सुनक का चयन हुआ है।
750 साल के विभिन्न प्रयोगों के बाद आज भी ब्रिटेन में लोकतंत्र इतना विकसित नहीं हुआ है कि वह अपने प्रधानमंत्री की शक्तियों का संवैधानिक रूप से उल्लेख कर सके और राजा की कुर्सी को थेम्स नदी में प्रवाहित करके वास्तवित लोकतंत्र को अपना ले।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
प्यार में ये कैसा पागलपन? महेश भट्ट के लिए सड़क पर बिना कपड़ों के दौड़ीं ये फेमस एक्ट्रेस, फिर हुआ दर्दनाक अंत -
Sone ka Bhav: जंग के बीच सोने में बड़ी गिरावट! 7000 रुपये सस्ता, क्यों गिर रहा है भाव? आज का लेटेस्ट Gold Rate -
Weather Delhi NCR: दिल्ली में कब साफ होगा मौसम? दो दिन बाद फिर लौटेगी बारिश, IMD के अलर्ट ने बढ़ाई टेंशन -
Hyderabad Gold Silver Rate Today: ईद के मौके पर सोना-चांदी ने किया हैरान, जानें कहां पहुंचा भाव? -
Gold Rate Today: सोना सस्ता या अभी और गिरेगा? Tanishq से लेकर Kalyan, Malabar तक क्या है गहनों का भाव? -
Iran Espionage Israel: दूसरों की जासूसी करने वाले इजरायल के लीक हुए सीक्रेट, Iron Dome का सैनिक निकला जासूस -
Petrol Price Hike: ईरान जंग का पहला झटका! पावर पेट्रोल हुआ महंगा, इतना बढ़ा दाम, चेक करें लेटेस्ट रेट -
Weather UP: लखनऊ में 60KM की स्पीड से चलेंगी हवाएं! इन 26 जिलों में बारिश के साथ ओले गिरने का अलर्ट -
धामी मंत्रिमंडल में शामिल हुए ये 5 विधायक, दिल्ली से नाम हुए फाइनल, कुछ नामों ने चौंकाया, जानिए पूरी लिस्ट -
Surya Midha Net Worth: कौन हैं 22 साल के सूर्या मिधा? जकरबर्ग को पछाड़ बने सबसे युवा अरबपति? अथाह है संपत्ति -
Petrol Price: पेट्रोल के बाद Industrial Diesel भी महंगा, आपके शहर में कहां पहुंचा रेट? -
VIDEO: राष्ट्रपति ने प्रेमानंद महाराज को देखते ही किया प्रणाम! सादगी ने जीता दिल, क्या हुई आध्यात्मिक चर्चा?












Click it and Unblock the Notifications