BJP vs Opposition: हिन्दुत्व के कमंडल में समा गया राजनीति का मंडलवाद

BJP vs Opposition: साल 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालनपुर में भारतीय जनता पार्टी ने राममंदिर को लेकर जैसे ही प्रस्ताव पारित किया, राजनीतिक और मीडिया की चर्चा में इसे कमंडल की राजनीति कहा जाने लगा।

चूंकि तब तक राजनीतिक और मीडिया की सोच पर वामपंथी वैचारिकी का वर्चस्व था, इसलिए सहज ही इस पर कमंडल की राजनीति का विशेषण थोपना आसान रहा।

BJP vs Opposition: Mandalism of politics got trapped in the Kamaldan of Hindutva

इसके अगले साल, आजादी की 44वीं सालगिरह के ठीक हफ्ताभर पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 11 साल से भारत सरकार की किसी धूलभरी आलमारी में पड़ी मंडल आयोग की रिपोर्ट की धूल झाड़कर उसे लागू कर दिया। इस फैसले को तब मंडल की राजनीति के रूप में जाना गया। उसकी तर्ज पर राम मंदिर का राजनीतिक आंदोलन कमंडल की राजनीति के दायरे में कैद कर दिया गया।

चाहे मंडल की राजनीति हो या कमंडल की, इनमें आपसी प्रतिस्पर्धा रही तो राजनीति की एक धारा ऐसी भी थी, जो कमंडल की राजनीति की खुलकर विरोधी थी, लेकिन वह मंडल की धारा से भी कम से कम खुले रूप में सहमत नहीं थी। निश्चित तौर पर इस धारा की सबसे बड़ी प्रतिनिधि वह कांग्रेस थी, जिसके बिना राजनीति कौन कहे, भारत की भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। भले ही अधूरे मन से कांग्रेस ने कमंडल की राजनीति की शुरूआत की, लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की अपनी सोच के चलते वह लगातार उहापोह में रही।

फरवरी 1986 में राममंदिर का आनन फानन में ताला खुलवाना कांग्रेस की जल्दबाजी की राजनीति थी। लेकिन बाद में वह इसका श्रेय लेने से भी हिचकने लगी और देखते ही देखते अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की अपनी वैचारिक सोच के दबाव में इस राजनीति की कट्टर विरोधी बन गई। रही बात मंडल की राजनीति की तो उसे एक पूर्व कांग्रेसी ने लागू जरूर किया।

यहां याद करना चाहिए कि प्रधानमंत्री बनने से महज दो साल पहले तक विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस के ना सिर्फ कद्दावर नेता थे, बल्कि कांग्रेस के प्रथम परिवार के हुजूरबंदी भी थे। मंडल की राजनीति समाजवादी धारा की उस पारंपरिक सोच का ही मूर्त रूप थी, जो 'पिछड़े पावें सौ में साठ' के नारे से खुद को अभिव्यक्त करती थी।

चाहे कमंडल की राजनीति हो या मंडल की, दोनों का प्रभाव देखते ही देखते इतना विस्तारित हुआ कि समूची राजनीति इन्हीं दोनों वैचारिकताओं के घेरे में आ गई। मंडल के साथ समाजवादी धारा की राजनीति के भी दो धड़े हो गए। कालांतर में कमंडल यानी राममंदिर के लक्ष्य वाली राजनीति इतनी ताकतवर होती गई कि शुरू में उसके खून की प्यासी रही समाजवादी धारा से फूटकर निकली पार्टियों मसलन, समता पार्टी, जनता दल यू, इंडियन नेशनल लोकदल, बीजू जनता दल, लोक शक्ति और लोकजनशक्ति को उसकी ही छतरी की छांव में अपना अस्तित्व नजर आने लगा।

बेशक कमंडल की राजनीति का प्रमुख चेहरा भारतीय जनता पार्टी ना सिर्फ रही, बल्कि वह आज भी है। समाजवादी धारा की राजनीति के कुछ दल अपने तत्कालिक लाभों और सत्ता के लिए भाजपा की छतरी के नीचे से छिटकते और वापस आते रहे। लेकिन इन दलों की चाहे छिटकन हो या वापसी, इससे एक बात साफ है कि इन दलों ने अपने वोट बैंक की खातिर भले ही ऑन द रिकॉर्ड मंदिर को स्वीकार नहीं किया, लेकिन उसके प्रति अपनी मौन सहमति जताते रहे।

कमंडल और मंडल की राजनीति से कांग्रेस लगातार दूर होती गई। इसका असर यह हुआ कि वह सिमटती चली गई। मंडल और कमंडल की राजनीति के चलते भारत में मोटे तौर पर दो तरह का वोट बैंक उभरा। मंडलवाद की वजह से पिछड़ी जातियां बेशक ताकतवर हुईं, लेकिन इसने हिंदू समाज में विघटन को बढ़ावा दिया। इससे पिछड़ावाद को बढ़ावा मिला।

शुरू के दिनों में पिछड़ावाद के सिद्धांतकारों ने कमंडल की राजनीति को सवर्णवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। इसे सैद्धांतिक जामा भी पहनाया और इसे स्थापित करने में कामयाब भी रहे। हालांकि कमंडल की राजनीति हकीकत में हिंदू समाज में विघटन के बजाय एकत्व को बढ़ावा देती रही। इस संदर्भ में कमंडल की राजनीति ने एक तरह से भारत को जातीय विघटन और इससे उपजे संकुचित मानस को खत्म करने की कोशिश ज्यादा की।

कालांतर में कमंडल की राजनीति ने मंडल की राजनीति को भी खुद में समाहित कर लिया। कमंडल की राजनीति के प्रमुख चेहरे भारतीय जनता पार्टी को देखिए। जिसे कुछ साल पहले तक समाजवादियों और कम्युनिस्टों की ओर से बाभन-बनिया की पार्टी का तमगा हासिल था, वहां अब सभी जाति वर्गों के नेताओं की स्वीकार्यता बन चुकी है।

भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब पिछड़ी जाति के पास है। बाबा साहब अंबेडकर भी भाजपा के आराध्य हैं। पिछड़ी जातियों के नायक अब भाजपा के भी नायक हैं। इन संदर्भों में कह सकते हैं कि अयोध्या में राममंदिर की स्थापना के बाद भारत में विघटनवाद की राजनीति को पहली बार बड़ी चोट लगी है।

राममंदिर का मूर्त रूप लेना एक तरह से कमंडल की राजनीति की स्वीकार्यता का स्थापन भी है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हालांकि उसके यहां भी कई ताकतें ऐसी हैं, जिसे कमंडलवादी सोच स्वीकार्य होने लगी है।

हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू का राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के दिन राममंदिर में जाना, भूपेश बघेल का राम वनगमन पथ को अपना राज रहते मान्यता देना, कमलनाथ का दावा करना कि ताला उनकी सरकार ने खुलवाया, उत्तर प्रदेश कांग्रेस के समूचे नेतृत्व का राममंदिर के मुख्य पुजारी की कुटिया में जाकर खिचड़ी खाना, एक तरह से कमंडलवादी राजनीति में अपने को समायोजित करने की कोशिश ही है।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इसमें समाने की कोशिश नहीं कर रहा? क्या उसका अपना कोई निजी एजेंडा है, क्या उस पर किसी देसी या विदेशी ताकत का दबाव है। इसका जवाब कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व ही दे सकता है।

कांग्रेस ने ऐसी गलती मंडल की राजनीति को लेकर भी की। उसने मंडलवाद की धारा में खुद को समायोजित करने की कोशिश भी नहीं की। कांग्रेस ना तो कमंडल की हो पायी और ना मंडल की। मंडलवाद की ओर जब वह बढ़ी तो उसी वक्त कमंडलवाद का प्रमुख चेहरा भाजपा भी दौड़ पड़ी। इस दौड़ में भाजपा आगे निकल चुकी है। जबकि कांग्रेस कोसों पीछे है। वह मंडलवादी हुई तो मंडलवादी राजनीतिक तत्वों की उसे भले ही सहज स्वीकृति मिली है, लेकिन मंडलवादी सोच वाला लोक उसके साथ वैसे खड़ा नजर नहीं आ रहा है।

कमंडल की राजनीति एक तरह से समाज को जोड़ने की राजनीति रही है। राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा ने एक और अनूठा काम किया है। उसने कमंडल और मंडल को साथ ला दिया है। राम के जरिए लोक में बहती सहज धारा इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई है।

इसका यह मतलब नहीं कि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश में रामराज्य आ जाएगा। विघटनवादी वैचारिकी के सहारे जिनकी राजनीति चलती है, जिनकी रोजी-रोटी चलती है, जिन्हें इसी के नाम से देसी-विदेशी आर्थिक और वैचारिक सहयोग मिलता है, वे ताकतें चुप नहीं बैठेंगी। बेशक राममंदिर ने उनके मनोबल को किंचित चोट जरूर पहुंचाई है।

पूरे भारत में जिस तरह राममंदिर के लिए लोक में लहर दिख रही है, अगर वह ऐसे ही कायम रह पाई तो विघटनवादी ताकतों के लिए बड़ी चोट होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि समायोजन की यह धारा पूर्णिमा के समुद्री ज्वार की तरह ना हो। लोकहित में इसकी उम्र का लंबा होना जरूरी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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