BJP Strategy: भाजपा में यह क्या हो रहा है
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनावों की तैयारियां चल रही हैं। वैसे तो हिन्दीभाषी इन तीनों राज्यों के चुनाव भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि इन तीनों राज्यों में भाजपा की लंबे समय तक सरकारें रही हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा तीनों राज्य हार गई थी। 2020 में दलबदल से मध्यप्रदेश में तो सरकार बन गई थी, लेकिन 2021 में राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम हो गई थी।
अब मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मध्यप्रदेश में सरकार बचानी है और राजस्थान, छत्तीसगढ़ में सरकार बनानी है। पिछले एक साल में लगातार हिमाचल और कर्नाटक की दो सरकारें और दिल्ली नगर निगम गंवाने के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं की चिंताएं बढ़ी हुई हैं। क्योंकि कर्नाटक में केंद्र से थोपा गया नेतृत्व फेल हो गया।

हम आगामी चुनाव वाले तीन राज्यों के साथ हिमाचल और कर्नाटक को भी सामने कर देखेंगे, तो पाएंगे कि इन सभी राज्यों में कुछ नेताओं की लगातार मेहनत के बूते पार्टी सत्ता तक पहुंची थी। हिमाचल प्रदेश में शांता कुमार की मेहनत, राजस्थान में भैरोसिंह शेखावत की मेहनत, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे की मेहनत और कर्नाटक में येदियुरप्पा की मेहनत।
शांता कुमार के विकल्प के रूप में प्रेमकुमार धूमल स्वाभाविक नेता के रूप में उभरे थे, उन्हें केंद्र में किसी के नजदीक होने के कारण मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था। इसी तरह राजस्थान में जब भैरोसिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन कर दिल्ली आ गए थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हीं की सलाह के बाद वसुंधरा राजे को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनवाया था।
लेकिन भैरोसिंह शेखावत के कहने मात्र से अटल-आडवाणी ने वसुंधरा राजे को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया था। उन्होंने काउंटर चेक के लिए प्रमोद महाजन को सर्वेक्षण करवाने का जिम्मा सौंपा था। प्रमोद महाजन ने मुम्बई की एक कंपनी से राजस्थान में सर्वे करवाया कि प्रदेश भाजपा के नेताओं में से कौन भैरोसिंह शेखावत का विकल्प हो सकता है। इस सर्वे में भी वसुंधरा राजे का नाम सबसे ऊपर था। वाजपेयी और आडवाणी ने यों ही वसुंधरा राजे के हाथ में कमान नहीं सौंपी थी। राजस्थान में वसुंधरा राजे ही पहली नेता बनी, जो 2003 में भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार की मुख्यमंत्री बनी।

मध्यप्रदेश में भी कैलाश जोशी, वीरेन्द्र सकलेचा और सुंदर लाल पटवा वहां के स्वाभाविक नेता थे। इनमें से कोई भी केंद्र से थोपा नहीं गया था। भाजपा के संगठन मंत्री कुशाभाऊ ठाकरे जब केंद्र में आ गए थे, तो शिवराज सिंह चौहान ने एक बार प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ कर उन्हें नाराज कर लिया था। वह प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए थे। कायदे से उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि वह केन्द्रीय नेतृत्व की इच्छा के खिलाफ प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव लड़े थे, लेकिन वह मध्यप्रदेश के सबसे ज्यादा समय तक बने रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। यह पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र ही था कि आपसी टकराव के चलते 1977 से 1980 की एक ही टर्म में कैलाश जोशी, सकलेचा और पटवा मुख्यमंत्री बने। मध्यप्रदेश भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र के कारण ही 2018 को छोड़कर 2003 से लगातार चुनाव जीत रही है।
2018 में हारने के बाद भाजपा आलाकमान ने कर्नाटक में अपने क्षत्रप येदियुरप्पा पर और मध्यप्रदेश में अपने क्षत्रप शिवराज सिंह चौहान पर भरोसा किया। तो दोनों राज्यों में दलबदल से भाजपा की सरकारें बनीं। अगर दलबदल के बाद भाजपा आलाकमान इन दोनों को मुख्यमंत्री नहीं बनाता, तो क्या इन दोनों राज्यों में चुनाव तक सरकारें बनी रह सकती थीं।
कर्नाटक में तो 2019 में येदियुरप्पा ने ही सरकार बनवाई थी, उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा कर भाजपा आलाकमान ने जो गलती की थी, उसका परिणाम सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा। राजस्थान में जब सचिन पायलट ने विद्रोह किया था, तब अगर भाजपा आलाकमान कर्नाटक और मध्यप्रदेश की तरह वसुंधरा राजे को कमान सौंप देता तो आज वहां भाजपा की सरकार होती। ज्योतिरादित्या सिंधिया की तरह सचिन पायलट केंद्र में मंत्री होते। जैसी स्थिति आज चुनावों से पहले बनी हुई है, वह स्थिति भी नहीं बनती।
भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी चिंता राजस्थान की है। भाजपा के पास वसुंधरा राजे के कद का कोई नेता नहीं है, लेकिन आलाकमान की शह पर कुकुरमुते की तरह मझौले कद के कई नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन चुके हैं। अगर 2003 में वसुंधरा राजे के हाथ में कमान नहीं दी होती, उस समय के शेखावत विरोधी नेताओं के हाथ में नेतृत्व दिया होता, तो क्या 2003 में भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बना पाती। जैसे 2003 में यह संभव नहीं था, वैसे आज भी संभव नहीं है, जब तक प्रेम कुमार धूमल और शिवराज सिंह चौहान की तरह राजस्थान में वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं उभरता, तब तक उन्हीं के हाथ में कमान देना ही भाजपा की बुद्धिमता होगी।
राजस्थान को लेकर भाजपा आलाकमान दुविधा में है। पिछले चार साल तक भाजपा आलाकमान की शह पर ही प्रदेश के नेता वसुंधरा राजे को किनारे लगाए रहे। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष खुलकर कहते रहे कि वह वही कर रहे हैं, जो हाईकमान ने उन्हें करने को कहा है। नरेंद्र मोदी जयपुर की रैली में अपने भाषण में एक बार भी मंच पर बैठी वसुंधरा राजे का नाम नहीं लेते, उनके शासनकाल की उपलब्धियां नहीं गिनाते, जबकि छत्तीसगढ़ में राजनीतिक हाशिए पर जा चुके रमन सिंह का नाम लेते हैं, उनकी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हैं, तो राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का कथन सही लगता है। भाजपा में आलाकमान या हाईकमान की बीमारी नई है, यह पहले नहीं थी। पहले कांग्रेस में हाईकमान हुआ करता था, लेकिन भाजपा में सामूहिक नेतृत्व हुआ करता था।
आज भाजपा की सबसे बड़ी चिंता भी राजस्थान को लेकर है, क्योंकि वहां वसुंधरा राजे बड़ी चुनौती है। अब तक अति आत्मविश्वास था, लेकिन शायद अब यह एहसास हो गया है कि चुनावों में उनको किनारे करके जीतना आसान नहीं है। इसलिए 27 सितंबर को जब अमित शाह और जेपी नड्डा जयपुर गए तो उन दोनों ने वसुंधरा राजे के साथ लंबी बातचीत की, जिसमें वसुंधरा राजे ने उनकी और उनके समर्थकों की उपेक्षा किए जाने का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया। वसुंधरा राजे ने यह भी कहा कि जहां कांग्रेसियों को भाजपा में लिया जा रहा है, वहीं देवी सिंह भाटी जैसे भाजपा के पुराने और कद्दावर नेताओं की उपेक्षा हो रही है। वसुंधरा राजे की कोशिशों के बावजूद अर्जुन राम मेघवाल बड़ी रुकावट बने हुए थे, लेकिन जैसे ही वसुंधरा ने यह मामला अमित शाह के सामने उठाया, अगले ही दिन देवीसिंह भाटी को बुलाकर भाजपा में शामिल कर लिया गया।
पहली अक्टूबर को दिल्ली में केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक से पहले जेपी नड्डा के घर पर हुई कोर कमेटी की बैठक में वसुंधरा राजे को ख़ास तौर पर बुलाया गया था। बैठक में अमित शाह भी शामिल थे, उनके अलावा चुनाव प्रभारी प्रहलाद जोशी, सह प्रभारी कुलदीप बिश्नोई, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीपी जोशी, विधायक दल के नेता राजेन्द्र राठौड़ भी बैठक में शामिल थे।
इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व जमीनी हकीकत और परिस्थितियों से अनभिज्ञ नहीं है। जैसा गंभीर मंथन राजस्थान को लेकर हो रहा है, वैसा मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ को लेकर नहीं है। इस बैठक से पहले 30 सितंबर की रात को जेपी नड्डा के घर पर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नड्डा ने तीन घंटे तक मंथन किया था। इससे पहले पार्टी में गुटबाजी से हो रहे नुकसान पर दिन भर बैठकों का दौर चलता रहा। चुनाव प्रभारी प्रहलाद जोशी प्रदेश के नेताओं में तारतम्य बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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