BJP and NDA: विपक्षी एकता की आहट के बीच कुनबा बढ़ाने की कोशिशें
BJP and NDA: विपक्षी एकता की सक्रिय कोशिशों के बीच भाजपा ने भी एनडीए का कुनबा दोबारा जोड़ने का प्रयास शुरु कर दिया है। इसी महीने की तीन जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली के अपने आवास पर आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू, अकाली दल के नेता नरेश गुजराल और लोकजनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान के साथ एक बैठक की। उस बैठक में उन्होंने कहा कि 'भाजपा ने हमेशा एनडीए में शामिल छोटे दलों का सम्मान किया है। 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी हमने हमारे सहयोगी दलों को सरकार में शामिल किया। वह इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास चाहते हैं।"
दरअसल गृहमंत्री अमित शाह ने अपने आवास पर अपने पूर्व सहयोगियों से यह इसलिए कहा क्योंकि 28 मई 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में कहा था कि हमें एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को भरोसा दिलाना है कि भाजपा अपने साथियों को पूरा मौका और सम्मान देती है। सहयोगी दल हमारे रास्ते का रोड़ा नहीं, सेतु हैं।

बिहार में नीतीश कुमार के साथ छोड़ जाने और कर्नाटक में बुरी हार के बाद भाजपा नौ माह बाद होने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए किसी तरह का जोखिम उठाने को तैयार नही है। इसलिए पुराने सहयोगी दलों को फिर से जोड़कर 2024 में मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। नीतीश कुमार की विपक्ष एकता की मुहिम हो या नए संसद भवन के उद्घाटन पर एक साथ 19 पार्टियों का विरोध या फिर केजरीवाल सरकार के खिलाफ अध्यादेश के विरोध में एक दर्जन पार्टियों का उनके साथ जाना हो, इन सभी घटनाओं ने भाजपा को मजबूर किया है कि वह एनडीए का कुनबा बढ़ाने के लिए पहल करे। भाजपा छोटे छोटे दलों को जोड़कर बड़ी जीत के साथ 2024 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना चाहती है।
टीडीपी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में भाजपा की पुरानी साथी रही है। लेकिन 2018 में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के मसले पर चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। भले ही आंध्र प्रदेश में टीडीपी सीटों के हिसाब से विफल रही हो लेकिन उसका वोट प्रतिशत बताता है कि आंध्रप्रदेश में टीडीपी एक ताकत बनी हुई है। टीडीपी के एनडीए में आने से आंध्र प्रदेश में भाजपा को फायदा मिलना तय है। पिछले विधानसभा चुनाव में टीडीपी को 39.26% वोट, और भाजपा को 0.84% वोट मिले थे।
दक्षिण के एकमात्र राज्य कर्नाटक में सत्ता गंवा चुकी भाजपा को लग रहा है कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उसे टीडीपी तथा कर्नाटक में जेडीएस का समर्थन 2024 के लिए अतिरिक्त संजीवनी का काम करेगा। कर्नाटक में कांग्रेस से हारने के बाद भाजपा और जेडीएस को एक साथ आने में भलाई लग रही है। कर्नाटक से आने वाली 28 लोकसभा सीटों में से पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 25 सीटें जीती थी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा को 36% वोट और जेडीएस को 13.3% वोट मिले थे, ऐसे में भाजपा और जेडीएस का वोट शेयर मिला दिया जाए तो वह कांग्रेस को मिले वोट से 7 प्रतिशत अधिक हो जाता है।
तेलंगाना में इसी साल और आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं। भाजपा ने 2024 के आम चुनाव को देखते हुए सहयोगियों की दो श्रेणियां बनाई है। पहली श्रेणी में उन पार्टियों को रखा है जिनके साथ चुनाव के पहले गठबंधन करने की कोशिश कर रही है। दूसरी श्रेणी उन पार्टियों की है, जिनसे संवाद बराबर बना रहे और जरूरत पड़ने पर चुनाव के बाद ये गठबंधन में शामिल हो सकें या भाजपा का समर्थन कर सके। दूसरे श्रेणी की पार्टियों में ओडिशा के नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल जैसे दलों को लिया जा सकता है।
1997 से भाजपा के साथ चुनाव लड़ रही अकाली दल ने कृषि कानूनों के कारण मोदी सरकार से दोस्ती तोड़ ली थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को बुरी हार का सामना करना पड़ा। अकाली दल को सिर्फ 17 सीटें मिली। पंजाब में आप पार्टी की ऐतिहासिक जीत और जालंधर लोकसभा उपचुनाव में आप पार्टी की जीत ने अकाली दल और भाजपा को फिर से साथ आने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
बिहार में नीतीश के कारण सत्ता से बाहर हो चुकी भाजपा बिहार में भी एनडीए के पुराने साथियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है। आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा से भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व लगातार संपर्क में है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा नीतीश सरकार से अलग हो चुकी है। इसका भी एनडीए में आना तय है। इसके अलावा बिहार में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी फिर से एनडीए में आ सकती है। हालांकि, 2022 के मार्च में उनकी पार्टी के तीनों विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे, लेकिन इस साल फरवरी में सहनी को केंद्र सरकार ने वाइ-प्लस सुरक्षा देकर यह संकेत दिया कि बदली परिस्थितियों में भाजपा उन्हें गठबंधन में लाना चाहती है। दरअसल, सहनी 25 जुलाई को फूलन देवी के शहादत दिवस पर पटना में एक भव्य कार्यक्रम करने जा रहे हैं। हो सकता है उस दिन वह एनडीए में शामिल होने की घोषणा भी कर दें।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त अलग होने वाली लोक जनशक्ति पार्टी के अब दो धड़े बन चुके हैं। पशुपति कुमार पारस का धड़ा अभी एनडीए के साथ है और पारस केंद्रीय मंत्री हैं। लेकिन बिहार भाजपा से केंद्रीय नेताओं को यह जानकारी दी गई है कि एलजेपी से भाजपा को चुनावी लाभ तब ही मिल सकता है जब लोजपा संस्थापक रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी साथ हों। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर ध्यान दिया और चिराग पासवान को जोड़ने की कोशिश शुरू हो गई। फरवरी में ही केंद्र सरकार ने चिराग को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी है। भाजपा की कोशिश है कि एलजेपी के दोनों धड़ों में समझौता हो जाए और संयुक्त एलजेपी एनडीए के साथ रहे। इस बात की भी चर्चा है कि मोदी सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार में पारस की जगह चिराग को मंत्री बनाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा मजबूत है फिर भी वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहती और इस कारण भाजपा की सहयोगी रही ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से भी बातचीत चल रही है। दरअसल तमिलनाडु में एआइएडीएमके, महाराष्ट्र में शिंदे की शिवसेना और हरियाणा में जननायक जनता पार्टी को छोड़कर, केंद्र में भाजपा के पास कोई महत्वपूर्ण सहयोगी नहीं है जो राज्य स्तर पर खास फर्क डाल सके। 2024 में इन तीनों की चुनावी क्षमता पर भी सवालिया निशान हैं।
गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के समय एनडीए में 26 पार्टियां थीं। भाजपा 2014 के चुनाव में 282 सीटें जीतीं, जबकि सहयोगियों ने 54 सीटें जीती थीं। शिवसेना ने सबसे ज्यादा 18, तेलगुदेशम पार्टी ने 16, लोजपा ने 6, अकाली दल ने 4, आरएलएसपी ने 3 और अन्य सीटें बाकी छोटे दलों ने जीतीं थी। इनमें से टीडीपी और अकाली दल जैसी पार्टियां अब भाजपा की सहयोगी नहीं हैं। बिहार में नीतीश के साथ भाजपा ने 2019 के चुनाव में 39 सीटें जीती थीं। बिना नीतीश के बिहार में यह प्रदर्शन संभव नहीं है। इस कारण भाजपा को बिहार में छोटे छोटे दलों को साथ लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 2019 में भाजपा ने 303 सीटें जीतीं, वहीं सहयोगियों ने 50 सीटें। इनमें भी जेडीयू और शिवसेना ने अकेले 34 सीटें जीतीं। यानी एक बड़ा हिस्सा इन दोनों पार्टियों ने जीता जो अब भाजपा की सहयोगी नहीं बल्कि विरोधी हैं।
राजस्थान में कुछ ही महीनों बाद चुनाव हैं और राजस्थान में हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को भी एनडीए में लाने की कोशिश हो रही है। बेनीवाल की आरएलपी भी एनडीए का हिस्सा रही है। लेकिन कृषि कानूनों के मुद्दे पर दिसंबर, 2020 में अलग हो गई थी। भाजपा नेताओं को लग रहा है कि अगर बेनीवाल साथ आते हैं तो प्रदेश के जाट मतदाताओं को साथ लाने में मदद मिल सकती है। इसका लाभ राजस्थान में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव में भी मिल सकता है।
विपक्षी एकता की काट के लिए भाजपा को भी सहयोगी दलों की जरूरत पड़ेगी। बहरहाल, एनडीए का कुनबा कितना बढ़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा इन छोटी पार्टियों के लिए कितना बड़ा मन रखती है और अपने साथ जोड़ने में सफल होती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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