BJP-JDS Alliance: कर्नाटक में हाथ तो मिला लिया, क्या दिल भी मिलेंगे?
BJP-JDS Alliance: कुछ दिन पूर्व ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता येदियुरप्पा ने इस बात का खुलासा किया था कि जेडीएस भाजपा के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है और जल्द ही इस पर अंतिम मुहर लग सकती है। आखिरकार शुक्रवार को दिल्ली में अमित शाह की मौजूदगी में कुमारस्वामी ने इस बात को स्वीकार किया कि उनकी पार्टी अब एनडीए का हिस्सा है और आने वाला लोकसभा चुनाव वह भाजपा के साथ मिलकर लड़ेगी।
फिलहाल दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि खबर है कि जेडीएस कर्नाटक की मांड्या, हासन, बेंगलुरु (ग्रामीण) और चिकबल्लापुर लोकसभा सीट के अलावा विधान परिषद में दो सीटें या राज्यसभा की एक सीट की मांग भाजपा के सामने रखी है। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि अमित शाह ने चार लोकसभा और एक विधान परिषद की सीट जेडीएस को देने का भरोसा दिया है।

गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीएस के खाते में एकमात्र हासन सीट आई थी, जहां से एचडी देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना ने चुनाव जीता था, लेकिन 1 सितंबर को कर्नाटक हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के हलफनामे में गलत जानकारी देने के मामले में दोषी करार देते हुए उनकी संसद सदस्यता को रद्द कर दिया था। प्रज्वल की सांसदी रद्द होने के बाद अब लोकसभा में जेडीएस का कोई सांसद नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीएस को 9.67% वोट और एक सीट मिली थी।
दरअसल, जनता दल सेक्यूलर को कर्नाटक की क्षेत्रीय पार्टी कहने से बेहतर जेडीएस को दक्षिण कर्नाटक तक सीमित पार्टी कहा जा सकता है। यह इलाका ओल्ड मैसूर के नाम से जाना जाता है। इस इलाके मेें हासन, मांड्या, रामनगर, तुमकुरू, मैसूर और दक्षिण के अन्य जिले आते हैं। यहां जेडीएस का प्रभाव तो है लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में यहां का मतदाता कांग्रेस के साथ चला गया था।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी जीत का कारण यह भी था कि भाजपा का परंपरागत वोटर लिंगायत और दक्षिण कर्नाटक में जेडीएस का परंपरागत मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ चला गया था। कांग्रेस के 34 लिंगायत विधायक चुनाव जीते हैं। कर्नाटक में 30 साल में पहली बार कांग्रेस के इतने लिंगायत विधायक जीतकर आए हैं। कांग्रेस ने इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा से 53 सीटें छीनी हैं और 59 सीटें बचाई हैं। कांग्रेस को 43 प्रतिशत वोट मिले। यह वोट शेयर के लिहाज से 1989 के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत है। भाजपा के बुरे प्रदर्शन का आलम यह रहा कि कर्नाटक जैसे मजबूत गढ़ में भी भाजपा की 31 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी।
निश्चित रूप से कांग्रेस ने कर्नाटक के सभी क्षेत्रों में भाजपा से बेहतर प्रदर्शन किया था। मुम्बई कर्नाटक जो भाजपा का गढ़ माना जाता है। वहां से आने वाली 50 सीटों में से कांग्रेस ने 33 सीटें जीती जबकि भाजपा को अपने गढ़ में सिर्फ 16 सीटें मिली। हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र से जिसे कांग्रेस और जेडीएस के प्रभाव का क्षेत्र कहा जाता है यहां भाजपा सेंध लगाने में असफल रही। कांग्रेस ने इस क्षेत्र से आने वाली 40 सीटों में से लगातार तीसरी बार आधे से ज्यादा सीटें अपने नाम की। कांग्रेस को यहां से 26 सीटें मिली जबकि भाजपा को महज 10 सीटें मिली। जेडीएस भी यहां 3 सीटें जीतने में सफल रही थी।
भाजपा के गढ़ मध्य कर्नाटक से आने वाली 23 सीटों में से कांग्रेस को 15 सीटें, भाजपा को 6 और जेडीएस को 1 सीट मिली थी। अब भाजपा से हाथ मिलाने वाली जेडीएस के गढ़ ओल्ड मैसूर की 64 सीटों में से कांग्रेस ने अकेले 43 सीटें, भाजपा ने 5 सीटें और जेडीएस ने सिर्फ 14 सीटें जीती। अपने मुस्लिम वोटरों को ध्यान में रखते हुए जेडीएस ने सर्वाधिक 23 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे लेकिन जेडीएस का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीत नहीं सका। जेडीएस को राज्य में सिर्फ 19 सीटें मिली।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कर्नाटक में 51.75 फीसदी वोट के साथ 25 सीटें जीतीं थी। गठबंधन में रहने के बाद भी कांग्रेस और जेडीएस को एक-एक सीट से संतोष करना पड़ा था। भले ही भाजपा ने 2019 के विधानसभा चुनाव में 25 सीटें जीती थी, लेकिन 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लोकसभा सीटों के हिसाब से देखें तो कांग्रेस 18 लोकसभा सीटों पर आगे थी और भाजपा सिर्फ 8 सीटों पर आगे रही। विधानसभा चुनाव परिणामों के आधार पर देखें तो हासन और तुमकुरु जेडीएस के खाते में जाते हुए दिख रही हैं।
लेकिन यह पहली बार नहीं है जब कर्नाटक में दोनों दल एक साथ आये हैं। भाजपा और जेडीएस का गठबंधन 2006 में भी हो चुका है। हुआ यूं था कि 2004 के विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई और धरम सिंह मुख्यमंत्री बने लेकिन 2006 में जेडीएस ने गठबंधन तोड़ दिया और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लिया। कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। लेकिन वादे के मुताबिक भाजपा को डेढ साल बाद मुख्यमंत्री का पद देने के वादे से मुकरते हुए जेडीएस भाजपा गठबंधन से बाहर हो गई और कर्नाटक में फिर से विधानसभा चुनाव करवाने पड़े थे।
दक्षिण के अपने प्रवेशद्वार कर्नाटक में सत्ता से बाहर हो चुकी बीजेपी किसी भी स्थिति में कुछ ही माह बाद होने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 25 सीटों को बरकरार रखना चाहती है। लेकिन बदली परिस्थितियों में अकेले के दम पर बीजेपी अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा नहीं सकती। ऐसे में लोकसभा चुनाव में 25 सीट जीतनेवाली भाजपा और लोकसभा में नदारद हो चुकी जेडीएस के सामने राजनीतिक मजबूरी है कि कांग्रेस को रोकने तथा अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने के लिए आपस में हाथ मिलायें।
परंतु जेडीएस और भाजपा दोनों जानते हैं कि दोनों ने हाथ मिलाए हैं दिल नहीं। ऐसे में अवसरवाद का यह गठबंधन कितने दिन चलता है, यह भविष्य बताएगा लेकिन दोनों के साथ आने से एक बात साबित हो गयी है कि मोदी की लोकप्रियता को लेकर भाजपा कितने भी दावे करे, कर्नाटक में कांग्रेस का भय उसे सता रहा है। जेडीएस और भाजपा का यह गठबंधन कर्नाटक में कांग्रेस की जमीनी ताकत को भी बयां कर रहा है कि मजबूरी में ही सही दोनों को हाथ मिलाना पड़ा। फिर देवगौडा परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति और कुमारस्वामी के खिलाफ मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार के कई मामले लंबित है। ऐसे में जेडीएस के पास भाजपा के साथ जाने के अलावा कोई अन्य विकल्प भी नहीं था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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