Paswan Family: भतीजे चिराग की राह में अड़ंगा क्यों बने चाचा पारस?
Paswan Family: राजनीति के बदलते मौसम के विशेषज्ञ माने जाने वाले रामविलास पासवान आठ अक्टूबर 2020 को दुनिया छोड़ कर चले गए मगर उनकी विरासत की लड़ाई आज भी बिहार की राजनीति पर हावी है। यह लड़ाई सत्तारूढ एनडीए के लिए मुसीबत का सबब बन गई है।
रामविलास पासवान के सबसे छोटे भाई और केंद्रीय मंत्री पशुपतिनाथ पारस ने भाजपा नेताओं की पहल पर भतीजे चिराग पासवान के हाथ जा रही राजनीतिक विरासत में आखिरी वक्त पर अड़ंगा डाल दिया है। इससे लोकसभा चुनाव के ऐन मौके पर एनडीए के लिए बिहार में लोकसभा सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा का काम मुश्किल में फंस गया है।

एनडीए की घमासान से फायदा उठाने की चाह में इंडिया गठबंधन ने भी सीटों के बंटवारे की घोषणा फिलहाल टाल दी है। इंडिया गठबंधन को मुकेश सहनी का भी इंतजार है, जो एनडीए से टिकट नहीं मिलने की सूरत में वापस तेजस्वी के पाले में आ सकते हैं।
ऐसे में चिराग के चाचा पारस के मुंह से फूटे बगावती सुर ने इंडिया गठबंधन की आस बढ़ा दी है। नाजुक हालात में दोनों ओर से सीट बंटवारे की घोषणा का काम अब अगले दो चार दिनों तक के लिए टल गया है। जबकि उम्मीद थी कि गुरुवार को नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ ही बिहार में सीट बंटवारे और उम्मीदवारों की घोषणा सहजता से हो जायेगी।
आखिरी वक्त में रामविलास पासवान की विरासत का विवाद सुलझाने के लिए कई राउंड की बैठकों के बाद भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता इस निर्णय पर पहुंचे थे कि चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोकजनशक्ति पार्टी को एनडीए में शामिल किया जाए और सीटों का समझौता चिराग गुट तक ही सीमित रखा जाए। बदले हालात में चाचा पशुपतिनाथ पारस को फिलहाल केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल तो रखा जाए मगर आगे राजनीतिक वनवास के लिए मना लिया गया है।
सूत्रों के मुताबिक पारस को भविष्य में किसी राज्य का गवर्नर बनाए जाने की बात थी। साथ ही एक अन्य भतीजे और समस्तीपुर के सांसद प्रिंस राज को लोकसभा की बजाय राज्य विधानसभा की राजनीति में एडजस्ट करने की तैयारी थी। इसके लिए उनको नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के हालिया विस्तार में शामिल किया जाना था। मगर ऐन मौके पर चाचा पशुपतिनाथ पारस के बिफर जाने से सब गड्डमड हो गया।
पारस ने पटना जाकर प्रिंस को मंत्रिमंडल में शामिल होने से रोक लिया और हाजीपुर से ही लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी होने का दावा ठोक दिया। हाजीपुर सीट परिवारिक विरासत पर दावेदारी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी सीट से राम विलास पासवान चुनाव लड़ते थे। चिराग पासवान फिलहाल जमुई से सांसद हैं।
परिवारिक विरासत की लड़ाई में केंद्रीय मंत्री पारस को नीतीश कुमार ने एनडीए में अपनी हैसियत बढ़ाने की मंशा से बढ़ावा दिया था। खास परिस्थिति में यह सुनिश्चित किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनको अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री की हैसियत से शामिल करें।
यह काम नीतीश विरोधी चिराग पासवान को राजनीति में नौसिखिया होने का अहसास दिलाने के लिए भी किया गया था। खास ऑपरेशन के तहत अक्टूबर 2021 में लोकजनशक्ति पार्टी में बड़ी बगावत करवाई गई। इसमें तब नीतीश कुमार के सिपहसालार रहे ललन सिंह उर्फ राजीव रंजन की खास भूमिका थी। जो खुद केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जाने से परेशान चल रहे थे।
चाचा पारस के नेतृत्व में पार्टी के सभी पांच सांसदों के अलग गुट बनाने से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान भौंचक रह गए। वे जैसे तैसे सम्हल पाए। मगर जबतक सम्हलते तब तक लोकजनशक्ति पार्टी के एनडीए में शामिल हुए धड़े के नेता के तौर पर चाचा पशुपतिनाथ पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शपथ दिलाई जा चुकी थी।
दरअसल नीतीश कुमार की शिकायत थी कि बीजेपी चिराग पासवान का इस्तेमाल एनडीए में उनकी हैसियत कम करने की साजिश के तहत कर रही है। चिराग पासवान 2020 विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे की बात नहीं बनने की वजह से एनडीए से अलग होकर लड़े थे। लिहाजा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि बुलंद रखने के लिए बीजेपी को चिराग से दूरी बनाए रखने के लिए मना लिया गया था।
चिराग पासवान के अलावा नीतीश कुमार को खुश रखने के लिए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के नेता रहे आरपीएन सिंह को राज्यसभा तक में नहीं भेजा गया। बाद में नीतीश कुमार ही उन्नीस महीने के लिए एनडीए छोड़ गए। तब राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह के भविष्य को लेकर भी मुश्किल पैदा हुई थी मगर शीर्ष बीजेपी नेताओं ने बड़ी सूझबूझ से हल निकाला था। नीतीश के उलटने पलटने का शिकार होने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा भी शामिल रहे। अब जब घटे राजनीतिक रसूख के साथ नीतीश कुमार फिर एनडीए में आए हैं, तब केंद्रीय मंत्री पारस जैसे कारिंदों की हैसियत भी कम हो जाने का आकलन किया जा रहा था।
मगर केंद्रीय मंत्री पशुपतिनाथ पारस के बागी सुर ने बिहार में एनडीए की सुलझती गुत्थी को नए सिरे से उलझा दिया है। कई राउंड की बैठकों के बाद बिहार मंत्रिमंडल के विस्तार में न सिर्फ उन्होंने भतीजे प्रिंस राज को शामिल होने से रोक दिया बल्कि बड़े भतीजे चिराग पासवान की उड़ान की चाह पर फिर ग्रहण लगा दिया है। उन्होंने हाजीपुर लोकसभा सीट छोड़ने से साफ इंकार कर दिया है।
साफ है बड़े भाई रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत वो एकतरफा चिराग के हाथ में नहीं जाने देना चाहते। वो नहीं चाहते कि शिवपाल यादव की तरह उन्हें हाशिये पर धकेल दिया जाए। अपना स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व बचाये रखने के साथ वो राम विलास पासवान के वारिस भी बने रहना चाहते हैं। इसलिए हाजीपुर सीट पर दावा ठोक दिया और संकेत भी दे दिया है कि बात नहीं बनने पर वह एनडीए छोड़ इंडिया गठबंधन के साथ जाने में संकोच नहीं करेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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