Bihar Liquor Deaths: अनेक मौतें हुई तो चर्चा भी नहीं, एक मौत पर मचा हाहाकार
बिहार की शराबबंदी को कभी गांधीवादी विचारों की झलक बताया गया तो कभी संविधान के अनुच्छेद 47 से प्रेरित। जो नहीं किया गया, वो था शराबबंदी के इस फैसले की निष्पक्ष जांच।

सौ मौतें एक आंकड़ा भर हैं और एक मौत एक त्रासदी। ऐसा कभी स्टालिन ने कहा था, ऐसा माना जाता है। इसी सोच को मूर्त रूप लेते देखना है तो अभी की हिंदी पट्टी की राजनीति देख लीजिये। उत्तर प्रदेश में एक कुख्यात माफिया सरगना कहलाने वाला अतीक अहमद मारा गया है। उस पर हत्या, लूट, अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त जैसे सौ के करीब मुकदमे थे। उसके भाई पर पचास से अधिक केस थे। उसके बेटे अपराधी हैं, पत्नी पर भी केस हैं। अपराध के जरिये वो 1100 करोड़ से अधिक की संपत्ति जुटा चुका था। उसकी हत्या पर करीब-करीब हर समाचार चैनल पर, राष्ट्रीय मीडिया में बहस हो रही है।
अब जरा बिहार की ओर आइये। कुछ ही दिन पहले कई लोगों की जहरीली शराब से मौत हो गयी। किसी ने पच्चीस मौतें बताई तो किसी ने पचास, मगर ये राष्ट्रीय तो छोड़िये, स्थानीय मीडिया में भी बहस का मुद्दा नहीं बना। कई मौतें थीं न, इसलिए आंकड़ा बनकर रह गयी। अतीक जैसे एक अपराधी की मौत होती तो 'समुदाय विशेष का होने' से लेकर 'पीड़ित होने के कारण हथियार उठा लेने' जैसी कहानियां गढ़ी जाती। अनेक मौतें हुईं तो चर्चा तक नहीं हुई, एक मौत होती तो त्रासदी बताई जाती।
पिछले सात वर्षों में, यानि 2016 में शराबबंदी लागू होने से लेकर अभी तक सरकारी आंकड़ों के हिसाब से जहरीली शराब पीने से 199 लोगों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी आंकड़े बताते हैं कि मौतें चार सौ से भी अधिक हैं। ये अंतर क्यों? इसलिए क्योंकि मद्य निषेध विभाग की मानें तो मौत के 269 मामले "संदिग्ध" हैं। ये 269 मौतें जहरीली शराब से हुई या नहीं, विभाग को पता नहीं। इन "संदेहास्पद मौतों" के मामलों में विभाग तय ही नहीं कर पाया है कि मृत्यु का कारण जहरीली शराब थी या नहीं, इसलिए इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलेगा।
मुआवजे के बारे में भी नीतीश कुमार ने पहले कहा था कि जहरीली शराब पीकर मरने वाले राज्य का कानून तोड़ रहे हैं। लेकिन अब बिहार सरकार इस बयान से पलट गयी है। अभी हुई मौतों के बाद नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि मृतकों को 4-4 लाख का मुआवजा दिया जायेगा। सरकार के प्रतिबन्ध के बाद भी राज्य में अगर शराब बन रही थी, मिल रही थी, तो ये किसकी गलती है? सरकार ने अपना काम नहीं किया, उसके बाद भी मुआवजा घोषित करने की याद तब आई है, जब चुनाव नजदीक आ गए हैं।
हाल ही में बिहार सरकार ने शराबबंदी की काफी निंदा होने के बाद एक सर्वेक्षण करवाया। चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने बिहार में काम कर रही संस्था "जीविका" के साथ मिलकर ये सर्वेक्षण किया। सभी 38 जिलों में हुए इस सर्वेक्षण में कुल 534 प्रखंडों के 33,805 गांवों में 10,22,467 लोगों से बात की गयी। इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि शराबबंदी से पहले बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के 45.56 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 49.56 प्रतिशत लोग शराब पीते थे। शराबबंदी के बाद केवल 4.39 प्रतिशत लोगों ने स्वीकारा कि वो अब भी शराब पी रहे है।
इसी तरह तीन डॉक्टरों की टीम ने मिलकर एक पायलट सर्वे, 2017 में किया था। इसके मुताबिक जो शराब के आदी थे, ऐसे लोगों में से करीब 64 प्रतिशत ने शराब बंद की मगर लगभग 25 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो दूसरे किसी नशे, जैसे ताड़ी, गांजा और चरस इत्यादि का इस्तेमाल करने लगे थे। कई लोग पड़ोसी राज्यों और नेपाल से आ जाने वाली अवैध शराब का प्रयोग करते हैं। इस सर्वेक्षण में कहा गया था कि करीब 30 प्रतिशत शराबी अब भी शराब पी ही रहे हैं। इसके कारण पड़ोसी राज्यों के शराब राजस्व में वृद्धि हुई है।
जहां तक शराबबंदी के विरोध का प्रश्न है, लालू यादव इसके सबसे मुखर विरोधियों में से रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फैसले की निंदा करते हुए कहा था कि इससे राज्य के राजस्व का नुकसान तो होगा ही, साथ में तस्करों की चांदी हो जाएगी। परन्तु इस समय बिहार में नीतीश सरकार लालू यादव की पार्टी राजद के समर्थन से बनी हुई है, उनके ही सुपुत्र तेजस्वी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं और शराबबंदी फ़िलहाल लागू ही है।
राजनीतिज्ञों के बदले अगर अदालतों की बात करें तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने 26 दिसम्बर 2021 को सार्वजनिक मंच से बिहार सरकार के शराबबंदी के फैसले की भर्त्सना कर डाली थी। उन्होंने कहा था कि ऐसे दूरदृष्टि विहीन कानून बनाये जाते हैं जिनका असर सोचा ही नहीं जाता। नतीजा ये होता है कि पहले से ही अत्यधिक मुकदमों से जूझ रही अदालतों पर और अधिक मुकदमों का बोझ बढ़ जाता है। उनकी नाराजगी का मुख्य कारण पटना उच्च न्यायालय और बिहार की निचली अदालतों पर शराबबंदी के कानून के कारण गिरफ्तार हुए लोगों के जमानत के आवेदनों की वजह से बढ़ा अनावश्यक बोझ था। पटना उच्च न्यायालय अपने एक फैसले में (अक्टूबर 2022) कह चुका है कि बिहार सरकार शराबबंदी को लागू करने में असफल रही है। अवयस्क किशोर शराब लाने-ले जाने के काम में लगे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि नेता और पुलिस की मिलीभगत से सब चल रहा है।
शराबबंदी को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वो कोई नए सवाल नहीं हैं। जनता जब खुलकर बात कर रही हो तो यही सवाल उठते हैं। पत्रकारों पर एनएसए थोप दिए जाने का डर न हो तो वो भी यही पूछेंगे। अदालतें ये पूछ ही चुकी हैं। जिस राज्य में नौ करोड़ से ऊपर जब्त की गयी शराब, थाने में चूहे पी जाते हैं उस राज्य में बड़े शराब माफियाओं पर शायद ही कोई मुकदमा दर्ज हुआ है। क्या करोड़ों की शराब राज्य में छोटे तस्कर लाये होंगे या इतना माल खरीदने में भी करोड़ों का कारोबार करनेवाले ही लगे होंगे?
फिलहाल तो इस फैसले की समीक्षा करने की जरूरत है। सवाल सिर्फ राजस्व का नहीं है। सवाल अवैध कारोबार और जहरीली शराब से होनेवाली मौतों का भी है जिनकी कहीं कोई चर्चा नहीं होती।












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