Bihar Education Minister: शिक्षा छोड़कर हर मामले के विशेषज्ञ हैं बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर
रामचरित मानस पर विवादित बयान देकर चर्चा में आने वाले बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर यादव अपने ही मंत्रालय के काम काज में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। वो हर मामले के विशेषज्ञ हैं सिर्फ शिक्षा को छोड़कर।

जिस राज्य के युवा ही निराश होकर रोजी रोटी और शिक्षा की तलाश में अन्य राज्यों में जाने के लिए मजबूर हों, उस राज्य का क्या भविष्य होगा? बिहार को देखें तो यहां युवाओं के पलायन की सबसे बड़ी वजह शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के अवसर का चौपट होना है। इन सारी बातों को जानते बूझते बिहार के शिक्षा मंत्री अपने विभाग के काम काज को छोड़कर रामचरितमानस के गहन अध्ययन में जुटे हैं। वे चुनौती दे रहे हैं कि जो चाहे आकर उनसे शास्त्रार्थ कर सकता है। वे बहस के लिए तैयार हैं लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो शिक्षा विभाग उन्हें सौंपा है, उसके कामकाज को लेकर वे गंभीर नहीं जान पड़ते।
उन्हें बिहार में जो शिक्षा विभाग सौंपा गया है, उसकी बेहतरी के लिए वे गंभीरता से काम करते नहीं दिखाई देते। पिछले कुछ समय में कई अवसर ऐसे आए जब उन्होंने रामचरित मानस की चौपाई गलत पढ़ी या फिर अर्थ का अनर्थ किया। फैक्ट चेक में उनकी गलती पकड़ी गई लेकिन उन्हें अपनी ऐसी गलती पर कोई पछतावा नहीं है। उनकी टेलीफोन पर कथित बातचीत का एक वीडियो बहुत वायरल हुआ। जिसमें वे पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं को फोन पर समझा रहे हैं कि रामचरितमानस का विरोध कैसे करना है? जिससे इस मुद्दे पर बिहार में राजनीति भी खूब हो और हिन्दू समाज नाराज भी ना हो।
बना रहे थे टकराव की रणनीति
जिन्हें बिहार की शिक्षा को बेहतर करने की जिम्मेवारी मिली है, वह अपने काम को छोड़कर, समाज में रामचरित मानस के नाम टकराव की रणनीति बना रहे हैं। बिहार में नेताओं के बच्चे चाहे विदेश में पढ़ें लेकिन गरीब बिहारियों के लिए चरवाहा विद्यालय ही राजद सरकार में मिला। बिहार की राजनीति को राजद जैसे दलों ने जाति केन्द्रित इसीलिए बनाकर रखा ताकि वहां का गरीब, वंचित, पीड़ित समाज शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार जैसे मुद्दों पर बात ही ना कर पाए। आज भी बिहार के कई जिला अस्पताल इस स्थिति में दिखाई पड़ जाएंगे, जिसे देखकर बताना मुश्किल होगा कि यह इंसानों का अस्पताल है या जानवरों का?
शिक्षा मंत्री वायरल वीडियो में पार्टी कार्यकर्ताओं को हिंदुओं के बीच थोड़ा बचाकर बात करने की हिदायत दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि हार्ड लाइन नहीं लेना है, इससे लोग गुस्सा हो जाएंगे। वीडियो में मंत्रीजी से बात करते हुए राजद नेता उदय नारायण चौधरी दिखाई पड़ते हैं।
अपने विभाग के प्रश्नों के जवाब नहीं मंत्रीजी के पास
बिहार के अंदर चतुर्थ चरण के कॉलेजों का विवाद पिछले तीन दशक से अधिक समय से चल रहा है। इस मामले को लेकर सरकार पटना उच्च न्यायालय में रिव्यू पिटीशन में गई है। अब न्यायालय ने बिहार सरकार के पिटीशन को स्वीकृत किया है या नहीं? इस सवाल का जवाब विभाग के मंत्री के पास तो होना चाहिए था लेकिन उन्होंने विधानसभा में स्वीकार किया कि इस प्रश्न का जवाब उनके पास नहीं है।
चन्द्रशेख्रर यादव जब विधानसभा में शिक्षा के बजट पर बोल रहे थे तब उन्होंने बजट पर कम बात की और रामचरित मानस पर अधिक बोले, जिसका विपक्ष ने विरोध भी किया। जब यही प्रयोग उन्होंने विधानपरिषद में दुहराना चाहा तो उनके ही सहयोगी दल महागठबंधन में शामिल जदयू के नेता ने विरोध कर दिया। एक विधायक ने तो यहां तक सलाह दे दी कि अगर रामचरित मानस में उनकी इतनी ही रुचि है तो वो आरएसएस में शामिल हो जाएं।
इसी बीच उनका एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वे सभापति महोदय से कह रहे हैं: 'पीछे से मेरा इंटेरोगेशन (पूछताछ) हो रहा है।' तब सभापति महोदय ने उन्हें सुधारते हुए कहा कि इसे इंटेरोगेशन नहीं बल्कि इंटरप्शन (व्यवधान) कहते हैं। बिहार को पूर्व मुख्यमंत्री लालुजी के नेतृत्व में चरवाहा विद्यालय मिला था। अब तेजस्वी यादव के नेतृत्व में एक ऐसा शिक्षा मंत्री मिला है, जिसे इंटेरोगेशन और इंटरप्शन के बीच का अंतर मालूम नहीं है।
उत्तर अस्वीकारात्मक है
शिक्षा मंत्री ने बजट में कई तरह की घोषणाएं की। उन्होंने कहा कि जमुई जिलान्तर्गत झाझा प्रखंड में स्थित सिमुलतला आवासीय विद्यालय के तर्ज पर बिहार के हर जिले में एक आवासीय विद्यालय बनाएंगे। यदि उनका यह किया हुआ वादा साकार हो जाए तो इसे स्वागत योग्य कदम कहा जाएगा। इसके अलावा उन्होंने शिक्षकों की भर्ती को लेकर 2023-24 में प्रारंभिक विद्यालयों में 80,000 शिक्षकों की नियुक्ति की बात कही। साथ ही माध्यमिक विद्यालय और उच्च विद्यालयों में एक लाख तीस हजार शिक्षकों की बहाली होने की बात भी कही। इस बात का उल्लेख यहां इसलिए आवश्यक है क्योंकि जिस दिन वे बजट पर भाषण दे रहे थे, उसी दिन शिक्षकों की भर्ती को लेकर भोजपुर के विधायक कॉमरेड मनोज मंजिल का एक सवाल उनके सामने आता है। जिसमें मनोज पूछते हैं कि क्या यह सही है कि राज्य में शिक्षकों के लगभग 3.5 लाख पद खाली हैं। इसके जवाब में मंत्री कहते हैं कि 'उत्तर अस्वीकारात्मक है।'
बिहार के अंदर रोजगार के सवाल मनोज मंजिल उठाते रहे हैं। मनोज ने शिक्षा मंत्री से दूसरे सवाल में पूछा कि क्या यह बात सही है कि सातवें चरण की शिक्षक बहाली को लेकर नियमावली 2023 का ड्राफ्ट तैयार हो जाने के बावजूद अभी तक सातवें चरण के शिक्षकों की बहाली शुरू नहीं की गई है? यदि हां तो क्या सरकार सातवें चरण की शिक्षक नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी करने का विचार रखती है? मंत्रीजी ने इसका जवाब दिया है कि वस्तुस्थिति यह है कि सातवें चरण की शिक्षक बहाली को लेकर नई नियमावली विचाराधीन है। इसके उपरान्त ही बहाली की कार्रवाई की जाएगी। इस जवाब में विरोधाभास यह था कि पहले जानकारी आई थी कि नियमावली तैयार हो चुकी है और अब विधानसभा में कहा जा रहा है कि विचाराधीन है।
शिक्षा और रोजगार पर मंत्रीजी से कोई सवाल ना करें
मनोज मंजिल सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं। जहां वे बिहार सरकार से पूछ रहे हैं कि 'बिहार के विश्वविद्यालयों में 55 फ़ीसदी शिक्षक और 56 फ़ीसदी कर्मचारियों के पद रिक्त हैं। सरकार अविलंब इन सीटों पर बहालियां निकाल कर रिक्त पदों को क्यों नहीं भर रही है?' इसका जवाब भी मंत्रीजी नहीं देते। बिहार के शिक्षा मंत्री शिक्षा और रोजगार के सवाल छोड़कर, हर एक मुद्दे पर बात करने को तैयार हैं। आप उनसे मनु स्मृति, रामचरितमानस, बंच आफ थॉटस किसी भी मुद्दे पर बात कर सकते हैं। बस बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लेकर कोई सवाल जवाब मत करिए।
आज की सच्चाई यह है कि बिहार को एक ऐसा शिक्षा मंत्री राष्ट्रीय जनता दल ने दिया है, जिसके पास शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों के जवाब नहीं हैं। उनके बयानों को पढ़कर ऐसा ही लगता है कि वे बिहार की जनता को उन सवालों के बीच भटकाना चाहते हैं, जिसमें उलझ कर वह दशकों से अपने लिए पलायन का रास्ता चुनती रही है। बहरहाल बिहार के शिक्षा मंत्री के पास प्रदेश के लिए बेहतर शिक्षा का कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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