Nitish Kumar Statement: नीतीश का कांग्रेस से इजहार ए इश्क

राजद के विधायक सुधाकर सिंह ने नीतीश कुमार को कहीं से भी चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है। एक तरफ अदना सा विधायक नीतीश को विधानसभा चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहा है।

bihar cm Nitish Kumars expression of love with Congress

हाल ही में एक मीडिया ग्रुप के सर्वेक्षण में कहा गया था कि अगर आज लोकसभा चुनाव होते हैं, तो यूपीए की सीटें 92 से बढ़कर 153 हो जाएंगी। भाजपा को अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। हालांकि अपन अच्छी तरह जानते हैं कि चुनावों से साल भर पहले इसी तरह के सर्वेक्षण 2013 और 2018 में भी आए थे। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, मीडिया घराने और सर्वेक्षण एजेंसियां अपने नतीजे बदलने लगते हैं।

जिस मीडिया घराने का इस बार का चुनाव सर्वेक्षण प्रचारित किया जा रहा है, उसी मीडिया घराने ने जुलाई 2018 के चुनाव सर्वेक्षण में कहा था कि भाजपा की सीटें 282 से घट कर 245 हो जाएंगी, जबकि भाजपा की सीटें बढ़कर 303 हो गई थीं । इसी सर्वेक्षण में कांग्रेस की सीटें 44 से बढ़कर 83 सीटें मिलने का अनुमान बताया गया था, जबकि कांग्रेस की सिर्फ 8 सीटें बढीं थीं। इसलिए कोई कारण नहीं कि ऐसे चुनाव सर्वेक्षण पर भरोसा किया जाए।

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फिर भी सर्वेक्षण में महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार के बारे में हुई भविष्यवाणी चौंकाने वाली है। इन तीनों राज्यों में एनडीए को 67 सीटों का नुकसान होने की बात कही गई है। शायद इसका कारण बिहार में जदयू का और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का एनडीए से अलग होना हो। लेकिन कर्नाटक में ऐसा कोई कारण नहीं दिखता। जहां तक महाराष्ट्र का सवाल है, तो एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता मिलने और राज ठाकरे का एकनाथ शिंदे को समर्थन होने के कारण लगता नहीं कि एनडीए को महाराष्ट्र में कोई नुकसान होगा। वैसे इसका पता जल्द ही होने वाले मुम्बई और पूना महानगर पालिकाओं के चुनावों से लग जाएगा।

लेकिन एक मीडिया घराने के चुनाव सर्वेक्षण से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेहद उत्साहित हैं क्योंकि सर्वेक्षण में कहा गया है कि बिहार में यूपीए की सीटें एक से बढ़कर 25 हो जाएंगी। एनडीए से गठबंधन तोड़ने के बाद से नीतीश कुमार इस फिराक में थे कि विपक्षी पार्टियां उनके नेतृत्व में एकजुट हो जाएं और समूचा विपक्ष उनके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़े। कांग्रेस ने दो टूक कहा था कि वह उन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार हैं, जहां वे कांग्रेस से ज्यादा ताकतवर हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा नहीं हो सकता।

कांग्रेस ने ममता बनर्जी, चंद्रशेखर राव, अरविन्द केजरीवाल और नीतीश कुमार की गैर कांग्रेसी नेतृत्व की कोशिशों को नाकाम करने के लिए राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा करवाई थी। ममता बनर्जी उपराष्ट्रपति के चुनाव के समय से ही विपक्षी एकता की कोशिशों से लगभग पीछे हट चुकी हैं। उनका लक्ष्य पहले तृणमूल कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी बनवाना है, इसलिए वह त्रिपुरा के बाद मेघालय में पूरी ताकत से लड़ रही हैं, ताकि टीएमसी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाए। अरविन्द केजरीवाल और केसीआर ने अपना मोर्चा बना लिया है।

नीतीश कुमार ने आखिरकार मैदान छोड़ दिया है, 18 फरवरी को उन्होंने कहा कि कांग्रेस को विपक्षी एकता की पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर विपक्षी एकता हो गई तो भाजपा की सौ से ज्यादा सीटें नहीं आएंगी, लेकिन अगर गठबंधन नहीं हुआ तो सब जानते हैं कि क्या होगा। चुनावी सर्वेक्षण से गैर भाजपा दलों के हौंसले बढ़े हुए हैं, उन्हें लगता है कि थोड़ा जोर लगा दिया जाए तो भाजपा को सत्ता से बाहर किया जा सकता है। नीतीश कुमार के बयान पर सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सवाल सिर्फ यह है कि आई लव यू पहले कौन कहे। जबकि नीतीश कुमार ने वेलेंटाईन डे के चौथे दिन कांग्रेस को सार्वजनिक तौर पर आई लव यू के साथ आई वांट टू मैरी यू भी कह दिया है।

अपन फिर चुनाव सर्वेक्षण पर आते हैं। हालांकि 2014 और 2019 में चुनाव सर्वेक्षण गलत साबित हो चुके हैं, लेकिन इस चुनाव सर्वेक्षण में भी एनडीए को 298 सीटें मिलने की बात कही गई है, जो बहुमत से 26 ज्यादा है। यूपीए को 153 सीटें मिलने और अन्य दलों को 92 सीटें मिलने की बात कही है। गैर भाजपा दलों की मोदी सरकार को अपदस्थ करने की गलतफहमी यहीं पर खत्म हो जाती है, क्योंकि गैर भाजपा, गैर कांग्रेस दलों में से सारे दल भाजपा विरोधी नहीं है।

नीतीश कुमार को पता नहीं कैसे लगता है कि ये सभी क्षेत्रीय दल भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता में शामिल किए जा सकते हैं। नीतीश कुमार के अति उत्साहित होकर भाजपा को सौ सीटों पर निपटाने का बड़बोलापन असल में इसी सर्वेक्षण में ही छिपा है। जिसमें कहा गया है कि बिहार में यूपीए को 40 में से 25 सीटें मिल जाएंगी, जबकि पिछली बार सिर्फ एक सीट मिली थी।

असल में नीतीश कुमार का पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन था और भाजपा ने 2014 में अपनी जीती हुई पांच सीटें भी जदयू को दे दी थीं, जिस कारण जदयू 16 सीटें जीत गईं थीं। नीतीश कुमार को शायद 2014 याद नहीं है, जब नीतीश कुमार और लालू यादव साथ साथ थे, फिर भी समूचे विपक्ष को 9 और एनडीए को 31 सीटें मिली थी।

पिछले दस सालों में स्थिति में बहुत बदलाव आया है, 2014 में नरेंद्र मोदी का कद इतना बड़ा नहीं था, जितना इस समय है। जब इस सर्वेक्षण के मुताबिक़ ही देश का भरोसा अभी भी नरेंद्र मोदी के साथ बना हुआ है, और बिहार की परिस्थितियां लगभग 2014 वाली बन रही हैं। उपेन्द्र कुशवाहा जदयू से बाहर आने वाले हैं, नीतीश कुमार की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है, तो एनडीए की सीटें बढ़ेंगी, न कि यूपीए की।

नीतीश कुमार इन दिनों बिहार की यात्रा पर निकले हुए हैं, इस यात्रा के दौरान उन्हें आए दिन लोगों, खासकर किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। गठबंधन सरकार के विधायक ही सरकार पर निशाना साध रहे हैं। कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने वाले शनिवार के बयान से एक दिन पहले नीतीश कुमार ने राज्य में किसानों की स्थिति सुधरने की बात कही थी। इस पर पूर्व कृषि मंत्री और राजद विधायक सुधाकर सिंह ने नीतीश कुमार को चिठ्ठी लिखकर उनके दावे को चुनौती दी। चिठ्ठी में उन्होंने लिखा कि दूसरे और तीसरे कृषि रोड मैप में बिहार के किसानों की आमदनी बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

सुधाकर सिंह ने इस चिठ्ठी में कहा कि 24 मार्च 2022 को संसद में पेश संसदीय समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि मेघालय के किसान हर महीने औसतन 29,348 रुपये कमाते है, पंजाब के किसान हर महीने 26,701 रुपए कमाते हैं, जबकि बिहार के किसान परिवारों की मासिक आय देश के 27 राज्यों की तुलना में सबसे निचले स्तर पर औसतन 7,542 रुपए महीना है। उन्होंने नीतीश कुमार को अगले चुनाव में कहीं से भी चुनाव लड़ने की चुनौती भी दी है। अब एक तरफ सहयोगी दल का अदना सा विधायक तक उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहा है, और दूसरी तरफ नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी को चुनौती दे रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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