Nitish Kumar: जानबूझ कर भ्रम पैदा करते हैं नीतीश

Nitish Kumar: पिछले दिनों बिहार के मोतीहारी में 2014 में केंद्रीय विश्वविद्यालय देने के लिए एनडीए की सरकार को साधुवाद और भाजपा के कुछ नेताओं को पुराने मित्र कह कर एक बार फिर नीतीश कुमार ने इस चर्चा को गर्म कर दिया कि कहीं वह भाजपा के साथ फिर से आने की तो नहीं सोच रहे हैं। लेकिन नीतीश को जानने वाले इस तरह की बातों को अब तव्वजो नहीं देते, क्योंकि उन्हें मालूम है कि बिहार के मुख्यमंत्री अपने बारे में चर्चा करवाने के लिए खूब जाने जाते हैं। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने एक बार यूं ही नहीं कहा था कि नीतीश के पेट में दांत है।

2005 से लेकर आज तक नीतीश की कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी कि वह अपनी पार्टी के दम पर सरकार बनाने या बनाये रहने की ताकत रखते हों। हर बार उन्हें किसी न किसी बैसाखी की जरूरत पड़ी। पर उनकी कौशलता या बिहार की राजनीति की मजबूरी कहें कि 2005 से लेकर आज तक, सिवाय इसके कि कुछ महीनों के लिए जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कमान दी गई, नीतीश कुमार ही लगातार सरकार का नेतृत्व करते आए हैं। हां बारी बारी से उन्होंने सहयोगी जरूर बदले हैं। लगभग 19 साल में वह आठ बार मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि उन्होंने किसी के साथ भी स्थाई दोस्ती या दुश्मनी कभी नहीं की।

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अभी तक के अपने राजनीतिक जीवन में नीतीश को इतनी उलझन कभी नहीं रही, जितनी इस समय है। उन्होंने विपक्ष को एक सू़त्र में बांधने की पहल तो की, लेकिन इसका नेतृत्व उन्हें मिलेगा इसको लेकर वह जरा भी आश्वस्त नहीं है। कई बार वह खुद भी इस पर बयान दे चुके हैं कि उनका मकसद इंडिया गठबंधन का संयोजक बनना बिल्कुल नहीं है।

उनके संयोजक बनने में बाधा भी बिहार से ही खड़ी हुई, जब राहुल गांधी को अपने करीब पा कर राजद प्रमुख लालू यादव ने यह बयान दे दिया कि इंडिया गठबंधन का एक नहीं कई संयोजक हो सकते हैं। पिछले कुछ दिनों से इंडिया गठबंधन भी ठंडा पड़ा हुआ है। बल्कि आपसी तकरार में घुस गया है। कांग्रेस को लेकर सपा और आम आदमी पार्टी काफी नकारात्मक और अग्रेसिव व्यवहार कर रहे हैं। जाहिर है इसे ठंडा करने का दायित्व कम से कम नीतीश कुमार को किसी ने नहीं दिया है।

नीतीश को बिहार में ही बहुत सारी चुनौतियां झेलनी पड़ रही है। खास कर सरकार चलाने के नीतीश के तरीके से राजद के लोग कसमसा रहे हैं। ना तो केबिनेट का विस्तार हो पा रहा है और ना सीटों के गठबंधन को लेकर ही कोई विचार विमर्श शुरू हुआ है। राजद और नीतीश की पार्टी के नेता एक दूसरे के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहे हैं और सतर्क निगाहों से एक दूसरे की गातिविधियां देख रहे हैं। कई फैसले ऐसे हैं जिनको लेकर राजद नेताओं में नाराजगी भी है।

नाराज तो कांग्रेस भी है। गठबंधन में शामिल होने के बावजूद कांग्रेस के विधायकों को उनके कोटे के अनुसार मंत्री पद नहीं दिया जा रहा है। अभी बिहार में सिर्फ दो कांग्रेस विधायकों को ही मंत्री पद मिला है, जबकि कांग्रेस का दावा है कि उनके कोटे में चार मंत्री का वायदा किया गया था। बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह खुलेआम कह चुके हैं कि मौजूदा बिहार सरकार में कांग्रेस की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

नीतीश को मालूम है कि बिहार विधानसभा के चुनाव से पहले ही उनका और उनकी पार्टी जनता दल यू के भाग्य का फैसला हो जाएगा। क्योंकि लोक सभा के चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन ही बिहार विधान सभा के चुनाव की दिशा तय करेगा। पर उसके लिए जरूरी है कि लोक सभा की अधिकतम सीटों पर नीतीश अपनी पार्टी के लोगों को जिता सकें। मौजूदा लोकसभा में जदयू के 16 सांसद हैं और इंडिया गठबंधन में 28 राजनीतिक पार्टियां हैं। कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यू, भाकपा और माकपा बिहार में टिकटों की प्रबल दावेदार पार्टियों में है। आम आदमी पार्टी इस समय राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के साथ देशव्यापी चुनाव लड़ने की तैयारी में है।

ऐसे में जनता दल यू को 16 ससंदीय सीटें मिल ही जाएंगी, यही सुनिश्चित नहीं है। कम से कम आपसी सहयोग के आधार पर तो यह संभव नहीं लगता। बिहार का कोई ऐसा संसदीय क्षेत्र नहीं है जहां राजद और जदयू के उम्मीदवार अलग अलग लड़ने की तैयारी नहीं कर रहे हैं। ऐसे में नीतीश के पास सिवाय इसके कि वह राजद को अपने बारे में सशंकित रखें, कोई अन्य उपाय नहीं है।

नीतीश के लिए सबसे बड़ा खतरा अपने लोगों से ही है। जदयू के भीतर काफी घुटन है। ना सिर्फ अपने भविष्य को लेकर जदयू के नेता आशंकित हैं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व पर ही उनके मन में सवाल खड़े हो रहे हैं। मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का जदयू के नेताओं के साथ नजदीक का संपर्क ही नहीं है। उनके खेमे के कुछ नेताओं को ही उनके निकट जाने का अवसर मिल पाता है, बाकी नेताओं के लिए उनका व्यवहार भी मधुरता का नहीं है। ऐसे में यदि नीतीश इसी नेतृत्व के साथ आगे चलने का फैसला बरकरार रखते हैं तो पार्टी में कभी भी विद्रोह हो सकता है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएगा वैसे वैसे जदयू नेताओं की बेचैनी भी बढ़ेगी।

नीतीश संभवतः इसीलिए भाजपा के प्रति भी प्रेम का भ्रम बनाए रखे हुए हैं। नीतीश ऐसा पहले भी कर चुके हैं। भाजपा के साथ सरकार चलाने के दौरान भी वह कभी छठ के नाम पर तो कभी बीमारी का हाल पूछने तो कभी रोजा इफ्तार के बहाने भी राबड़ी देवी और लालू यादव से मिलते रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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