Karpoori Thakur: भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के कुछ यादगार किस्से
Karpoori Thakur: 22 नवंबर 2005 की तारीख। बिहार की राजनीति बदल चुकी थी। नीतीश कुमार की अगुआई में जनता दल-यू और बीजेपी गठबंधन भारी जीत हासिल करके सरकार बनाने की तैयारी में जुट गया था।

इसी बीच नीतीश कुमार को दिल्ली से एक फोन गया। फोन उनके एक पुराने साथी का था, जो कांग्रेस में है।
फोन पर बधाई के बाद दिल्ली वाले नेता ने नीतीश से सिफारिश की, रामनाथ ठाकुर को मंत्री जरूर बनाना। तर्क यह दिया कि रामनाथ की बेटी शादी योग्य हो चुकी है। अगर ठाकुर मंत्री बन जाते हैं तो बिहार की परंपरा और रूढ़ियों के हिसाब से विवाह करने में आसानी रहेगी। कांग्रेसी नेता का तर्क था कि रामनाथ के पिता ने ताजिंदगी कुछ नहीं कमाया, लिहाजा रामनाथ के पास भी कुछ नहीं है।
यहां यह बताना जरूरी नहीं है कि रामनाथ ठाकुर मंत्री बनाए गए। भले ही रामनाथ ठाकुर के पिता कर्पूरी ठाकुर ने अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया, लेकिन उनका व्यक्तित्व कैसा था, यह बताने के लिए भारत सरकार का ताजा फैसला काफी है। मोदी सरकार ने भारतीय राजनीति में जननायक के रूप में विख्यात कर्पूरी ठाकुर को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत करने का फैसला किया है।
कर्पूरी को भारत रत्न दिया जाना एक तरह से राजनीति में उस फक्कड़ता का सम्मान है, जिसका बिहार की राजनीति ने कभी भ्रष्टाचार के जरिए अकूत कमाई करके मखौल उड़ाया तो कभी बाहुबल की राजनीति को प्रश्रय देकर कर्पूरी के राजनीतिक मूल्यों को चुनौती दी।
कर्पूरी ठाकुर दो-दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। पहली बार 1970 और दूसरी बार 1978 में। लेकिन उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। उनके बेटे के एक सहपाठी बताते हैं कि पटना में विधायक रहते हुए कर्पूरी जी अक्सर उनके पिता से कर्ज लेते थे। वे कर्ज अपने लिए नहीं लेते थे, बल्कि किसी छात्र की फीस के लिए लेते या बिहार के सुदूर से आए किसी व्यक्ति को वापसी के किराए के लिए लेते।
उस सज्जन के मुताबिक, विधायक के रूप में वेतन आते ही वे उनके पिता का कर्ज चुका देते। लेकिन दस-पंद्रह दिन बाद ही वे फिर से ऐसी ही मांगे लेकर आ जाते। लेकिन जरा कर्पूरी के चेलों को देखिए। आज उनके पास अकूत संपत्ति है। उन पर ईडी की निगाह है, सीबीआई की निगाह है और आयकर विभाग का चाबुक चल रहा है। नीतीश सरकार में मंत्री रहे उनके बेटे रामनाथ ठाकुर के सामने अपने बचपन के वे एक-एक दृश्य अब अगर याद आ रहे हों, जिनमें फाकामस्ती थी, ठीक कपड़े न थे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
कर्पूरी ठाकुर भले ही मुख्यमंत्री रहे, लेकिन बिहार की सामंती मानसिकता ने उनको जीते-जी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार रहे। एक बार उनके पिता को दबंगों ने पीट दिया। पुलिस ने आनन-फानन में आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन कर्पूरी ने उन्हें छुड़वा दिया। यह कहते हुए कि बिहार में दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों पर रोजाना ऐसे हमले होते हैं। पहले उन्हें रोकना होगा। क्या आज के किसी राजनेता से ऐसी गांधीवादी सोच की उम्मीद आप कर सकते हैं।
कर्पूरी ठाकुर के साथ हुई बदसलूकी की कई कहानियां उन्हें भारत रत्न सम्मान मिलने के बाद बिहार के चट्टी-चौराहों पर सुनी-सुनाई जा रहीं हैं। ऐसा ही एक किस्सा है उनकी बीमारी का। अपने आखिरी दिनों में एक बार वे बहुत बीमार पड़े। उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए आज के बिहार के एक कद्दावर नेता से कर्पूरी जी के एक शुभचिंतक ने जीप मांगी। लेकिन उन्होंने जीप देने से इंकार कर दिया था।
कर्पूरी जी की आज बलैया लेने वालों ने उन्हें बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से जबरदस्ती हटा दिया था। उनके ही युवा सहयोगियों के षड्यंत्र के बाद तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष शिवचंद्र झा ने कर्पूरी ठाकुर को नेता प्रतिपक्ष पद से हटा दिया था। उसके बाद लालू यादव नेता प्रतिपक्ष बने थे।
कर्पूरी ठाकुर बाद में राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्हें दिल्ली के राजेंद्र प्रसाद रोड पर घर आवंटित हुआ था। एक बार गर्मियों में उनके घर में आग लग गई। लेकिन उनकी मदद के लिए उनके ही चेले रहे एक बड़े समाजवादी नेता नहीं पहुंचे थे। इसे लेकर महीनों तक उस नेता के खिलाफ सार्वजनिक चर्चा होती रही।
1967 में जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर बिहार में भी संविद सरकार बनाई। कर्पूरी उसमें उप मुख्यमंत्री बने। सोशलिस्टों के नायक राममनोहर लोहिया ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया था कि पढ़ाई से अंग्रेजी की बाध्यता हटाएं।
कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ बिहार के शिक्षा मंत्री भी थे। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर दी। अंग्रेजी के चलते तब बहुत छात्र मैट्रिक की परीक्षा पास नहीं कर पाते थे। लेकिन कर्पूरी जी के फैसले के बाद बहुत छात्रों को सहूलियत हो गई। उस दौरान पास लोगों के लिए शब्द चला, कर्पूरी डिविजन, यानी फर्स्ट, सेकंड और थर्ड डिविजन की तर्ज पर कर्पूरी डिविजन।
आज मंडल आयोग की सिफारिश और उससे मिले आरक्षण की खूब चर्चा है। कर्पूरी ठाकुर ने इसके बरसों पहले मुख्यमंत्री रहते मुंगेरीलाल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर राज्य में पिछड़ों को बारह फीसद का आरक्षण दे दिया था। उसमें चार फीसद आरक्षण यादव, कुशवाहा जैसी दबंग जातियों के लिए था, जबकि बारह फीसद अति पिछड़ी जातियों के लिए।
तब कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ बहुत ही गंदा नारा लगता था, ई आरक्षण कहां से आई...नारे की दूसरी पंक्ति को यहां लिखा नहीं जा सकता। तब एक और नारा लगता था, कर्पूरी, कर्पूरा, उठा उस्तरा। यानी राजनीति छोड़ो और जाओ नाई का काम करो। यहां बता देना जरूरी है कि कर्पूरी नाई जाति से थे।
कर्पूरी ठाकुर को ईश्वर ने महज 64 साल की आयु दी। 1924 में पैदा होनेवाले कर्पूरी ठाकुर का 1988 में निधन हो गया था। राजनीति में 64 साल की आयु बेहद छोटी मानी जाती है। इतनी आयु में उन्होंने राजनीति और समाजनीति की दुनिया में जितनी बड़ी लकीर खींच दी, उनके बाद समाजवादी धारा के दूसरे किसी नेता ने नहीं खींची।
हालांकि पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें तमाम तरह के राजनीतिक दबाव भी झेलने पड़े। इतना कि उन्हें सात हफ्ते के भीतर पांच बार मंत्रिमंडल विस्तार करना पड़ा, जिससे उनके मंत्रिमंडल में 41 मंत्री हो गए थे। उस समय उनकी सरकार को तीन निर्दलीय समर्थन कर रहे थे। लेकिन वे किसी एक को ही मंत्री बना सकते थे, जबकि दावेदारी तीनों की थी।
इसके चलते कर्पूरी ठाकुर ने रास्ता निकाला, पर्ची निकालने का। जिसके नाम की पर्ची निकली, उसे मंत्री बना दिया। मुख्यमंत्री बनते ही कर्पूरी ने एक और बड़ा काम किया। उस समय राज्य में सालों से इंजीनियरिंग पास छात्रों को नौकरी नहीं मिल रही थी। उन्होंने पटना में शामियाना लगाकर बेरोजगार इंजीनियरों को नौकरी दी थी।
कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने बड़ा काम किया है। मोदी की कोशिश बिहार में पिछड़ों की राजनीति कर रहे लालू और नीतीश के आधार में सेंध लगाने की है। हो सकता है कि कुछ दिनों में इसी फैसले के बहाने नीतीश एक बार फिर लालू का साथ छोड़कर भाजपा के साथ आ जाएं।
कर्पूरी के सहयोगियों की उनके निधन के बाद देश में चार-चार सरकारें रहीं। लालू यादव तो दस साल तक मनमोहन सरकार में रहे। कर्पूरी को भारत रत्न देने का किसी ने नहीं सोचा, लेकिन भाजपा ने ऐसा किया है तो निश्चित तौर पर इसे उसका फायदा मिलेगा। राज्य की 63 फीसद पिछड़ी आबादी में तो वह सेंध लगाएगी ही। खुद प्रधानमंत्री ने जिस तरह खुद कर्पूरी जी की सौंवी जयंती पर देश के तमाम अखबारों में लेख लिखा है, उसका संदेश भी यही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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