Bharat and G20: बहुध्रुवीय विश्व बनाने की दिशा में भारत की निर्णायक पहल

Bharat and G20: जी 20 के दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अब कोई भी देश दुनिया का चौधरी नहीं रहा। दिल्ली डिक्लयेरशन या दिल्ली घोषणा पत्र ने एक साथ कई मिथकों को तोड़ डाला है। ना तो अमेरिका समेत पश्चिम के देश अपनी मर्जी से कोई शब्द या वाक्य जुड़वा सकें, और ना ही चीन और रूस के एजेंडे को कोई जगह दी गई। जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक वाक्य कहा कि, बाली बाली था और दिल्ली दिल्ली है, तब बहुतों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि भारत ने अपनी अध्यक्षता में वही किया जो वह करना चाहता था।

खुद रूस के विदेश मंत्री इस बात पर अचंभित थे कि भारत ने यह कारनामा किया कैसे? लावरोव के शब्द थे- "मैं भारत की भूमिका की सराहना करता हूं, और जोर देकर यह कहना चाहता हूं कि जी 20 के सदस्य देश अपने व्यक्तिगत एजेंडे को ना चलाएं। दिल्ली डिक्लेयरेशन में सब कुछ संतुलित था। सभी सदस्य देशों ने शांति सुरक्षा और आपसी टकरावों को खत्म करने के उपायों पर साथ चलने पर सहमति जताई।'' यही लावरोव थे जिन्होंने दिल्ली शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर कहा था कि यदि जी 20 सम्मेलन में यूक्रेन पर रूस के नजरिए को स्वीकार नहीं किया गया तो रूस घोषणा पत्र जारी नहीं करने देगा।

Bharat and G20: Indias decisive initiative towards creating a multipolar world

भारत ने रूस की इस धमकी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ना ही रूस के नजरिए को समझने और पश्चिम के देशों के प्रति उसकी राय पर ध्यान ही दिया। बल्कि प्रस्ताव में यह बात शामिल करा दी कि कोई भी देश किसी राजनीतिक रूप से संप्रभु देश पर कब्जे के लिए हमला नहीं करेगा और ना ही परमाणु युद्ध के किसी विकल्प पर विचार करेगा। बात साफ थी कि युद्ध का डर कई देश एक दूसरे को दिखाते रहते हैं इसलिए रूस तक ही यह बात सीमित नहीं रहनी चाहिए।

भारत ने इस संबंध में बहुत ही साफ रूख रखा और सीधा तर्क दिया कि जी 20 मंच पर आर्थिक समस्याओं पर ही चर्चा हो सकती है, सुरक्षा संबंधी विषयों पर नहीं। इसलिए अमेरिका, कनाडा और फ्रांस की इस पहल पर कि कम से कम बाली की तरह यहां भी यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की आलोचना होनी चाहिए भारत ने इससे इंकार कर दिया। जिन देशों ने बाली का उदाहरण दिया उन्हीं के लिए एस जयशंकर ने कहा था कि बाली, बाली था, दिल्ली, दिल्ली है।

पिछले साल तक जी 20 को अपाहिज बताने वाले चीन ने दिल्ली सम्मेलन के बाद कहा है कि कुछ बड़े देशों के बीच उभरे गंभीर मतभेदों और टकरावों के बावजूद जी 20 वैश्विक व्यवस्था के संचालन का सबसे उपयुक्त मंच है। चीन की न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने लिखा- 'दिल्ली सम्मेलन में दुनिया के प्रमुख देशों के नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग पर अपनी वचनवद्धता दुहराई यह एक बड़ी बात थी।'

चीन के ग्लोबल टाइम्स ने चाइना फॅारेन अफेयर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ली हैडोंग के हवाले से लिखा है - 'दिल्ली के ज्वाइंट डिक्लेरेशन से स्पष्ट होता है कि विकासशील देशों की ताकत बढ़ रही हैं और पश्चिम की आर्थिक महाशक्तियों के मुकाबले वे जी 20 को ज्यादा अच्छे तरीके से एक तटस्थ तंत्र के रूप में विकसित कर रहे हैं। अब जी 20 पश्चिम के कंट्रोल से बाहर आ रहा है, क्योंकि पिछले साल इंडोनेशिया में हुए शिखर सम्मेलन में पश्चिम के देशों ने संयुक्त घोषणा में अपने शब्द डलवा दिए थे, लेकिन दिल्ली में वे ऐसा नही कर सके।'

भारत की भूमिका आने वाले दिनों में विश्व व्यवस्था में क्या होगी, इस जी 20 की बैठक के बाद इस पर भी चर्चा होने लगी है। भारत में पाकिस्तान के राजदूत रहे अब्दुल बासित ने रविवार की शाम को एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें जी 20 में घोषित भारत से पश्चिम एशिया होकर यूरोप तक समुद्री व्यापार बढ़ाने और बीच में रेल लाइन बिछाने पर चर्चा हो रही थी। उस चर्चा में भाग लेने वाले पाकिस्तान के अर्थशास्त्रियों ने चीन के मौजूदा आर्थिक हालत बिगड़ने और भारत के सुपर पावर बनने की संभावनाओं पर खुल कर विचार व्यक्त किया और यह कहने में संकोच नहीं किया कि चीन अंदरूनी रूप से खोखला हो चुका है और भारत अपनी ताकत बढ़ा चुका है। चूंकि आने वाले दशक में वैश्विक विकास का आधार एशिया रहने वाला है, इसलिए भारत की लीडरशिप बहुत मायने रखने वाली है।

मोदी ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जो एशिया का नेतृृत्व कर सकते हैं। जाहिर है पाकिस्तान और चीन की संयुक्त परियोजना सीपैक इस समय खतरे में हैं। अब अमेरिका-यूरोप-अरब और भारत के साथ आने और भारत से यूरोप तक व्यापार बढ़ाने के लिए समुद्री और रेल मार्ग की परियोजना के सामने आने से पाकिस्तान को अपने अस्तित्व पर भी खतरा महसूस हो रहा है।

भारत की आर्थिक महाशक्ति बनने और अमेरिका और यूरोप के साथ होने के बाद एक बार फिर से सुरक्षा परिषद की सदस्यता का भारत का दावा मजबूत दिखाई दे रहा है। खासकर तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान का खुलकर भारत का समर्थन करना बहुत मायने रखता है। उनका समर्थन यह भी स्पष्ट करता है कि तुर्किये की व्यापारिक संभावनाओं की जो अधिकता भारत के साथ है वह पाकिस्तान या चीन के साथ नहीं है।

अब पहली बार चीन यह कह रहा है कि भारत ने अपना एक स्वतंत्र विचार रखकर जी 20 सम्मेलन की अध्यक्षता की है और वह अमेरिका के प्रभाव से बाहर है तो यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत के दावे को चीन भी इस बार चुनौती नहीं देगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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