Bank Crisis in China: अमेरिका के बाद अब चीन की बैंकिंग व्यवस्था पर संकट?
आर्थिक दृष्टिकोण से अमेरिका के बाद चीन दुनिया का सबसे मजबूत देश है, पर वहां की व्यवस्था एक बंद किताब की तरह है। चीन के लोगों को ही चीनी बैंकिंग पर भरोसा नहीं है।

Bank Crisis in China: सिलीकॉन वैली बैंक के डूबने और क्रेेडिट सुइस बैंक के संकट में आ जाने के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि इन बैंकों के दिवालिया होने का असर कई और देशों पर आ सकता है, उनमें चीन भी है। चीन का बैंकिंग सिस्टम वैसे तो वहां की सरकार के पूर्ण संरक्षण में है, लेकिन विदेशों में कारोबार और मेनलैंड चीन में ही रियल एस्टेट समेत कई धंधों के डूबने के कारण वहां के बैंक भी गहरे संकट में आ सकते हैं और चीन का बैंकिंग सिस्टम भी ध्वस्त हो सकता है।
चीन के बैंकिंग सिस्टम को लेकर चीनी नागरिक खुद भी आशंकित हैं। सिलिकॉन वैली बैक के डूबने के बाद से ही चीनी अधिकारी और सरकार के नुमाइंदे यह प्रचार में लगे हैं कि चीन का बैंकिंग सिस्टम दुरूस्त है और वह अमेरिका और यूरोप के बैंकों पर आए संकट को आसानी से झेल सकता है। सिलिकॉन वैली बैंक के डूबने का तत्काल असर यह हो सकता है कि चीन की दर्जनों आईटी कंपनियों एवं स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय सहयोग रूक सकता है और उनके प्रोजेक्ट्स बंद हो सकते हैं। लेकिन बड़ा असर यह होगा कि चीन के बैंक भी अनिश्चितता का शिकार हो सकते हैं। एक तरफ चीन ने कैपिटल रिजर्व रेशियो में कमी कर 56 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी बाजार में छोड़ी है, वहीं दूसरी तरफ इकोनॉमिक स्लो डाऊन होने और नाॅन परफार्मिंग बैंक लोन के बढ़ने से बैकिंग कर्ज उठाव में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हो रही है। इससे बैंकों के आपसी ब्याज का बोझ बढ़ेगा।
इसी माह दो बड़ी रिपोर्ट चीन की वित्तीय स्थिति और बैंकिंग के बारे में आई हैं, जिनसे पता चलता है कि चीन के बैंक भी जोखिम वाले क्षेत्र में हैं। 15 मार्च को रेटिंग एजेंसी मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में चीन के बैंकों को निगेटिव लिस्ट में रखा और यह दावा किया कि कोविड के बाद कर्जदाताओं और कर्ज लेने वाले के बीच बिठाए जाने वाले सामंजस्य का बोझ चीन के बैंकों पर आएगा और इस कारण अगले 12 से 18 महीने में बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभदायकता पर बहुत असर होगा। इसलिए चीन की बैंकिंग व्यवस्था के प्रति हमारा दृष्टिकोण नकारात्मक ही बना रहेगा।
उल्लेखनीय है कि मूडीज ने नवंबर 2022 में चीन की बैंकिंग व्यवस्था को संतुलित से नकारात्मक श्रेणी में डाला था। मूडीज ने यह रेटिंग चीन के बैंकों की अंतिम तिमाही के वित्तीय नतीजों को देखने के बाद की है। मूडीज का कहना है कि चीन की कोविड नीति ने व्यक्तिगत और कॉरपोरेट दोनों की बैलेंसशीट को बिगाड़ कर रख दिया है और इनको ठीक होने में सालों लग जाएंगे, भले ही चीन की आर्थिक प्रगति पटरी पर लौट रही हो।
चीन के बैंक इस समय एनपीएल यानी नॉन परफार्मिंग लोन्स की समस्या से जूझ रहे हैं। दिए गए लोन की वसूली नहीं हो पा रही है। चीन के व्यापारियों को नए कर्ज मिल नहीं रहे हैं और उनके पास वित्त की कोई ओर वैकल्पिक व्यवस्था करना इस समय कठिन है। मूडीज का आंकलन है कि परिसंपत्तियों की बिक्री से होने वाली भरपाई में चीन के बैंकों को तीन प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
फरवरी में आईएमएफ की एक रिपोर्ट से भी चीन परेशान है। आईएमएफ का कहना है कि चीन के रियल एस्टेट का बिजनेस संकट अभी टला नहीं है और चीन को इसके लिए अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा। चीन का रियल एस्टेट बिजनेस उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है क्योंकि चीन की कुल जीडीपी में रियल एस्टेट की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत की है। लेकिन यह उद्योग 2020 से ही संकट में है और चीन ने खुद ही अपने बैंकों को इस क्षेत्र में अधिक निवेश करने से रोक रखा है। क्योंकि रियल एस्टेट में चीन के बैंकों के कम से कम 300 अरब डॉलर डूबने के कगार पर हैं। चीन के रियल इस्टेट का संकट इतना बड़ा था कि आशंका जताई जाने लगी थी कि इसके कारण पूरी दुनिया का वित्तीय बाजार पंगु हो सकता था।
चीन की सरकार ने 2020 में रियल इस्टेट डेवलपर और होम बॉयर दोनों को लोन देने पर रोक लगा दी थी। चीन के बैंक इस संकट से निकलने के लिए इस समय 90 साल की आयु तक लोन चुकाने का प्रलोभन दे रहे हैं ताकि मकान बिक सके। पर अनुमान यह आ रहा है कि 2023 में भी चीन के प्रॉपर्टी कारोबार में 8 फीसदी की गिरावट आएगी। समाचार एजेंसी रायटर्स के अनुसार चीन के दो बड़े बैंक चाइना बैंक कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के 68 प्रतिशत और बैंक ऑफ चाइना के 20 प्रतिशत रियल एस्टेट लोन डूब गए हैं।
चीन का बैंकिंग कारोबार इस समय लगभग 53 ट्रिलियन डॉलर का है। केवल रियल एस्टेट का ही नहीं, बल्कि छोटे बिजनेस को दिए गए लोन भी डिफाल्ट हो रहे हैं। रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन के बारे में सबसे बड़ी अनिश्चितता यह है कि कोविड के बाद चीन क्या करने वाला है इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। यदि चीन की आर्थिक प्रगति धीमी रहती है और लोगों की आमदनी नहीं बढ़ती है तो लोग ना तो घर खरीदेंगे और ना ही कोई निवेश करेंगे। इससे बैंकों की आय भी कम होगी और इसका चक्रीय असर होगा। क्योंकि चीन आर्थिक विकास में प्राथमिक योगदान चीन के बैंकों का ही होता है।
चालू वित्तवर्ष की तीसरी तिमाही के नतीजे बताते हैं कि पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले इस साल चीन के बैंकों के लाभ में 11 प्रतिशत की कमी आई है। चीन के बैंकिंग सिस्टम की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसकी नीति बैंकिंग सिस्टम में लगे लोग नहीं बनाते, बल्कि चीन के सेंट्रल बैंक के गवर्नर का काम केवल बनाई हुई नीति को लागू करने का होता है। नीति बनाती है वहां की एक गुप्त व्यवस्था जिसमें चीन कम्यूनिस्ट पार्टी के लोग होते हैं। उसका सदस्य कौन कौन होता है, इसकी भी जानकारी लोगों को नहीं होती।
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चीन की व्यवस्था में पारदर्शिता बिल्कुल नहीं है। आए दिन यहां घोटाले होते हैं। पिछले साल जुलाई में चीन में एक बड़ा बैंक फ्रॉड सामने आया। चीन के 4 ग्रामीण बैंकों ने मिलकर 5.8 अरब डॉलर का घोटाला कर डाला। अपनी डूबती कमाई को निकालने के लिए जब लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया, तो उन्हें लाठियां मिली। अभी भी चीनी पूरी दुनियाभर में पोंजी स्कीम के लिए जाने जाते हैं। चीन का बैंकिंग सिस्टम बाहर से भले ही स्थिर दिखे, अंदर से हालात डावांडोल है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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