Odisha Train Accident: साजिश और सच के बीच बालासोर की ट्रेन दुर्घटना
वर्षों बाद किसी रेल दुर्घटना ने भारत को चौंका दिया है। उड़ीसा के बालासोर में हुई ट्रेन दुर्घटना जहां एक ओर रेलवे के सुरक्षा दावों की पोल खोलता है वहीं दूसरी ओर इसके पीछे किसी अवांछित साजिश की संभावना भी जताई जाने लगी है।

केन्द्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से ट्रेन दुर्घटनाओं में काफी कमी देखी गयी थी। जैसे आतंकवादियों के किये बम धमाकों की ख़बरें नहीं आतीं, वैसे ही ट्रेन दुर्घटनाओं की ख़बरें भी अब शायद ही सुनाई देती हैं। ऐसे में ओड़िसा के बालासोर से आयी ट्रेन दुर्घटना की खबर ने न केवल लोगों को परेशान कर दिया बल्कि पूरी सरकार को हिलाकर रख दिया है।
उड़ीसा के बालासोर में तीन ट्रेनों के आपस में टकराने की घटना शुक्रवार शाम सात बजे ही हो गयी थी। देर रात प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ट्रेन दुर्घटना में हताहत लोगों को मुआवजा देने वाली खबर भी आयी लेकिन इसका अंदाज नहीं था कि दुर्घटना इतनी भीषण होगी। सुबह होने के साथ ही ख़बरों में करीब नब्बे लोगों के ट्रेन दुर्घटना में मारे जाने की ख़बरें आने लगी थीं। जब तक दिन के ग्यारह बजते और राहत कार्यों में थोड़ी तेजी आती, तब तक पता चलने लगा कि घटना इससे भी कहीं अधिक वीभत्स है।
दोपहर होते होते ये पता चलने लगा था कि कोरोमंडल की इस दुर्घटना में करीब ढाई सौ से अधिक लोग मारे गए हैं, और कम से कम 900 लोग घायल हैं। जब दो के बदले तीन ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की बात पता चलने लगी तो और विस्तार पता चला। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक पहले तो कोरोमंडल-शालीमार एक्सप्रेस पटरी से उतरी और उसके कुछ डब्बे वहीं खड़ी एक मालगाड़ी पर जा गिरे। उसी वक्त दूसरी पटरी पर गिरे डब्बों से यशवंतपुर-हावड़ा सुपरफ़ास्ट आ टकराई। 6:50 से लेकर 7:10 के बीच हुई इस दुर्घटना में सैकड़ों की संख्या में यात्री मारे गए।
प्रधानमंत्री मोदी से लेकर ओड़िसा के मुख्यमंत्री पटनायक तक सभी राहत-बचाव कार्यों को देखने पहुंच गए। घटना की खबर मिलते ही स्थानीय नागरिक घायलों की मदद के लिए रक्तदान की लम्बी कतारों में खड़े दिखे। इन्हीं सब के बीच कुछ तथाकथित राजनीतिज्ञ ऐसी आपदा के काल में भी अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने भी आ बैठे।
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पूछना शुरू किया कि इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा कौन दे रहा है? ऐसा तब है जब वर्षों से कांग्रेसी शासन काल में हो रही रेल दुर्घटनाओं के लिए किसी राजनीतिज्ञ ने, किसी रेल मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। रेल मंत्री के इस्तीफे की घटना 1956 के दौर की है जब लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया था।
इसी एक विरासत को भुना-भुना कर खाते आये कुछ नेता आज भी रेलमंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं। इस बाबत रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अभी तो राहत एवं बचाव कार्य हमारी प्राथमिकता हैं। साथ ही सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि इसके पीछे कोई साजिश थी या मानवीय भूल, ये जांच के बाद ही पता चल पायेगा।
पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने साजिश वाली बात पर शंका भी जाहिर कर दी है। दिनेश त्रिवेदी ने कहा है कि एक्सीडेन्ट के जिस तरह के वीडियो सामने आये हैं उन्हें देखकर लगता है जैसे कोई साजिश रची गयी है। रेलवे की ओर से जो तात्कालिक जांच रिपोर्ट सामने आयी है उसमें सिग्नल के साथ छेड़छाड़ और मेन लाइन में तोड़फोड़ की आशंका व्यक्त की गयी है जिससे इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि क्या इस दुर्घटना के पीछे कोई साजिश थी?
कानपुर में 2016 में एक बड़ा रेल हादसा हुआ था। कानपुर के रेल हादसे में 150 लोगों की मौत हो गई थी। रेल हादसों में साजिश रचने के आरोप में एक शख्स शमशुल होदा को काठमांडू में गिरफ़्तार किया गया था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर दुबई में बैठकर शमशुल होदा भारतीय ट्रेनों को निशाना बना रहा था। नेपाल और भारत के दबाव के बाद, शमशुल होदा को दुबई से काठमांडू भेजा गया और वहां पहुंचने पर नेपाल पुलिस ने उसे गिरफ़्तार किया था।
इस मामले का खुलासा तब हुआ था जब नेपाल से गिरफ्तार बृज किशोर गिरी के फोन से एक ऑडियो क्लिप मिला। ऑडियो क्लिप में कानपुर रेल हादसे की साजिश की बातचीत थी। नेपाल पुलिस ने एनआईए समेत तमाम जांच एजेंसियों को ऑडियो क्लिप सौंप दिए। एनआईए ने इस मामले में तीन एफआईआर दर्ज की थी। शमशुल होदा को तीन अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था।
बालासोर में हुई रेल दुर्घटना में भी रेलवे की विभागीय जांच की तात्कालिक रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर रही है कि सिग्नल और मेन लाइन के साथ छेड़छाड़ के शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं। आगे जांच के बाद अगर पटरियां काटने या फिश प्लेट खोलकर दुर्घटना करवाए जाने की कोई साजिश मिले तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। बहरहाल इन बातों का सच जानने के लिए अभी कुछ समय और प्रतीक्षा करनी होगी जब उच्चस्तरीय जांच की रिपोर्ट सामने आयेगी।
फिर भी ऐसा हादसा परेशान करने वाला तो है ही। रेल सुरक्षा को लेकर मोदी सरकार में बहुत बुनियादी काम हुए हैं। कोच में एलएचबी तकनीक, ट्रैक मैनेजमेन्ट, सिग्नलिंग जैसे बुनियादी ढांचे में आमूलचूल बदलाव हुआ है। आये दिन होने वाली ट्रेन दुर्घटनाओं से बचने के लिए हाल ही में (2022-23 से) ट्रेनों में "कवच" नामक सुरक्षा प्रणाली लगाना शुरू किया गया है। इसके पूरी तरह लागू होने के बाद ट्रेनों के एक दूसरे से टकराने की संभावना नगण्य हो जाएगी।
लेकिन इस बीच बालासोर की भयावह ट्रेन दुर्घटना ने हर सुरक्षा उपाय पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस दुर्घटना के पीछे कोई मानवीय चूक है, तकनीकी खामी या फिर कोई साजिश, ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन इस दुर्घटना में जो असमय जिन्दगियां चली गयी हैं उस नुकसान की भरपाई कोई नहीं कर सकेगा। 2004 में श्रीलंका के ट्रेन हादसे के बाद दो दशक में यह दुनिया का दूसरा बड़ा ट्रेन हादसा है। यह भारतीय रेलवे के माथे पर ऐसा दाग है जिसे हटा पाना उसके लिए आसान नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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