Anand Mohan Release: बिहार के सुशासन में बाहुबली की रिहाई की तैयारी
जाति जनगणना के जरिए ओबीसी राजनीति साधने में जुटे नीतीश कुमार अगड़ों पर भी दांव खेल रहे हैं। यही कारण है कि जेल मैनुअल में बदलाव करके दलित अफसर की हत्या के दोषी बाहुबली आनंद मोहन को रिहा करने की पूरी तैयारी हो गयी है।

Anand Mohan Release: हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई की फाइल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास स्वीकृति की मुहर लगने के लिए पहुंच गई है। जैसे ही उनकी अनुमति मिलेगी, उसके बाद यह मामला राज्यपाल के पास जाएगा। वहां से अंतिम रूप से इसे स्वीकृति मिलने के बाद आनंद मोहन कभी भी रिहा हो सकते हैं।
वैसे अभी भी आनंद मोहन जेल में नहीं हैं। वे पेरौल पर जेल से बाहर हैं। यदि उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो जाता है तो उन्हें जेल लौटना नहीं पड़ेगा। बिहार में इस बात की खूब चर्चा है कि 24 अप्रैल को आनंद मोहन के बेटे एवं आरजेडी विधायक चेतन आनंद की सगाई है। इसके बाद 3 मई को उनकी शादी है। इस शादी में आरजेडी विधायक चेतन आनंद को हत्या के मामले में सजा काट रहे पिता की रिहाई, बिहार सरकार की तरह से मिला उपहार होगा।
जदयू विधायक चेतन आनंद की रिंग सेरेमनी पटना में और शादी समारोह देहरादून में रखा गया है। सगाई का निमंत्रण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सीएम तेजस्वी यादव समेत जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस, बीजेपी समेत अन्य पार्टियों के कई दिग्गज नेताओं को दिया गया है।
नीतीश कुमार गंभीर हैं
आनंद मोहन को जेल से बाहर लाने को लेकर नीतीश कुमार गंभीर हैं। इस बात का संकेत इसी साल जनवरी में उस वक्त मिला, जब जेडीयू ने पटना में राजपूत सम्मेलन का आयोजन किया। जातियों की गिनती की योजना बनाते हुए नीतीश कुमार इस बात को अच्छे से समझ गए हैं कि बिहार में यदि जातिगत ध्रुवीकरण हो गया तो वे सबसे कमजोर पड़ने वाले हैं। इसलिए उनकी नजर बिहार के चार फीसदी राजपूत मतदाताओं पर है।
सम्मेलन में आनंद मोहन के समर्थकों ने उनकी रिहाई के लिए नारेबाजी की तो नीतीश कुमार ने मंच से ही कह दिया, ''आप उनकी चिंता न करें। मैं भी इसी कोशिश में जुटा हुआ हूं कि वह जल्द आपके बीच आएं।'' छिटपुट बयानों को छोड़ दे तो आनंद मोहन को लेकर नीतीश कुमार की उदारता का मुखर विरोध बिहार की राजनीति में सक्रिय किसी राजनीतिक दल की तरफ से होता दिखाई नहीं दे रहा। राष्ट्रीय जनता दल इस बात का विरोध कर सकती थी लेकिन आनंद मोहन सिंह के बेटे राजद से ही विधायक हैं और पिता की रिहाई में हो रही देरी को लेकर वे अपनी नाराजगी सोशल मीडिया पर पहले ही जाहिर कर चुके हैं। अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जैसा आनंद मोहन के समर्थकों से वादा किया था, उसे पूरा करने के लिए उनका प्रयास साफ साफ दिखाई देता है।
आनंद मोहन की बेटी सुरभि आनंद की इसी साल 15 फरवरी को पटना में शादी हुई, जिसमें वे पैरोल पर बाहर आ गए थे। शादी में लगभग 10 से 15 हजार लोग शामिल हुए। वहां आशीर्वाद देने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आए। ललन सिंह, चन्द्रशेखर यादव, नंद किशोर यादव, विजय कुमार चौधरी, अशोक चौधरी समेत राजद, जदयू के सभी बड़े छोटे नेता मौजूद रहे। इसी समारोह के दौरान जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह और आनंद मोहन की एक-दूसरे को गले लगाने और लड्डू खिलाने की तस्वीर वायरल हुई थी। सुरभि की सगाई के समय नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की आनंद मोहन के साथ वाली तस्वीर मीडिया की सुर्खियां बनी थी।
जेल से बाहर लाने के लिए बदला मैनुअल
आनंद मोहन को जेल से बाहर लाने के लिए नीतीश कुमार की सरकार ने इसी 10 अप्रैल को जेल मैनुअल में बड़ा परिवर्तन कर दिया। जेल मैनुअल में बदलाव के बाद, अब किसी सरकारी अधिकारी के हत्यारे को भी उसके अच्छे व्यवहार के आधार पर जेल से छोड़ा जा सकता है। पहले ऐसा प्रावधान नहीं था। अब हत्या के मामले में जेल में बंद आंनद मोहन को इसलिए छुड़ाया जा रहा है क्योंकि बिहार सरकार में बैठे नेताओं को लगता है कि बिहार के राजपूतों के आदर्श आनंद मोहन हैं। इस बात में कितना विरोधाभास है कि एक तरफ उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिनका परिवार क्षत्रिय समाज से ही आता है, अपराधियों को प्रदेश से खत्म करने का संकल्प लेकर काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री राजपूत समाज से आने वाले एक अपराधी को सामने रखकर, बिहार के राजपूत समाज के मतों की फसल काटना चाहते हैं।
कौन हैं आनंद मोहन और उन्हें सजा क्यों मिली?
कहानी 1994 की है, जब आनंद मोहन की बिहार पीपल्स पार्टी का नेता और उस जमाने का बड़ा अपराधी छोटन शुक्ला पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे और बिहार में जंगल राज चल रहा था। अपराधियों का मनोबल बहुत बढ़ गया था। इतना अधिक कि उनके सामने पुलिस भी खुद को असहाय समझती थी। छोटन शुक्ला के शव को लेकर जब सड़क पर लोग निकले तो साथ में हजारों की संख्या में समर्थकों की भीड़ चल पड़ी।
इस भीड़ की अगुवाई उस समय आनंद मोहन कर रहे थे। आनंद मोहन ने गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैय्या को उनकी कार से बाहर खींच निकाला और भीड़ के हवाले कर दिया। आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैय्या आंध्र प्रदेश के दलित परिवार सेे आते थे। जब उनकी हत्या हुई, उस समय वे 35 वर्ष के ही थे। उन्हें सिर्फ पीटा नहीं गया, उनपर पत्थर बरसाए गए और फिर उन्हें गोली मार दी गई। लालू राज में दलित आईएएस की नृशंस हत्या हुई और आज आनंद मोहन के बेटे लालू यादव की पार्टी से विधायक भी हैं।
इसी दलित अफसर हत्याकांड में आनंद मोहन को जेल हुई लेकिन जेल में रहते हुए आनंद मोहन की 1996 में लोकसभा चुनाव में जीत हुई। फिर आया वर्ष 2007। इस साल आनंद मोहन को पटना उच्च न्यायालय से मृत्यु दंड की सजा मिली थी, जो बाद में उम्र कैद में तब्दील हुई।
बिहार में खामोशी के बीच आई उत्तर प्रदेश से आवाज
अब नीतीश कुमार ने आनंद मोहन को रिहा करने का मन बना लिया है। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि दलितों से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दों पर वीडियो बनाने वाले यू ट्यूबर्स, दलित अधिकार के नाम पर चलने वाली वेबसाइट और पत्रिकाएं, दलितों के लिए काम करने वाले एनजीओ, उनके नाम पर चल रही कथित भीम आर्मी, कई राजनीतिक दल जिन्हें दलितों का वोट चाहिए, सभी इस समय खामोश हैं।
इस मामले में एक सशक्त आवाज उत्तर प्रदेश से जरूर आई। प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बीएसपी चीफ मायावती की। उन्होंने 23 अप्रैल को ट्वीट कर लिखा कि ''बिहार की नीतीश सरकार द्वारा, आन्ध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) महबूबनगर के रहने वाले गरीब दलित समाज से आईएएस बने बेहद ईमानदार जी. कृष्णैया की निर्दयता से की गई हत्या मामले में आनंद मोहन को नियम बदल कर रिहा करने की तैयारी देश भर में दलित विरोधी निगेटिव कारणों से काफी चर्चाओं में है।''
मायावती ने आगे लिखा कि - ''आनंद मोहन बिहार में कई सरकारों की मजबूरी रहे हैं, लेकिन गोपालगंज के तत्कालीन डीएम श्री कृष्णैया की हत्या मामले को लेकर नीतीश सरकार का इस दलित विरोधी व अपराध समर्थक कार्य से देश भर के दलित समाज में काफी रोष है। चाहे कुछ मजबूरी हो किन्तु बिहार सरकार इस पर जरूर पुनर्विचार करे.''
इस संबंध में नीतीश सरकार में मंत्री अशोक चौधरी ने मायावती को जवाब देते हुए कहा है कि सिर्फ दलित पैदा होकर उनके हित में काम नहीं किए जा सकते हैं। महात्मा गांधी दलित नहीं थे लेकिन उन्होंने दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए जीवन भर संघर्ष किया। नीतीश कुमार ने 18 वर्षों में दलितों के लिए अविश्वसनीय कार्य किए हैं। ये प्रदेश का दलित वर्ग भली भांति समझता और जानता है।
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ऐसे में यहां प्रश्न यह है कि जाति की राजनीति और जाति की गिनती में सबसे अधिक रूचि दिखा रही पार्टी जब दावा करती है कि सिर्फ दलित पैदा होकर उनके हित में काम नहीं किए जा सकते हैं तो देखना चाहिए कि पार्टी अपने किस काम के आलोक में ऐसा बयान जारी कर रही है, जो उन्होंने दलितों के लिए किया है। फिलहाल बहस एक ऐसे व्यक्ति की जेल से आजादी से जुड़ा है, जिसने एक दलित आईएएस की सार्वजनिक रूप से हत्या की थी, और जिसे मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदला गया था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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