Arun Yogiraj: अपनी परंपरा में निहित ज्ञान से मिली देश में पहचान
Arun Yogiraj: कर्नाटक के अरुण योगीराज अभी मात्र 38 साल के हैं। लेकिन उनके सधे हुए हाथों से तैयार हुई मूर्तियां इतनी जीवंत होती हैं कि आज वो देश में एक प्रतिष्ठित शिल्पकार की पहचान पा चुके हैं।

अब उन्हीं के द्वारा बनाये गये रामलला अयोध्या के राम मंदिर में विराजेंगे जिनका दर्शन करने देश दुनिया से लोग अयोध्या आयेंगे।
अरुण योगीराज के जीवन की यह अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उनके शिल्प का चयन रामलला विराजमान के रूप में हुआ है। इससे पहले वो तब चर्चा में आये थे जब केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की मूर्ति का अनावरण स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने किया था। उसके बाद उन्हीं के द्वारा तैयार की गयी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा इंडिया गेट पर लगाई गयी। ये दोनों ही मूर्तियां इतनी मनमोहक हैं कि कोई देखे तो बस देखता रह जाए। लेकिन रामलला के विग्रह के चयन के लिए उन्हें सीधे नहीं चुना गया। तीन मूर्तिकारों को यह काम दिया गया जिसमें से अरुण योगीराज के शिल्प का चयन ही मुख्य विग्रह के रूप में हुआ।
ऐसे में किसी के भी मन में एक स्वाभाविक सवाल आता है कि आखिर ये अरुण योगीराज कौन हैं जिनकी कला को इतना बड़ा सम्मान मिला है? उन्होंने यह कला कहां से सीखी? उनका गुरु कौन है? तो इसका जवाब बड़ा सीधा सा है। अपने परिवार की परंपरा से। उनके पिता योगीराज ही उनके गुरु थे। उनके पिता और दादा सब अपने अपने समय में स्थापित शिल्पकार थे। दादा बसवन्ना शिल्पी का मैसूर राज्य में बड़ा नाम था। मैसूर के राजा ने उनका सम्मान किया था। ऐसे ही शिल्पी परिवार की तीसरी पीढी के अरुण योगीराज देश के प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा पा रहे हैं और देश भर में पहचान बना रहे हैं।
जैसा कि हमारे यहां एक चलन बन गया है कि हम अपनी अगली पीढी को अपने परंपरागत काम से अलग रखना चाहते हैं। कोई शिल्पी नहीं चाहता कि उसका बेटा शिल्पी बने। कोई कुम्हार नहीं चाहता कि उसका बेटा कुम्हार बने। कोई काष्ठकार नहीं चाहता कि उसका बेटा लकड़ी का काम करे। कोई पुरोहित नहीं चाहता कि उसका बेटा पुरोहित बने। यानी जिसका अपना जो जातीय और परंपरागत गुण ज्ञान है उसको कोई आगे नहीं बढाना चाहता। सब नये तरह की इंगलिश मीडियम वाली पढाई करना चाहते हैं और वह करना चाहते हैं जो उन्हें बिल्कुल नहीं आता।
अरुण के पिता योगीराज भी ऐसा ही सोचते थे इसलिए बेटे को व्यापार और मार्केटिंग सिखाने के लिए एमबीए करवा दिया। अरुण योगीराज अब कहते हैं कि उन्होंने पढाई तो कर ली लेकिन उनका मन रमता था मूर्तियां गढने में। इसलिए 2008 से ही अपने पिता के साथ वो शिल्प गढने के काम में लग गये। उनका अपना पैतृक और परंपरागत ज्ञान और पिता के संरक्षण में उन्होंने मूर्तिकला की बारीकियां सीखीं और आज उनके द्वारा ऐसी जीवंत मूर्तियां गढी जाती हैं जो आकार में संपूर्ण नहीं होती बल्कि चेहरे का हाव भाव भी एकदम प्रकट होता है। मानों, मूर्तियां अभी बोल पड़ेगी।
भारत में शिल्पशास्त्र और मूर्तिकला का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी हमारी सभ्यता। भारत के शिल्पकारों ने पत्थरों पर संगीत रचा है। यहां भगवान पत्थर के बनाये गये तो उसके पीछे का अपना वृहद दर्शन था। मंदिर से लेकर उसमें स्थापित होनेवाले देवता का अपना पूरा शिल्पशास्त्र है। मसलन, जिस पत्थर से मूर्ति बनायी जाती है वह किस प्रकार का होना चाहिए। पत्थर के लिंग, अवस्था, गुण की पहचान की जाती है। भारत के शिल्पशास्त्री जानते हैं कि पत्थर भी स्त्रीलिंग, पुलिंग और नपुसंकलिंगी होते हैं। फिर पत्थरों की आयु के अनुसार उनकी अवस्था का निर्धारण होता है। बहुत कम आयु और बहुत अधिक आयु के पत्थरों से देवताओं की मूर्ति नहीं बनती।
इसके बाद भी मुर्तिकला के लिए प्रयुक्त होनेवाले पत्थरों का गुण धर्म पहचाना जाता है। यानी पत्थर सात्विक है, राजसिक है या तामसिक है। सात्विक पत्थर से कौन सी मूर्ति बनेगी और राजसिक तथा तामसिक पत्थरों से कौन सी मूर्ति बनेगी ये भारत के शिल्प परंपरा में पले बढे शिल्पशास्त्री ही समझते हैं। इतने के बावजूद मूर्तियों को बनाने के लिए ऋतु और काल का ध्यान दिया जाता है। मूर्ति की भाव भंगिमा को यथावत प्राप्त करने के लिए सम, त्रिभुज और गोल भंगिमा का ध्यान रखा जाता है। जैसे विष्णु या विष्णु के दशाअवतार में किसी की भी मूर्ति बनानी हो तो सम भंगिमा को सर्वोपरि रखा जाता है। शिव या शिव के अवतारों को प्रदर्शित करने के लिए त्रिभुज तथा ब्रह्म की मूर्ति बनाने के लिए गोल या वर्तुल भंगिमा को ध्यान में रखा जाता है। देवताओं की प्रतिमा त्रिगुणातीत पत्थर से ही बनायी जाती है।
यानी भारत में मुर्तियों का शिल्पशास्त्र इतना गहरा और शोधपूर्ण है कि उसे परंपरा में रहकर ही समझा और सीखा जा सकता है। अरुण योगिराज के लिए यह उनका सौभाग्य था कि उनके परिवार की शिल्प परंपरा में उन्हें बचपन से यह सब सीखने और देखने का अवसर मिला। इसके अलावा वंशानुगत गुण तो होते ही हैं जो पीढी दर पीढी आनेवाली संतानों में प्रकट होते रहते हैं। कोई अपने परिवार, परंपरा और जाति समाज में रहकर जो शिक्षा और गुण प्राप्त करता है तो उसका विकल्प कभी भी वैकल्पिक और स्कूली शिक्षा नहीं हो सकती। स्कूली और विश्वविद्यालय की शिक्षा का अपना बाजार है लेकिन उसमें वह सुख, संतोष और पहचान प्राप्त नहीं होती जो परंपरा की शिक्षा में मिलती है।
अरुण योगिराज को आज वही पहचान प्राप्त हो रही है और उन्हें अपने काम से जो कुछ प्राप्त हो रहा है वह शायद एमबीए की पढाई से प्राप्त नहीं होता। भारत के लोगों को इस अद्भुद शिल्पशात्री के कार्य से परिचित होने का अवसर भी नहीं मिलता। कुछ सालों बाद राम मंदिर के गर्भगृह में विराजमान 5 साल के रामलला के दर्शन करके जब लोग दैवीय अनुभूति प्राप्त करेंगे तब उनके मन में शायद ही कभी ये आये कि इसे किस शिल्पी ने गढा है।
एक शिल्पशास्त्री के लिए यही सबसे बड़ा सुख होता है कि लोग उसकी कला में वह दैवीय अनुभूति प्राप्त कर लें कि इस कला के कलाकार तक का ध्यान न आये। राममंदिर के गर्भगृह में विराजमान रामलला के दर्शन के बाद यही अनुभूति लोगों को हुई तो अरुण योगीराज की कला और जीवन दोनों सफल हो जाएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि यही कला और परंपरा का यही ज्ञान वो अपनी आनेवाली पीढी को भी प्रदान करेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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