Atique Ahmed Murder: अतीक की हत्या से पैदा हुए सैकड़ों सवाल
माफिया सरगना अतीक अब अतीत हो गया है। 15 अप्रैल की रात उसकी और उसके भाई अशरफ की पुलिस अभिरक्षा में हत्या ने सैकड़ों सवालों को जन्म दे दिया है।

Atique Ahmed Murder: गली मोहल्ले की गुंडई से आगे बढ़कर जब अतीक अहमद को बड़ा डॉन बनने का शौक चढ़ा तो उसने इलाहाबाद में खुल्दाबाद के छंटे हुए बदमाश चांद बाबा की हत्या कर दी थी। कुछ उसी तर्ज पर तीन लहकट टाइप बदमाशों ने बड़ा माफिया बनने की ललक में (जैसा कि हमलावरों ने पुलिस को बयान दिया है) अतीक और उसके भाई अशरफ को मौत के घाट उतार दिया।
प्रयागराज में चकिया के चौधरी रहे दोनों भाइयों की पुलिस हिरासत में हुई हत्या को लेकर अब राजनीति भी शुरू हो गई है। अपने अपने हिसाब से नेताओं के बयान आने लगे हैं। विपक्ष प्रदेश में कानून व्यवस्था की बात को आगे कर उत्तर प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है तो भारतीय जनता पार्टी के नेता 'जैसी करनी वैसी भरनी', 'कर्मफल यही मिलता है', 'पाप पुण्य का हिसाब किताब' से लेकर इस वारदात को 'आसमानी फैसला' तक करार दे रहे हैं।
हालांकि सरकार ने मामले में सक्रियता दिखाते हुए मामले की न्यायिक जांच कराए जाने का आदेश दिया है, लेकिन पुलिस की मौजूदगी में 30 सेकंड में ताबड़तोड़ 18 राउंड फायरिंग के बाद हमलावरों के आत्मसमर्पण की कहानी पेच दर पेच उलझी हुई है। जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं।
पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश देश का अव्वल राज्य है। हाल ही में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में डाटा पेश करते हुए बताया कि वर्ष 2020-21में उत्तर प्रदेश में हिरासत में 451 मौतें दर्ज की गई जबकि वर्ष 2021-22 में यह संख्या बढ़कर 501 हो गई। पुलिस हिरासत में हुई मौतों की शिकायत की जांच के लिए तंत्र स्थापित करने की बात पर केंद्र सरकार हमेशा दो टूक जवाब देती रही है कि पुलिस और और कानून व्यवस्था ऐसे विषय हैं जो संविधान में राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं।
हालांकि हत्या के आरोपी अतीक और अशरफ को मौत के घाट उतारे जाने के बाद देश की जनता जय जयकार कर रही है। टीवी चैनलों पर इसे लाइव दिखाया गया। अतीक और अशरफ की हत्या के आखिरी 5 मिनट की कहानी हर जगह उपलब्ध है। रात 10:25 पर अतीक और अशरफ को लेकर मेडिकल जांच के लिए पुलिस टीम कॉल्विन अस्पताल में एंट्री करती है। मीडिया कर्मी पीछे पीछे दौड़ पड़ते हैं। करीब 10:30 पर दोनों भाई ठिठकते हैं। अतीक से सवाल पूछा गया कि बेटे असद के अंतिम संस्कार में आपको नहीं ले जाया गया, आपका क्या कहना है? इस पर अतीक ने कहा, 'नहीं ले गए तो नहीं गए'। तभी भाई अशरफ बोल पड़ता है, कहता है कि मेन बात यह है कि गुड्डू मुस्लिम......।
इसी बीच वहां मौजूद तीनों हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। 15 से 20 सेकंड के अंदर दोनों गिर पड़ते हैं। एक खूंखार अपराधी के खात्मे का यह पूरा वाकया वीडियो में रिकॉर्ड हो जाता है।
लेकिन जितने मुंह उतनी बातें की तरह जितने मुंह उतने सवाल भी हैं। जैसे, दोनों के साथ इतने कम पुलिसकर्मी क्यों थे? दोनों भाइयों को एक ही हथकड़ी क्यों पहनाई गई थी? न्यायिक रिमांड वाले अपराधियों को मीडिया से बात करने की इजाजत क्यों दी गई? रिमांड के दौरान पब्लिक एंट्री और रास्ते भर खुली परेड क्यों हो रही थी? जब दोनों अपराधियों का स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो पूछताछ क्यों की जा रही थी? हमलावरों पर पुलिस ने एक भी जवाबी फायरिंग क्यों नहीं की? अगर उनको जांच के लिए लाना था तो मात्र दस मिनट पहले अस्पताल को क्यों सूचित किया गया जबकि पुलिस के मुताबिक शाम से ही वो अपनी तबियत खराब होने की बात कर रहे थे? पुलिस को क्या अतीक ने बताया था कि उसने कसारी मसारी में पिस्तौल छुपा रखी है, अगर 'हां' तो ठीक, 'नहीं' तो इतनी रात को पुलिस उसे लेकर क्यों गई?
मालूम हो कि अतीक और अशरफ को यूपी एटीएस और प्रयागराज पुलिस ने 4 दिन के रिमांड पर लिया था। दोनों भाइयों से 23 घंटे पूछताछ की जा चुकी थी। दोनों से करीब 200 सवाल पूछे गए थे। अब सवाल यह है कि इन सवालों में सही क्या है और गलत क्या है?
इसका जवाब तलाशने के लिए थोड़ा पीछे चलना चाहिए। 70 से लेकर 80 के दशक तक इलाहाबाद में दो राजनीतिक परिवारों का बोलबाला था। एक खेमा हेमवती नंदन बहुगुणा का था तो दूसरा खेमा राजेंद्री कुमारी वाजपेई का। दोनों जगह दरबार लगता था। आम शहरी अपनी फरियाद लेकर जाता था और उसे यथासंभव मदद भी मिलती थी। समय का पहिया घूमा। सन 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन के हाथों हुई हार का सदमा बर्दाश्त न कर पाने के कारण बहुगुणा जी का इंतकाल हो गया। कुछ समय बाद राजेंद्री जी भी नहीं रही। परिवार की कमान अगली पीढ़ी के हाथ में आ गई।
दोनों परिवारों के शहजादे (शेखर बहुगुणा और अशोक बाजपेई) लहकटों की सोहबत में पुरशकुन महसूस करते थे। गली मोहल्लों के रंगबाज सुविधा के मुताबिक सलामी बजाने लगे। बताते हैं कि कभी विद्यार्थी परिषद की राजनीति करने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र नेता जो कि अध्यक्ष बनने की ललक में बहुगुणा खेमे में शामिल हो चुके थे, ने खुल्दाबाद क्षेत्र के लफंगे चांद बाबा, छम्मन मियां को भी दरबार का रास्ता दिखा दिया। राजनीतिक वरदहस्त मिलते ही चांद बाबा की चांदमारी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। चांद बाबा की कारगुजारी पुलिस पर भी भारी पड़ने लगी। विरोधी खेमे का कारोबारी हित भी प्रभावित होने लगा। ऐसे में चांद बाबा से निपटने के लिए खाकी और खादी के गठजोड़ ने अतीक मियां को खोज निकाला।
पुलिस की निगहबानी में कोतवाली के ठीक सामने मुठभेड़ प्रायोजित की गई और चांद बाबा मारा गया। कुछ दिनों के बाद अतीक ने चांद बाबा के दाहिने हाथ छम्मन की मुंबई में हत्या करा दी तथा दहशत फैलाने के लिए लाश को इलाहाबाद मंगवा कर सरेआम टांग दिया था। अतीक के अपराध का सिक्का चल निकला। बढ़ते दबदबे के साथ हर अपराधी की तरह अतीक ने भी राजनीति का चोला धारण करने का मन बनाया। यह वही दौर था जब राजनीतिक दलों के दरवाजे अपराधियों के लिए पूरी तरह से खुले हुए थे। अपराधियों ने नेताओं की मदद करने के बजाय खुद को माननीय बनाने का बीड़ा उठा लिया। उसे कामयाबी भी मिली। एक हिस्ट्रीशीटर अपराधी को राजनीतिक रूप से इतना ताकतवर बना दिया गया कि प्रयागराज के आसपास उसकी समानांतर सत्ता चलने लगी। ब्यूरोक्रेसी, पुलिस, नेता और अदालत सबका साथ मिल रहा था। आम लोगों का यह भरोसा ही टूटने लगा कि इतने ताकतवर माफिया से कोई लड़ भी सकता है।
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हम कह सकते हैं कि आज जो जनमानस ऐसे एनकाउंटरों और हत्याओं के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है तो उसके पीछे कहीं न कहीं वर्षों की घुटन और बेबसी है। पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या आज जो कुछ हो रहा है, निष्पक्ष हो रहा है? बकौल महात्मा गांधी आंख के बदले आंख का चलन बढ़ेगा तो पूरी दुनिया एक दिन अंधी हो जाएगी। अतीक के मामले में भी सारे सबूत उसके खिलाफ थे। उसके लिए किसी भी किस्म की सहानुभूति शायद ही किसी में होती। अगर फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए कड़ी सजा होती तो उसका संदेश ज्यादा बड़ा होता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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