BJP Victory: भाजपा की जीत राज्यों में मोदीवाद का विस्तार है
मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बन रही है, यह अप्रत्याशित है। लेकिन यह पूर्ण रूप से मोदीवाद का विस्तार है। लोकसभा चुनाव में मोदी का फिलहाल विकल्प नहीं है, यह तो सभी मानते हैं लेकिन विधानसभा चुनावों में भी यदि मोदी ही मुख और मुखौटा बने हुए हैं तो फिर मान लीजिए की मोदी कल्ट बन चुके हैं। अब वह भारत में गांधी और नेहरू की तरह राजनीति की धुरी बन चुके हैं।
जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें से किसी राज्य में भी भाजपा ने किसी और नेता का चेहरा मुख्यमंत्री के लिए पेश ही नहीं किया। पहली बार ऐसा हुआ है कि मुख्यमंत्री की अभिलाषा या दावा रखने वाले नेताओं को पहले ही हाशिए पर डाल दिया गया। राजस्थान में वसुंधरा के एकाधिकार को मोदी ने किनारे लगाकर खुद प्रचार का नेतृत्व किया। ऐसा लग रहा था कि वसुंधरा की उपेक्षा बीजेपी को महंगी पड़ेगी फिर भी मोदी यह कहते नजर आए कि 3 दिसंबर कांग्रेस छू मंतर।

इसी तरह 19 साल हो गए शिवराज सिंह को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में काम करते हुए। उनका जनता से सीधा जुड़ाव और धरातल पर उनकी अपनी पकड़ के बावजूद भाजपा ने ना टिकट वितरण उनके हाथ में रखा, ना उनका चेहरा आगे करके वोट ही मांगा। मध्य प्रदेश के तमाम बड़े बीजेपी नेता चुनाव में वैसे ही काम करते नजर आए जैसे बचपन में कोई बच्चा ना चाहते हुए भी कंधे पर बैग टांगकर स्कूल जाता है। छत्तीसगढ़ में भी कम से कम राज्य के भाजपा के नेताओं को पता नहीं था कि केंद्रीय नेतृत्व किस फार्मूले पर चुनाव लड़ रहा है। स्थानीय भाजपा नेता अंदर से तो उत्साहित भी नहीं थे।
अब चुनाव परिणाम जो आया तो सब हतप्रभ हैं। यह चमत्कार कैसे हुआ? मीडिया की खुराक के लिए हर तरह के कारण गिनाये जा रहे हैं पर सबके होठों पर अंतिम नाम प्रधानमंत्री मोदी का ही है। केवल मोदी ही थे, जिनके पास कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति की काट थी और चुनाव वाले राज्यों में उनके चुनावी सवालों का जवाब भी। राहुल गांधी ने बिहार की तर्ज पर जातिगत जनगणना के नाम पर समां बांधने की कोशिश की, तो मोदी ने सभी गरीबों की एक जाति बना दी और यह ऐलान कर दिया कि वह सबका उत्थान करने जा रहे है।
राजस्थान में अशोक गहलोत ने जनकल्याण की योजनाओं के बलबूते चुनाव जीतने की सोची तो मोदी ने पहले गैस सिलेंडर के दाम में चार सौ की कटौती और गरीबों को अगले पांच साल मुफ्त अनाज की घोषणा कर दी। अशोक गहलोत को भले ही कन्हैयालाल का गला काटने की घटना छोटी लग रही थी, मोदी को मालूम था कि उस घटना ने देश भर के लोगों में मन में गुस्सा भर दिया था। फिर राजस्थान के लोग चुनाव में कैसे भूल जाते? मोदी ने केवल जनता के मानस को झकझोरा, बाकी जनता ने खुद तय किया।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पूरी तरह आश्वस्त थी। भूपेश बघेल को जरा भी आशंका नहीं थी कि उनके पैरों तले से धरती खिसक जाएगी और ना ही राज्य के भाजपा नेताओं को ही यकीन था कि वह लड़ाई जीत भी सकते हैं। यह विशुद्ध रूप से मोदी का करिश्मा था कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस चारों खाने चित हो गयी। मोदी ने बस लोगों को यह समझाया कि कैसे राज्य की सरकार कांग्रेस के एटीएम की तरह काम कर रही है। फिर भ्रष्टाचार के आरोप में लगातार लोगों का पकड़ा जाना और महादेव ऐप के जरिए मुख्यमंत्री तक पैसे पहुंचना यह सब जनता के सामने प्रत्यक्ष रूप से सामने आ गया।
मोदीवाद का असर यदि राज्यों के चुनावों में भी दिख रहा है तो इसका यह मतलब नहीं है कि प्रधानमंत्री भाजपा संगठन में मनमानी कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं को जानबूझ कर किनारे लगा रहे हैं, बल्कि मोदी प्रत्यास्थापन की नीति पर काम कर रहे हैं। वे जनता और भाजपा नेतृत्व के बीच प्रदर्शन और विश्वास की गारंटी के रूप में खुद को प्रस्तुत कर रहे हैं।
व्यावहारिक रूप से देखें तो मोदीवाद नेहरूवाद से ज्यादा प्रभावी है। नेहरू एक नायक के रूप में भारतीय राजनीति में आये थे। लेकिन आजादी के बाद उनका स्वरुप अधिनायकवादी के रूप में सामने आया। मोदीवाद समाज के निचले तबके के उत्थान और सेवा भाव के रूप में उभरा है। वह जनता की आंखों से देखने का विश्वास जगाते हैं। वह विदेश में भी उसी तबके की आवाज बन कर खड़े होते हैं, जिस तबके की बात वह देश में करते हैं। लोकसभा के पिछले दो चुनावों में मोदीवाद ने जमकर काम किया, अब पहली बार उसका विस्तार विधानसभा चुनावों में सामने आया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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