क्या सीताराम केसरी होने के हश्र से घबरा गये अशोक गहलोत?
1996 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव निशक्त किए जा रहे थे। सोनिया गांधी पर्दा हटाकर सक्रिय राजनीति में लौट रही थीं। उनको केंद्र में रखकर विपक्षी नेताओं की गोलबंदी शुरु हुई।

नतीजा रहा कि 1996 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा के प्रधानमंत्री वाजपेयी को महज तेरह दिनों में इस्तीफा देकर सत्ता से पिंड छुड़ाना पड़ा।
राव के स्थान पर सीताराम केसरी
कांग्रेस अध्यक्ष पद से नरसिंह राव को हटाकर सोनिया गांधी के कहने पर सितंबर 1996 में बुजुर्ग सीताराम केसरी को अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। केसरी के बारे में कांग्रेस के भीतर कहा जाता था, "खाता न बही, केसरी जो कहें वही सही।" वो पार्टी के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे थे और कांग्रेस पार्टी को अपना परिवार मानते थे।
अध्यक्ष के तौर पर केसरी की यह उपलब्धि रही कि नरसिंह राव के सताने से अलग हुए कांग्रेस के छोटे बड़े दल इकट्टा होने लगे। केसरी के कार्यकाल में ही माधव राव सिंधिया की मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस और नारायण दत्त तिवारी की तिवारी कांग्रेस का विलय मूल कांग्रेस पार्टी में कर लिया गया।
केंद्र में संयुक्त मोर्चा की एच डी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकार को पीछे से चलाने के क्रम में कांग्रेस पार्टी का कुनबा बड़ा होने लगा। तमिलनाडु के वरिष्ठ कांग्रेस नेता जी के मूपनार को भी केसरी के दौर में ही तमिल मनीला कांग्रेस का मूल कांग्रेस में विलय करने के लिए राजी कर लिया गया था।
कांग्रेस ने मिटा दिया केसरी का नामो निशान
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद कांग्रेस पार्टी की कमान बदलने के लिए घाघ नेताओं ने खेल कर दिया। सीताराम केसरी विचलित हो उठे। जोश में उन्होंने सवाल किया कि उनके रहते जब दस जनपथ की सारी बातें मानी जा रही हैं, तो फिर उनसे कांग्रेस अध्यक्ष पद छीनने की बात क्यों हो रही है? उनके इस सवाल के जुर्म में उनसे जबरन कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा ले लिया गया।
14 मार्च 1998 को 24 अकबर रोड पर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक बुलाई गई। बैठक में केसरी से इस्तीफा देने को कहा गया, तो वह रोते हुए भागे और खुद को बाथरुम में बंद कर लिया। जोर जबरदस्ती के लिए युवक कांग्रेस के दबंग बुलाए गए। जैसे तैसे केसरी से इस्तीफा ले लिया गया। बेआबरु होकर जब वह दफ्तर छोड़कर जाने लगे, तो उनकी धोती तक खींची गई। ऐसा उन्होंने खुद मीडिया इंटरव्यू में बताया था। मरणोपरांत चाचा केसरी 2019 में फिर चर्चा में आए। तब उनका नाम अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के दफ्तर 24, अकबर रोड, नई दिल्ली के शिलापट्ट से बतौर कांग्रेस अध्यक्ष मिटा दिया गया।
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होशियार हैं अशोक गहलोत
लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 2019 में इस्तीफा दिया। उसके बाद से ही कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष विहीन है। कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहती थीं, इसके लिए निरंतर रास्ते तैयार किए जा रहे थे लेकिन गहलोत के राजस्थान मोह ने सब उलट पलट कर दिया।
कांग्रेस अध्यक्ष बनकर भी गहलोत यह भी नहीं चाहते कि उनकी मुख्यमंत्री वाली कुर्सी राहुल व प्रियंका गांधी के प्रिय रहे सचिन पायलट को मिल जाए। इसके लिए वह भावी कांग्रेस अध्यक्ष के ऑफर को लगातार ठुकराते रहे हैं। इसके पीछे सीताराम केसरी के साथ हुआ हादसा भय की एक वजह हो सकती है। चाचा केसरी औऱ पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के साथ हुआ हश्र उन तमाम खुर्राट कांग्रेस नेताओं के लिए सबक है, जो पार्टी पर सोनिया गांधी परिवार के आधिपत्य के खत्म होने की सोचते भी हैं।
अशोक गहलोत होशियार हैं। उनको पता है कि कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी कांटों से भरी है। आगे गांधी परिवार की किसी प्रबल इच्छा के पालन करने में विफल रहने पर दरबारी दिग्गज उनको भी केसरी की तरह ही ठिकाने लगाने में तनिक देर नहीं करेंगे। गहलोत के अलावा दस जनपथ की पसंद महाराष्ट्र के सुशील कुमार शिंदे रहे हैं। लेकिन स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों वह सक्रिय राजनीति से अलग हैं। अब जब गहलोत ने रंग दिखा ही दिया है, तो राज्यसभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष की रेस में आलाकमान की पसंद हो सकते हैं।
कांग्रेस में नये अध्यक्ष की कवायद
मुख्यमंत्री गहलोत के संकेतों पर जयपुर में कांग्रेस विधायकों के बगावत से पहले तक शीर्ष नेतृत्व की इच्छा थी कि उनके विश्वसनीय अशोक गहलोत ही नए कांग्रेस अध्यक्ष बने। इसके लिए कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया जारी है। चुनाव के लिए घोषित कार्यक्रम के अनुसार 24 से 30 सितंबर तक अध्यक्ष नामांकन होना है। नामांकन वापसी की आखिरी तारीख आठ अक्टूबर है। एक से अधिक उम्मीदवार होने की स्थिति में 17 अक्टूबर को मतदान होगा। उसमें कांग्रेस पार्टी के डेलीगेट्स वोटर होंगे। नौ हजार डेलीगेट्स का नाम सार्वजनिक किया जा चुका है। चुनाव पर्यंत 19 अक्टूबर को नए अध्यक्ष का एलान होगा। अब तक शशि थरुर ने नामांकन दाखिल किया है। आगे कुछ और नाम सामने आ सकते हैं। मसलन दिग्विजय सिंह और मनीष तिवारी ने इस बाबत संकेत दे रखा है।
दरअसल सोनिया गांधी परिवार की इच्छा है कि 2024 में कांग्रेस को सरकार बनाने की स्थिति में लाया जाए। राहुल गांधी की पदयात्रा उस दिशा में उठाया गया पहला प्रभावी कदम है। यह सब इसलिए कि आगे मौका मिले तो आसानी से प्रधानमंत्री के लिए राहुल गांधी के नाम को आगे किया जा सके। इस काम में गहलोत जैसे बड़े उम्र के अन्य नेता कारगर हो सकते थे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बनने या कहें चुनाव के लिए नामांकन भरने से पहले ही राजस्थान के मुख्यमंत्री ने बगावत कर दिया। गहलोत के बारे में मशहूर है कि नरसिंह राव के मंत्रिमंडल से उन्होंने सिर्फ तांत्रिक चंद्रास्वामी का वंदन नहीं करने की शिकायत पर इस्तीफा देना कबूल कर लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के चंद्रास्वामी से करीबी को लेकर सोनिया गांधी की अपनी शिकायत थी।
हाईकमान द्वारा गहलोत को सिर्फ इसलिए नाराज किया गया है कि उनके विरोधी सचिन पायलट ने 'दोस्त' राहुल गांधी से कहा कि यह उनको मुख्यमंत्री बना देने का सही समय है। इस पर अमल शुरु हुआ। गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष का नामांकन भरने से पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए राजी किया गया। फिर दिल्ली से दो पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन राजस्थान सीएलपी यानी कांग्रेस विधायक दल की बैठक के लिए जयपुर भेजे गए।
बैठक में मुख्यमंत्री के दायित्व से अशोक गहलोत को मुक्त करना था। मुक्ति के लिए गहलोत ने शर्त रख दी कि उनकी जगह पायलट के बजाय उनकी ही पसंद के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया जाए, ताकि अगले साल होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव में उनकी चले। लेकिन भावी कांग्रेस अध्यक्ष की ऐसी कोई शर्त नहीं मानी जाए तो संकेतों में बखूबी समझा जा सकता है कि अध्यक्ष बनकर भी उनकी हैसियत सीताराम केसरी से ज्यादा नहीं रहने वाली थी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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