Kejriwal Arrest: 'आप' हुए अंदर, अब बाहर क्या होगा?
पहले सत्येन्द्र जैन, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अब खुद अरविन्द केजरीवाल। आम आदमी पार्टी की पूरी 'ए' टीम एक ही घोटाले में जेल पहुंच गयी है जिसे शराब घोटाला कहा जा रहा है। इन सभी पर दिल्ली की आबकारी नीति में बदलाव करके राजकोष को 2873 करोड़ का नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
ईडी का कहना है कि दिल्ली की सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने यह सब इसलिए किया क्योंकि शराब माफियाओं द्वारा कथित तौर पर उन्हें 100 करोड़ रूपये की घूस दी गयी थी। बदले में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के गर्भ से पैदा हुई पार्टी ने 2021-22 में दिल्ली में वैसी ही शराब नीति बना दी जैसी शराब माफिया चाहते थे।

मसलन, दिल्ली में शराब सरकारी दुकानों से बिकने के बजाय निजी दुकानों से बिके। शराब कंपनियों को मनमानी शराब की दुकानें खोलने दिया जाए। रात 12 की बजाय भोर में 3 बजे तक शराब की दुकानें खुलें। पीने की न्यूनतम उम्र 25 साल से घटाकर 21 साल कर दी गयी। अभी तक रिहाइशी इलाकों में शराब की दुकाने नहीं खुल सकती थीं लेकिन नयी नीति आ जाने के बाद निजी कंपनियां गली मोहल्लों में भी शराब की दुकान खोल सकती थीं।
स्वाभाविक है ऐसा हो जाने पर दिल्ली में शराब की बिक्री में रिकार्डतोड़ वृद्धि होती। सालाना 7 हजार करोड़ की शराब पीनेवाले दिल्लीवासी संभव है इससे खुश ही होते लेकिन समस्या यह हुई कि ऐसा करते हुए सरकारी राजस्व से समझौता किया गया। नीति ऐसी बनायी गयी कि शराब की बिक्री बढ़ने से शराब माफिया तो फायदे में रहते लेकिन सरकारी राजस्व आधे से भी कम हो जाता। यही वह तकनीकी पक्ष था जहां से केजरीवाल सरकार की नीति आशंकाओं के घेरे में घिरी और लगभग पूरी सरकार ही शराब घोटाले में जेल के अंदर चली गयी।
तकनीकी और कानूनी पक्ष अपनी जगह लेकिन केजरीवाल की शराब नीति ने उस पार्टी के सामने बहुत बड़ा नैतिक प्रश्न भी खड़ा किया था जो अन्ना हजारे के आंदोलन से पैदा हुई थी। महाराष्ट्र के अन्ना हजारे पहली बार चर्चा में आये ही इसलिए थे क्योंकि उन्होंने अपने गांव रालेगढ सिद्धी में संपूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी। अन्ना हजारे ने उसी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मंच से यह बात दोहराई भी थी कि उनके गांव में हर कोई शराब पीता था। जब वो गांव लौटे तो उन्हें लगा कि बिना शराबबंदी के इस गांव का उद्धार नहीं हो सकता क्योंकि हर नौजवान तो शराब पीने में मस्त है। इसलिए उन्होंने गांव में सबसे पहले सफलतापूर्वक शराबबंदी की, उसके बाद गांव में समाज सुधार का काम किया।
स्वंय अरविन्द केजरीवाल भी शराब और नशाखोरी के खिलाफ ही बोलते रहे हैं। जिन दिनों वो परिवर्तन एनजीओ के जरिए झुग्गी बस्तियों में काम करते थे, वो शराब और नशाखोरी के खिलाफ भी आवाज उठाते थे। इसके बावजूद उनकी सरकार में शराब की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए काम किया गया और उसके एवज में तथाकथित डील की गई, यह जितना बड़ा कानूनी प्रश्न है उससे बड़ा नैतिक और राजनैतिक प्रश्न है कि आखिर उन्होंने ऐसा किया तो क्यों किया?
सत्ता में आने के बाद गांधी की समाधि राजघाट का रास्ता भूल चुके अरविन्द केजरीवाल इस सवाल का जवाब तो शायद तब देंगे जब उन्हें फिर कभी गांधी की नैतिकता याद आयेगी। लेकिन बीते एक दशक के उनके आंदोलन और राजनीतिक सफर में यमुना में इतना पानी सड़ चुका है कि उस केजरीवाल को पहचान पाना ही मुश्किल है जो जन आंदोलन के ज्वार पर चढ़कर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचा था।
इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक सफलता में अरविन्द केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बड़ी भूमिका निभाई। अन्ना आंदोलन ने कांग्रेस के खिलाफ जो माहौल बनाया था उसको दिल्ली तक सिमटे केजरीवाल भुना नहीं सकते थे, क्योंकि उनके पास कोई सांगठनिक ढांचा ही नहीं था। यह काम किया नरेन्द्र मोदी ने और 2013 में देशभर में रैलियां करके अपने आपको विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर दिया। लेकिन राजनीति की नियति ही कहा जाएगा कि आज वही नरेन्द्र मोदी सरकार अरविन्द केजरीवाल के भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई करके उनके अस्तित्व के लिए ही राजनीतिक संकट पैदा कर रही है।
अरविन्द केजरीवाल की राजनीति की खेती अभी कच्ची है। भले ही उनकी पार्टी को चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दे दिया गया है लेकिन आम आदमी पार्टी अरविन्द केजरीवाल से शुरु होकर अरविन्द केजरीवाल पर ही खत्म हो जाती है। जो भविष्य के नेता हो सकते थे, उनसे या तो अरविन्द केजरीवाल ने पीछा छुड़ा लिया या फिर वो खुद अरविन्द केजरीवाल को छोड़कर चले गये। जो बचे रह गये उनमें से अधिकांश जेल पहुंच गये हैं।
इसलिए इस समय ईडी द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी के साथ ही आम आदमी पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। कई सवाल पैदा हो गये हैं जिनका जवाब पार्टी को तत्काल खोजना होगा। केजरीवाल खेमे से यह जरूर कहा जा रहा है कि वो जेल से ही सरकार चलायेंगे लेकिन यह संभव नहीं होगा। जब लालू यादव जैसे घाघ नेता को भी चारा घोटाले में फंसने के बाद पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ गया था तब अरविन्द केजरीवाल अगर जेल से सरकार चलाते भी हैं तो यह भी एक नया रिकार्ड बनाने जैसा होगा।
इस बीच संभावना इस बात की भी पैदा हो सकती है कि जो जेल नहीं गये वो नेतृत्व लेने का प्रयास करें। आम आदमी पार्टी किसी लंबे संघर्ष से निकली जमी जमाई पार्टी नहीं है। इसलिए उसमें टूट की संभावना पैदा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह भी हो सकता है कि पत्नी सुनीता के मना करने के बाद वो किसी विश्वासपात्र को कुर्सी सौंप दें। हालांकि जैसा अब तक केजरीवाल की कार्यशैली रही है उसे देखकर लगता नहीं कि वो ऐसा करने में बहुत उत्सुक होंगे। कानूनन अगर वो जेल में रहकर दिल्ली सरकार चला सकते हैं तो वही करेंगे।
लेकिन गिरफ्तारी के दौरान सिर्फ दिल्ली सरकार चला लेना ही एकमात्र उपलब्धि नहीं होगी। ईडी की गिरफ्त में अगर वो लंबे समय रहते हैं तो दिल्ली विधानसभा में संकट पैदा होगा। मुख्यमंत्री विधानसभा का लीडर होता है। अगर विधानसभा का लीडर ही जेल में बैठा रहे तो विधायी कार्य भला कैसे संपन्न होंगे?
केजरीवाल की गिरफ्तारी से संकट सिर्फ दिल्ली सरकार पर ही नहीं बल्कि समूची आम आदमी पार्टी पर आ गया है। लोकसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है और अरविन्द केजरीवाल इंडिया एलायंस का हिस्सा बन चुके थे। दिल्ली में उन्होंने उसी कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल भी कर लिया था जिसके खिलाफ आंदोलन से उनकी पार्टी का जन्म हुआ था। आज भले ही कांग्रेसी नेता केजरीवाल के समर्थन में बयान दे रहे हैं लेकिन इस गिरफ्तारी का सबसे अधिक लाभ कांग्रेस ही उठाने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस के लिए दिल्ली में केजरीवाल वो बाधा थे जिसके दूर हो जाने पर उनके लिए मैदान साफ हो जाता है। अरविन्द केजरीवाल विहीन आम आदमी पार्टी का आम चुनाव में कुछ खास हासिल करना मुश्किल ही है। अब अगर आम आदमी पार्टी आम चुनाव से दूर होती है तो बहुत संभावना है कि दिल्ली की सभी सातों सीटों पर कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारकर अपनी खोई जमीन वापस पाने का प्रयास करे। कांग्रेस का यही प्रयास पंजाब में भी होगा।
जो आम आदमी पार्टी के नेता या कार्यकर्ता हैं उनका वैसा मजबूत सांगठनिक ढांचा नहीं है कि नेता के कुछ महीने दूर होने पर भी वो पार्टी को चला लें। मनीष सिसोदिया अगर बाहर होते तो शायद एक संभावना बचती लेकिन वो पहले से ही अंदर हैं। ऐसे में 'आप' के 'आम आदमी' अगर कहीं और ठौर तलाशने निकल जाएं तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। याद रखिए जनता दल बिखरा था तो उसमें से छोटे छोटे दल निकले थे। आम आदमी पार्टी बिखरी तो उसमें सिर्फ आदमी निकलेंगे जो अपनी सुविधानुसार कहीं और अपना ठिकाना तलाश लेंगे।
फिलहाल जिस तरह से पहले हाईकोर्ट ने ईडी की जांच पर रोक लगाने से इंकार किया और अब खुद केजरीवाल के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले लिया है, उससे इतना तो तय है कि यह गिरफ्तारी प्रकरण लंबा खिंचेगा। इसलिए अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी का देश समाज पर कोई असर हो न हो, आम आदमी पार्टी के अस्तित्व पर बहुत गहरा असर होनेवाला है। यह भी संभव है कि जब यह राजनीतिक बवंडर खत्म हो तब पता चले कि जो अंधड़ आया था वह अपने साथ उस पार्टी को ही उड़ाकर ले गया जो संयोग से एक दशक पहले आंदोलन की आंधी से ही पैदा हुई थी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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