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AI and Copyright: कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, एआई ने कॉपीराइट का नियम तोड़ा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स की मदद से रची रचनाओं पर जगह-जगह विवाद उठने लगे हैं। कई रचनाकार इनमें इस्‍तेमाल तत्‍वों पर कॉपीराइट का दावा कर रहे है, तो कई इन रचनाओं पर अपना कॉपीराइट हासिल करना चाहते हैं।

 artificial intelligence technology ai break the law of copyright

AI and Copyright: पिछले छह महीनों में एआई ने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है। इसकी लोकप्रियता आसमान छू रही है। इसमें रत्‍ती भर भी संदेह नहीं है। लेकिन, इसे लेकर आशंकाएं और विवादों की संख्‍या भी इसी अनुपात में बढ़ रही है। ताजा मुद्दा कॉपीराइट का है। उपयोगकर्ता एआई का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं। कविता, कहानी लिखवाने से लेकर चित्र, लोगो, डिजाइन बनवाने तक। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोग्रामों की मशीनी मेमोरी में अरबों की तादाद में मौजूद सूचनाएं और डाटा काम आता है।

चैट जीपीटी और इस जैसे कई एआई प्रोग्राम सेकेंडों के भीतर आपको वह सब दे देते हैं, जो आप उनसे मॉंगते हैं। आप उनसे माल ले लेते हैं। इस्‍तेमाल भी कर लेते हैं। बिना यह परवाह किए कि आखिर प्रोग्राम के पास यह सारा डाटा आया कहां से? आपने जो कविता लिखवाई है, उसके शब्‍द या पंक्तियां अलग-अलग कवियों की कल्‍पना की देन हो सकती हैं।

आपने जो चित्र टेक्‍स्‍ट प्रॉम्‍प्‍ट देकर बनवाया है, उसमें एआई द्वारा लिए गए कुछ हिस्‍से अलग-अलग चित्रकारों के हो सकते हैं। हो सकता है कि आप अपनी डिटर्जेंट कंपनी के लिए जो लोगो बनवा रहे हैं, वह रिन, सर्फ, टाइड, घड़ी, निरमा जैसे ब्रांडों के लोगो के अलग-अलग हिस्‍सों को जोड़कर बनाया गया है। ऐसी संभावनाओं की संख्‍या हजारों या शायद लाखों में हो सकती है।

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा लेकर जोड़े गए भानमती के इन कुनबों से आपकी जरूरतें पूरा हो जाती हैं। लेकिन, दिक्‍कत यह है कि इन ईंटों और रोड़ों के असली मालिक अब इस बेजा इस्‍तेमाल को लेकर ऐतराज जताने लगे हैं। सरल शब्‍दों में कहें तो आप अपनी कल्‍पनाओं के आधार पर बनाई गई जिस कृति को अपनी समझ रहे हैं, वह जिन लोगों की रचनाओं से मिलकर बनी होती है, अब वे इसके विरोध में लामबंद होने लगे हैं।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप ओपेन एआई का आर्टिस्‍ट प्रोग्राम डाल-ई ओपेन करते हैं। आप उसमें प्रॉम्‍प्‍ट (टेक्‍स्‍ट विवरण) देते हैं कि आपको एक जलपरी चाहिए, जो एक स्‍पेसशिप के ऊपर बैठी है और कॉफी पी रही है। आप यह भी बता देते हैं कि आपको कार्टून चाहिए, ड्राइंग चाहिए या रीयलिस्‍टक फोटोग्राफ चाहिए। दस-पंद्रह सेकेंड में आपके सामने आपका अपेक्षित चित्र आ जाता है। हो सकता है कि आपसे पहले किसी के दिमाग में यह ख्‍याल न आया हो कि कोई जलपरी समंदर को छोड़कर अंतरिक्ष की सैर पर जाए और वह भी अंतरिक्ष यान के भीतर नहीं, बल्कि उसके ऊपर बैठकर कॉफी पीते हुए।

लेकिन, यहॉं आपको यह समझना जरूरी हो जाता है कि वह जलपरी, कॉफी का कप, स्‍पेसशिप और अंतरिक्ष का बैकग्राउंड डाल-ई का बनाया हुआ नहीं है। डाल-ई स्वयं में कोई आर्टिस्‍ट नहीं है, बल्कि एक प्रोग्राम है। ऐसा प्रोग्राम, जिसके डेवलपर्स ने उसकी प्रोग्रामिंग करते समय उसकी कृत्रिम मेधा में वह सब फीड किया है। यह डाल-ई या चैट जीपीटी पर ही नहीं, बल्कि बार्ड, मिडजर्नी, स्‍टेबल जैसे हर उस प्रोग्राम के बारे में है, जो कृत्रिम मेधा से युक्‍त हैं, और किसी भी प्रकार का सृजन संयोजन कर रहा है।

न जानकारी न इजाजत

जनवरी 2023 के मध्‍य में एआई बनाम कॉपीराइट विवाद को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर तब चर्चा मिली, जब फोटो सिंडिकेशन सर्विस गेटी इमेज ने एआई आर्ट टूल स्‍टेबल डिफ्यूजन के खिलाफ लंदन हाईकोर्ट में केस कर दिया। उसका कहना था कि इसके डेवलपर्स ने गेटी इमेज से लाइसेंस लिए बिना, उसके कॉपीराइट वाली लाखों इमेजों का इस्‍तेमाल अवैध प्रतिलिपियॉं बनाने में किया है। ऐसी शिकायत सिर्फ गेटी इमेज को ही नहीं है। बड़ी संख्‍या में कलाकारों को लगने लगा है कि एआई के माध्‍यम से उनकी जानकारी या अनुमति के बगैर उनके काम का इस्‍तेमाल धड़ल्‍ले से किया जा रहा है और वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ दिन पहले नीदरलैंड स्थित मॉरीत्‍शुइस म्‍युजियम ने विख्‍यात चित्रकार वेरमीर की पेंटिंग 'गर्ल विद ए पर्ल इयरिंग' से प्रेरित एक एआई रचित इमेज प्रदर्शित की तो इस पर कलाकारों ने काफी नाराजगी जताई। उनकी शिकायत है कि एआई प्रोग्राम उनके काम की, उनकी शैली की कॉपी करते हैं, जिसके बदले उन्‍हें न कोई क्रेडिट मिलता है और न ही रॉयल्‍टी। यही नहीं, प्रोग्राम जेनरेटेड इमेज पर अपना लोगो भी लगा देता है। जिससे यह भ्रम होता है कि इमेज पर उस प्रोग्राम का कॉपीराइट है। पिछले महीने खबर आई थी कि अमेरिका में कुछ नामचीन कलाकारों ने अपने अधिकारों के लिए ड्रीमअप, मिडजर्नी और स्‍टेबल डिफ्यूजन के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा कर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। इसके अलावा कई जगह कलाकार, इस अतिक्रमण के विरुद्ध ऑनलाइन मुहिम भी चला रहे हैं। उनकी इस मुहिम तीन 'सी' पर आधारित है- कॉन्‍सेंट, क्रेडिट और कम्‍पनसेशन।

लड़ाई सिर्फ रचनाओं को लेकर ही नहीं है, बल्कि चित्रों की शैली (स्‍टाइल) को लेकर भी है। अगर आप एआई को प्रॉम्‍प्‍ट देकर उससे एमएफ हुसैन के घोड़े की शैली में एक हाथी का चित्र बनाकर उस पर महाराणा प्रताप को बैठाने के लिए कहते हैं तो हुसैन का स्‍टाइल यूज करने की वजह से वह चित्र कॉपीराइट का उल्‍लंघन माना जा सकता है। शैली क्‍या, कल इसमें और भी बहुत सारी चीजें शामिल हो सकती हैं, जैसे कि आवाज। आवाज की हुबहू नकल उतारने वाले एआई टूल तैयार हैं। कल अमिताभ बच्‍चन या सलमान खान जैसे कलाकार इस बात पर आपत्ति कर सकते हैं कि उनकी आवाज का इस्‍तेमाल उनकी अनुमति के बिना कैसे हो रहा है। आवाज के अलावा अदाएं भी शामिल की जा सकती हैं। कुछ साल पहले सुनने में आया था कि रजनीकांत जैसे कई कलाकारों ने अपनी अदाओं को पेटेंट भी कराया हुआ है।

एआई रचित सामग्री पर किसका अधिकार

इसी से जुड़ा हुआ, एक दूसरा पहलू और भी है। वह यह कि जब कोई व्‍यक्ति एआई की मदद से कोई रचना तैयार करता है तो क्‍या उसे उस रचना, जो चित्र भी हो सकता है या कोई उपन्‍यास भी, के लिए कॉपीराइट प्रदान किया जा सकता है? ऐसी किसी भी रचना का असली रचयिता कौन है, इंसान या मशीनी एलगोरिदम? इस महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न को पहली बार पिछले साल उठाया गया। न्‍यूयार्क की एक लेखिका क्रिस काश्‍तानोवा ने मिडजर्नी को टेक्‍स्‍ट प्रॉम्‍प्‍ट दे देकर एक फ्यू‍चरिस्टिक ग्राफिक उपन्‍यास लिख डाला। 18 पृष्‍ठों के इस सचित्र उपन्‍यास 'जार्या ऑफ द डॉन' को तैयार करने के लिए काश्‍तानोवा को सैकड़ों प्रॉम्‍प्‍ट देने पड़े। अपनी इस रचना को कॉपीराइट कानून के तहत प्रोटेक्‍ट कराने के लिए काश्‍तानोवा ने यूनाइटेड स्‍टेट कॉपीराइट ऑफिस में आवेदन किया। उसे कॉपीराइट मिल भी गया।

लेकिन, कहानी में ट्विस्‍ट तब आया, जब इसी साल फरवरी में यूएससीओ ने यू-टर्न लेते हुए उसके कॉपीराइट को सीमित कर सिर्फ स्‍टोरी आइडिया तक सीमित कर दिया। किताब में इस्‍तेमाल सभी चित्रों के लिए काश्‍तानोवा को मिले कॉपीराइट को निरस्‍त कर दिया गया। यूएससीओ का कहना था कि इन चित्रों की रचना किसी मनुष्‍य द्वारा नहीं की गई है, इसलिए इन पर किसी का कॉपीराइट स्‍थापित नहीं किया जा सकता।

इसी से मिलता-जुलता मसला पंद्रह साल पहले भी सामने आया था। वर्ष 2008 में डेविड स्लेटर नामक एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर ने इंडोनेशिया की यात्रा के दौरान एक प्रयोग किया। उन्‍होंने बंदरों के कुछ नेचुरल फोटो लेने के लिए अपना कैमरा बंदरों के बीच एक तिपाई पर रखकर छोड़ दिया। बंदरों में से एक ने कैमरा चलाया और अपनी सेल्फी ले ली। स्लेटर ने इस सेल्फी को एक पत्रिका में प्रकाशित भी करवा दिया। तीन साल बाद जब इस तस्‍वीर को विकिपीडिया वेबसाइट पर अपलोड किया गया तो स्लेटर ने कॉपीराइट का हवाला देते हुए विकिपीडिया से तस्वीरों को हटाने की मांग की। विकिपीडिया ने इंकार‍ कर दिया।

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    इस पर दोनों के बीच कानूनी जंग शुरू हो गयी। 2015 में, पेटा (प्रिवेंशन फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) भी इस जंग में कूद पड़ा। संस्‍था ने बंदर की ओर से कैलिफोर्निया के एक कोर्ट में स्लेटर पर मुकदमा दायर कर दिया। इसमें दावा किया गया था कि तस्‍वीर बंदर ने ली थी, इसलिए इसका कॉपीराइट उसे ही मिलना चाहिए। इस मामले में कोर्ट का फैसला था कि कॉपीराइट जानवरों पर लागू नहीं होता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कॉपीराइट कितना पेचीदा विषय है। पंद्रह साल बाद भी सवाल जस का तस है, बस मंकी की जगह मशीन ने ले ली है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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