Anti-India Propaganda: कैसे लिखी जाती है विदेशी धरती से भारत विरोधी मुहिम की पटकथा?
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट, बीबीसी की गुजरात पर डाॅक्यूमेंट्री, जार्ज सोरोस का ऐलान और बिलावल भुट्टो का अमेरिका में भाषण, क्या इन सभी में कुछ समानता है? क्या ये सभी विदेशी धरती से भारत विरोधी मुहिम की पटकथा से जुड़े हैं।

Anti-India Propaganda: विदेशी धरती से भारत विरोधी पटकथा लिखने का इतिहास पुराना है। वर्ष 2005 से मोदी को केन्द्र में रखकर ये किया जा रहा है। तब अमेरिका ने उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनयिक वीजा को वापस ले लिया था। अमेरिका ने अपने इमीग्रेशन एंड नेशनैलिटी एक्ट का बहाना बनाया था, जिसके अंतर्गत किसी भी राजनयिक का वीजा रद्द किया जा सकता है, यदि उस पर धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का आरोप हो। तब से हडसन नदी में न जाने कितना बह गया पर उनका क्या करें, जो आज भी यह मंशा संजोए हुए हैं कि भारत के मोदी को देश में नहीं तो विदेश में घेर लेंगे।
हिंडनबर्ग के बहाने भारत की आर्थिक प्रगति को निशाना बनाने की कोशिश की गई तो बीबीसी के बहाने हिंदुत्व को। इसके पहले दर्जनों बार कश्मीर और मुस्लिमों के प्रति कथित ज्यादती को आधार बनाकर भारत विरोधी मुहिम को हवा दी गई। इस मुहिम को चलाने वाले लोग संख्या में बहुत थोड़े हैं, लेकिन इनका अंतरराष्ट्रीय इकोसिस्टम इन्हें आवश्यक मजबूती प्रदान कर रहा है। यह इकोसिस्टम चीन, पाकिस्तान, तुर्की, अमेरिका, यूरोप खासकर ब्रिटेन में पहले से बना हुआ है और इसको खाद पानी यहां भारत के कुछ लोग दे रहे हैं। इनमें राजनीतिक पार्टियां तो हैं हीं, कुछ खास विचारधारा के लोग भी हैं।
विदेशी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने तो भारत और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रोपोगेंडा फैलाने की आदत सी बना ली है। इनमें न्यूयार्क टाइम्स प्रधानमंत्री मोदी विरोधी खेमा का सबसे बड़ा प्लेटफार्म बना हुआ है। यहां तक कि 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत पर भी इस पत्र ने कटाक्ष करने और कीचड़ उछालने का मौका नहीं छोड़ा। यहां भारत में मोदी की जीत में भारतीय मुसलमानों खासकर मुस्लिम महिलाओं के योगदान पर चर्चा हो रही थी, तो उधर न्यूयार्क टाइम्स में गारडिनर हैरिस ने लिखा कि ''भगवा पार्टी'' की जीत से मुसलमान बहुत परेशान है कि अब उनका भारत में भविष्य और भी अनिश्चित हो गया है।
15 सितंबर 2021 को न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा कि भारत ने मुसलमानों को जानबूझ कर विदेशी करार दिया है। यह बात एनआरसी के संदर्भ में कही गयी, जबकि गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि इस देश के किसी भी मुसलमान को डरने की जरूरत नहीं है। 24 सितंबर, 2021 को न्यूयार्क टाइम्स अपने लेख में कहता है- 'फाॅर इंडिया'ज मिलिट्री, ए जगलिंग एक्ट आन टू होस्टाइल फ्रंट'। इस लेख में भारत की सैन्य ताकत का मजाक उड़ाया गया है और लिखा है कि भारत के पास जंग लड़ने के लिए न हथियार है और न पैसा है।
12 अक्टूबर 2021 को न्यूयार्क टाइम्स आरोप लगाता है कि मोदी सरकार अपने विरोधियों को जेल में बंद करने के लिए आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले कानून का उपयोग कर रही है। शीर्षक दिया - 'आर वी ह्यूमन' यानी क्या हम इंसान हैं। न्यूयार्क टाइम्स घटनाओं को ही अपने तरीके से रिपोर्ट नहीं करता, बल्कि कुछ मुद्दों पर वह वर्षों से भारत का विरोध करता रहा है। कश्मीर मसले पर, हिंदुत्व पर और भारत विरोधी अभियानों पर वह हमेशा से ही उपद्रवियों का साथ देता रहा है। किसान आंदोलन को न्यूयार्क टाइम्स ने सरकार के खिलाफ किसानों का विद्रोह बताया तो कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों के मानवाधिकार पर आवाज बुलंद करता रहा।
ऐसा नहीं है कि न्यूयार्क टाइम्स को भारत के बारे में कोई अंदाज नहीं है या यहां की परिस्थितियों से वह आगाह नहीं है। बल्कि इसके उलट वह उन्हीं लेखकों और रिपोर्टरों को अपने यहां जगह देता है, जो भाजपा से सैंद्धातिक खिलाफत रखते हैं या संघ एवं राष्ट्रवादी संगठनों से घृणा करते हैं। भारत और मोदी के खिलाफ न्यूयार्क टाइम्स में लिखने वालों में शामिल हैं- करणदीप सिंह, सिद्धार्थ देब, मुजीब मशाल, हरी कुमार, समीर यासीर, राणा अयूब, अरूधंती राय। इन सभी का ट्वीटर हैंडल देखकर ही समझ में आ जाएगा कि इनकी पहचान क्या है। प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर रखकर भारत का विरोध।
बात बीबीसी की। 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में दंगे हुए। मारे गए लोगों की लाश पर जमकर राजनीति हुई। स्थानीय स्तर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया। तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को सुप्रीम कोर्ट से यह क्लीन चिट मिल गई कि दंगे में उनकी भूमिका किसी के प्रति पक्षपात या पक्षपूर्ण नहीं थी। उसके बाद से गुजरात में पांच चुनाव हो गए। चार आम चुनाव भी हुए। हर बार विपक्ष ने गुजरात दंगे को राजनीतिक मुद्दा बनाया, जनता ने हर बार उसे नकारा। अब फिर से बीबीसी ने इस मुद्दे को उठाया। एक डाॅक्यूमेंट्री के जरिए।
ब्रिटिश सरकार ने कथित रुप से उस समय गुजरात दंगे की जांच कराई थी, जिसकी रिपोर्ट पेश नहीं हो सकी। उसी को बीबीसी ने आधार बनाकर डाॅक्यूमेंट्री बनाकर हंगामा मचा दिया। उस समय के ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रा का पक्ष जानिए- 2002 के गुजरात दंगे के बारे में उनके लोगोें ने नरेंद्र मोदी के बारे में उन्हें जो जानकारी दी उसके अनुसार मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका मुसलमानों के खिलाफ थी। उनको ऐसी जानकारी उनके दिल्ली और मुंबई स्थित दूतावास के लोगों ने दी थी जो उस समय अहमदाबाद में थे। स्ट्राॅ फिर खुद कहते हैं - "हां वे लोग कोई प्रशिक्षित पुलिस अधिकारी नहीं थे। बस उनका आंकलन था।" किसी का आंकलन कोई अधिकारिक रिपोर्ट हो सकती है क्या? फिर भी बीबीसी ने गलत जानकारी देकर इस पर फिल्म बनाई।
अब जरा उन चेहरों पर नजर डालते हैं जो विदेशी धरती से भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा करते हैं और उनको हमारे ही लोग समर्थन करते हैं। उनमें कुछ चेहरे ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेताओं के हैं। लेबर पार्टी के कई नेता वहां रह रहे पाकिस्तानी मुस्लिमों के वोट के लिए अक्सर भारत विरोधी बयान देते रहे हैं, उनमे हैं जेरेमी कोरबिन, पाकिस्तान मूल के खालिद मुहम्मद, रोजर गाॅडसिफ, जिम शैनेन और जाॅन स्पेलर। इन सभी लोगों ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारत द्वारा आर्टिकल 370 हटाए जाने के विरोध में एक प्रस्ताव 4 सितंबर 2019 को पेश किया था।
इन्हीं ब्रिटिश सांसदों के साथ कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अपने लंदन दौरे पर मुलाकात करते हैं और कश्मीर में मानवाधिकार हनन के उनके नजरिए को स्वीकार करते हैं। खुद जेरेमी कोरबिन ने एक ट्वीट जारी कर दावा किया कि भारतीय कांग्रेस के ब्रिटेन स्थित प्रतिनिधियों से कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद हुए मानवाधिकार हनन पर बात हुई और अच्छा विचार विमर्श हुआ। जेरेमी के साथ राहुल गांधी की मुलाकात की जब तस्वीर सामने आई तो कांग्रेस ने आनन फानन में उनके विचार से खुद को अलग किया।
Recommended Video

विदेशी धरती से भारत के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की फेहरिस्त लंबी है। लेकिन इतना तय है कि भले ही कुछ ताकतें भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को कमतर आंकने के लिए नकरात्मक अभियान चला रही हों, पर सच्चाई यह है कि आज के हालात में कोई भी बड़ा देश भारत की मजबूत स्थिति और अंतरराष्ट्रीय मामलों में मजबूत पकड़ से इंकार नहीं कर सकता।
यह भी पढ़ें: Pakistan Crisis: संकट में फंसे पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम, कितनी सुरक्षित है दुनिया?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications