Andhra Pradesh: बीजेपी ने जगन रेड्डी के बजाय चंद्रबाबू के साथ क्यों किया गठबंधन?

Andhra Pradesh: 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने लिए 370 और एनडीए गठबंधन के लिए 400 सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही बीजेपी दक्षिण के राज्य आंध्रप्रदेश में गठबंधन का साथी पाने में सफल रही है। 6 साल बाद एक बार फिर टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू सारे गिले-शिकवे भुलाकर एनडीए का हिस्सा बन गए हैं।

9 मार्च को बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू और जेएसपी के मुखिया पवन कल्याण की तरफ से एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया था कि तीनों दलों में मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने पर सहमति बन गई है। बीजेपी 6 लोकसभा और 10 विधानसभा, तेलगुदेशम पार्टी 17 लोकसभा और 144 विधानसभा और पवन कल्याण की जनसेना 2 लोकसभा और 21 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

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तेलगुदेशम पार्टी और जनसेना के साथ बीजेपी के जुड़ जाने से बीजेपी को फ़ायदा होना तय है, क्योंकि बीजेपी को आंध्र प्रदेश में खोने के लिए कुछ भी नहीं हैं। आंध्र प्रदेश में 175 विधानसभा और 25 लोकसभा सीटें हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में BJP का वोट शेयर आंध्र प्रदेश में 1% से भी कम रहा था, और नोटा से भी कम वोट मिला था। बीजेपी को भरोसा है कि गठबंधन में शामिल होकर वह अपनी स्थिति आंध्र प्रदेश में सुधार सकती है।

आंध्र प्रदेश में बीजेपी इस बात को समझ रही थी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के भ्रष्टाचार, तेलगुदेशम के कमजोर होने और कांग्रेस के लगभग ख़त्म होने के बाद भी उसकी स्थिति मजबूत नहीं हो रही थी। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के बाद भी आंध्र प्रदेश में बीजेपी के लिए राज्य में जगह नहीं बन पा रही है। दक्षिण के राज्यों में आंध्र प्रदेश ही बीजेपी के लिए सबसे कमजोर कड़ी बना रहा।

आंध्र प्रदेश से टूटकर बने तेलंगाना में बीजेपी ने अपना आधार तैयार कर लिया है और पिछले लोकसभा चुनाव में 4 सीटें भी जीत ली थी। कुछ माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में तेलंगाना में बीजेपी ने अपने वोट बैंक में शानदार बढ़ोतरी कर ली।

दक्षिण के एक और राज्य तमिलनाडु में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई ने जिस तरह से एआईएडीएमके से गठबंधन टूटने के बाद भी बीजेपी के लिए उम्मीद की किरण जगा दी है, वैसा नेता आंध्र प्रदेश में बीजेपी को मिल नहीं सका। हालाँकि बीजेपी ने एनटी रामाराव की बेटी और चंद्रबाबू की साली पुरंदेश्वरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो सकी। ऐसे में बीजेपी के पास भी चंद्रबाबु नायडू से हाथ मिलाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।

गठबंधन को लेकर आंध्र प्रदेश भाजपा में दो तरह की सलाह केंद्रीय नेतृत्व को मिल रही थी। एक गुट का मानना है कि चंद्रबाबू नायडू भरोसे वाले नेता नहीं हैं और बीजेपी को अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए। ये नेता, पवन कल्याण की पार्टी से गठबंधन के पक्ष में तो थे, लेकिन नायडू के साथ जाने के पक्ष में नहीं थे। आन्ध्र प्रदेश में एक ऐसा भी गुट था जिसने बीजेपी शीर्ष नेतृत्व को सलाह दी कि अगर आंध्र प्रदेश में कुछ भी हासिल करना है तो गठबंधन ही एकमात्र विकल्प है और इससे प्रधानमंत्री मोदी के 400 पार के लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलेगी।

बीजेपी आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ बन रहे माहौल को भांप रही थी और यह मान कर चल रही है कि जगनमोहन से नाराज़गी का पूरा फ़ायदा नायडू को मिलेगा। ऐसे में टीडीपी राज्य की सत्ता में वापसी कर सकती है अत: चन्द्रबाबू नायडू के साथ हाथ मिलाना उसके लिए फायदे का सौदा होगा। वाईएसआरसीपी के ख़िलाफ़ बन रही हवा को भांपते हुए ही बीजेपी ने टीडीपी के साथ जाने का निर्णय लिया है।

चंद्रबाबू नायडू की भी राजनीतिक मजबूरी थी कि वो बीजेपी के साथ जुड़कर पुन: एनडीए में आ जाएं। उल्लेखनीय है कि अगस्त 1995 में चंद्रबाबू नायडू ने एनटीआर की पार्टी को तोड़कर अपनी सरकार बनाई थी। 1996 के लोकसभा चुनावों के पहले नायडू अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए में शामिल हो गए थे और तब से लेकर 2018 तक एनडीए का हिस्सा रहे। आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग पूरी न होने पर चंद्रबाबू ने बीजेपी का साथ छोड़ा था। वो मांग अभी भी अधूरी है, लेकिन घोटाले में गिरफ्तारी के बाद से चंद्रबाबू को केंद्रीय एजेंसियों का भी डर है। उन्हें लगता है कि बीजेपी के साथ जाने से वो कानूनी कार्रवाई से बचे रहेंगे।

गौरतलब है कि बीते साल सितंबर में आंध्र प्रदेश कौशल विकास निगम घोटाले में चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी हुई थी। पिछले चुनाव में तगड़ा नुक़सान उठा चुकी टीडीपी को लगता है कि मोदी और शाह की मदद से जगनमोहन के सामने मजबूती से खड़ा हुआ जा सकता है। चंद्रबाबू नायडू को ये भी पता है कि मोदी और जगनमोहन के बीच बुरे संबंध नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी के साथ गठबंधन होने से टीडीपी आंध्र प्रदेश की जनता को ये संदेश देने में भी सफल रहेगी कि केंद्र सरकार उसके पक्ष में है।

2014 में बीजेपी ने आंध्र प्रदेश में 2 लोकसभा सीट और विधानसभा में 4 सीट जीती थी। तब बीजेपी टीडीपी के साथ गठबंधन में थी। 2019 में गठबंधन टूटा तो लोकसभा और विधानसभा में बीजेपी का खाता नहीं खुला। इसलिए चंद्राबाबू के साथ जाकर पार्टी जहां राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है वहीं दूसरी ओर वाईएस जगनमोहन रेड्डी, हेमंत सोरेन और केजरीवाल की तरह ईडी और सीबीआई के चक्कर नहीं लगाना चाहते हैं। इसलिए केंद्र से अच्छे संबंध बनाकर रखते हैं और राज्यसभा में हरसंभव मदद बीजेपी की करते हैं।

बीजेपी दक्षिण में कांग्रेस को किसी भी स्थिति में ज़िंदा नहीं होने देना चाहती हैं और इस कारण सभी को साधकर चल रही है। मोदी का लोकसभा में 370 सीटों का लक्ष्य बिना दक्षिण को साधे संभव नहीं हैं। ऐसे में दक्षिण का एक-एक सहयोगी दल बीजेपी को उसके लक्ष्य में मदद कर सकता है।

बीजेपी का लक्ष्य साफ़ है जहां अपने पैरो पर नहीं खड़े हो सकते हैं वहाँ दूसरों के सहारे आगे बढें। इसलिए आंध्र प्रदेश में बीजेपी दोनों प्रमुख दलों को साधकर चल रही है। चुनाव भले ही टीडीपी और पवन कल्याण के साथ लड़ रही है लेकिन चुनाव के बाद जगनमोहन के साथ भी बीजेपी जा सकती है। लोकसभा और विधानसभा का चुनाव परिणाम तय करेगा कि बीजेपी किस नाव की सवारी करेगी। फ़िलहाल आंध्र प्रदेश में बीजेपी के दोनों हाथों में लड्डू है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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