Indian Diplomacy: यूक्रेन युद्ध के बाद भारतीय कूटनीति का महत्त्व अमरीका ने भी क्यों स्वीकारा?

Indian Diplomacy: भारत के विदेशमंत्री एस. जयशंकर रूस की यात्रा से भारत लौट आए हैं। वैसे तो जब भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रूस के नेताओं से मुलाक़ात या फोन पर बात होती है, अमेरिका की निगाहें भारत की तरफ लग जाती है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से सारी दुनिया की नजर भारत की तरफ है।

भारत उन गिने चुने देशों में शामिल है, जो रूस के साथ खड़ा है, लेकिन युद्ध का विरोध कर रहा है। 24 फरवरी 2022 के दिन जबसे युद्ध शुरू हुआ है, भारत युद्ध का विरोध कर रहा है, चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या विदेशमंत्री एस. जयशंकर, दोनों ने रूस को हमेशा यह कहा कि यह कूटनीति का जमाना है, युद्ध का नहीं। इस बार भी जयशंकर रूस के राष्ट्रपति पुतिन के नाम यही संदेश ले कर गए थे।
आठ दस साल पहले भारत की वह हैसियत नहीं थी कि वह दुनिया को रास्ता दिखाने वाले देश के तौर पर जाना जाए, लेकिन अब भारत के हर कूटनीतिक कदम का दुनिया बारीकी से विश्लेषण करती है। पुतिन को मोदी के संदेश में कुछ नया नहीं था, 15 सितंबर को समरकंद में हुई शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक में आमने सामने की मुलाक़ात में भी मोदी ने पुतिन को यही बात कही थी।
लेकिन रूस को रोकने में नाकाम अमेरिका ने एस. जयशंकर के भारत लौटने पर बयान दिया है कि रूस को भारत की बात सुननी चाहिए। अमेरिका का यह बयान साबित करता है कि पिछले साढ़े तीन साल में दुनिया में शान्ति के लिए भारत कूटनीति का केंद्रबिंदू बन गया है।
अगर हम जवाहर लाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति के आधार पर भी देखें, तो मोदी सरकार ने भारत के हितों को सर्वोच्चता देते हुए गुटनिरपेक्षता को आगे बढाया। मोदी से पहले की कूटनीति और मोदी के बाद की कूटनीति में अंतर यह आया है कि अब भारत अपने हितों की अनदेखी कर के तटस्थता नहीं अपनाएगा। वह अपने हित देख कर ही किसी के साथ खड़ा होगा।
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यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू होने पर अमेरिका और यूरोप ने रूस पर दबाव बनाने के लिए तरह तरह की रणनीति अपनाई थी, इसमें एक रणनीति रूस से तेल और गैस खरीदना बंद कर के उसे आर्थिक रूप से कमजोर करना भी शामिल था।
उस समय भारत की जनभावनाएं भी यूक्रेन के साथ थीं, उसके दो कारण थे, पहला तो यह कि रूस का एकतरफा हमला दादागिरी था, दूसरा कारण यह था कि बड़ी तादाद में भारतीय छात्र यूक्रेन में पढ़ रहे थे, जिनका जीवन संकट में पड गया था। इन दो कारणों से भारत का मीडिया भी यूक्रेन का समर्थन कर रहा था, इन्हीं जनभावनाओं के कारण कुछ दिन की चुप्पी के बाद भारत ने रूस के खिलाफ एक बयान भी दिया था, लेकिन वह बयान भारत की कूटनीति का हिस्सा था।
जनभावनाओं के बावजूद भारत मन से यूक्रेन के साथ खड़ा नहीं होना चाहता था, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में 17 बार यूक्रेन ने भारत के खिलाफ वोट किया था। भारत रूस की पुरानी दोस्ती के चलते यूक्रेन ने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया, इसलिए भारत को यूक्रेन और अमेरिका के साथ खड़े होने से बेहतर पुराने साथी रूस से सस्ता तेल खरीदने में राष्ट्रीय हित नजर आया।
जब अमेरिका दुनिया भर के देशों पर रूस से तेल खरीदना बंद करने का दबाव बना रहा था, तब भारत ने मौके का फायदा उठा कर खरीददारी बढानी शुरू कर दी। इसकी जब अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों ने आलोचना की, तो भारत ने दो-टूक शब्दों में कहा कि उस की हर नीति भारत के हितों को ध्यान में रख कर होगी, किसी बाहरी देश के दबाव में नहीं।
यूक्रेन पर हमले के बाद से रूस से भारत आयात साढ़े तीन गुना बढ़कर 8.6 अरब डॉलर हो गया है। नवंबर आते आते रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन चुका है। एनर्जी कार्गो ट्रैकर वोर्टेक्स के अनुसार रूस ने अक्टूबर में भारत को कच्चे तेल की 935,556 बैरल हर दिन सप्लाई की, जो इराक से 20.5 प्रतिशत और सऊदी अरब से आए कच्चे तेल से 16 प्रतिशत ज्यादा है।
इस बीच एक बड़ी बात यह भी हुई कि भारत ने डॉलर की बजाए रूपए में लेनदेन का एलान किया, जिसके दूरगामी परिणाम निकलेंगे और आने वाले समय में भारतीय करंसी की अंतरराष्ट्रीय मार्केट वेल्यू बढ़ेगी।
अभी हाल ही में जब डॉलर की कीमत बढी तो भारत के विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि उनकी गलत अर्थनीतियों के कारण रूपये की कीमत घट रही है। इस का वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने यह कहते हुए खंडन किया था कि रूपए की कीमत नहीं घट रही, बल्कि डालर की कीमत बढी है। यह सच भी था, क्योंकि बाकी अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मुकाबले रुपए की कीमत में इजाफा हुआ है।
यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि भारत की कूटनीतिक रणनीति को देखते हुए अमेरिका ने चाहकर भी रूस से तेल आयात पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया, क्योंकि ऐसी स्थिति में दुनिया एकबार फिर दो-ध्रुवीय हो जाती।
अमेरिका के प्रवक्ता ने भारत का रूस से तेल आयात बढने पर बयान दिया है कि रूसी तेल आयात के बारे में फैसला अलग-अलग देशों पर छोड़ दिया गया है। अमेरिका ने इस बयान में उम्मीद जताई है कि सभी देश अपनी परिस्थितियों के आधार पर सही फैसला करेंगे, और अमेरिका ग्लोबल मार्केट में रूस की ताकत को कम करने के लिए भारत समेत यूरोपीय देशों के साथ सहयोग करता रहेगा। अमेरिका का यह बयान अमेरिका पर भारत की कूटनीतिक जीत का प्रमाण है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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