Semiconductor Manufacturing: छोटा सा चिप लेकिन बहुत काम का! क्या भारत बन पाएगा आत्मनिर्भर?
Semiconductor Manufacturing: औद्योगिक उपनिवेशवाद के इस नये दौर में सेमी कंडक्टर चिप एक बहुत बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। इसे लेकर एक बड़ी खबर यह आयी है कि हाल ही में अमेरिका द्वारा चीन को एडवांस्ड सेमी कंडक्टर की सप्लाई रोक दी गई ताकि द्रुतगामी विकास, टेक्नोलॉजी और अत्याधुनिक हथियारों की होड़ में उसकी ताकत को सीमित किया जा सके।

जवाब में चीन ने टेक्नो नेशनलिज्म का नारा देकर, तीन साल के भीतर देश को सेमी कंडक्टर चिप उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कमर कस ली है और वहॉं की हर छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाई को सेमी कंडक्टर के निर्माण में लगा दिया है।
यह खबर इसलिए भी चौंकाने वाली है कि अमेरिका ने इतना सख्त कदम ऐसे दौर में उठाया है, जब अमेरिका की चिप इंडस्ट्री मॉंग में कमी और शेयरों की कीमत में पचास फीसदी तक की गिरावट का सामना कर रही है, जिसकी वजह से इसके उत्पादन में लगी इंटेल आौर दूसरी कई बड़ी कंपनियों पर अपने खर्च और कर्मचारियों की संख्या में कटौती का दबाव बन रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि ये कंपनियॉं आने वाले दिनों में अपने बीस प्रतिशत कर्मचारियों को जॉब से निकाल सकती हैं।
इसके बावजूद अमेरिका जैसा दूरदर्शी देश, दुनिया के सबसे बड़े सेमी कंडक्टर मार्केट चीन में सप्लाई बंद करने का फैसला ले रहा है तो इसकी वजह यही हो सकती है कि वह 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर की हो जाने वाली चिप इंडस्ट्री में चीन का प्रभाव कम करना चाहता है। उस चीन का, जो इसके उत्पादन में 12% आत्मनिर्भरता के बावजूद, चिप मार्केट में चालीस फीसदी की भागीदारी करता है, जिसके 2030 तक साठ फीसदी तक पहुँचने का अनुमान लगाया जा रहा है।
सेमीकंडक्टर चिप क्या होता है?
सेमीकंडक्टर यानि अर्द्धचालक, जिन्हें इंटीग्रेटेड सर्किट भी कहा जाता है, विद्युत के कुचालक और सुचालक के बीच का गुण रखते हैं और किसी भी इलेक्ट्रिक उपकरण में विद्युत के प्रवाह को नियंत्रित रखने का कार्य करते हैं। ये आमतौर पर सिलिकॉन से बनते हैं, जिनमें डोपिंग के जरिये बदलाव लाया जाता है। माइक्रोचिप, लॉजिक चिप, मेमोरी चिप आदि इनके कुछ प्रमुख रूप हैं, जो अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। संक्षेप में कहें तो आज इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।
आज हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे अनेक डिवाइसों और गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें चलाने के लिए सेमी कंडक्टर चिप अनिवार्य हैं।
स्मार्ट फोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, वीयरेबल डिवाइसेज, वाशिंग मशीन, फ्रिज, इलेक्ट्रिक व्हीकल, पेसमेकर जैसे ढेरों उपभोक्ता उत्पादों से लेकर एटीएम, हॉस्पिटल, मौसम की भविष्यवाणी, उड्डयन, सार्वजनिक परिवहन, पॉवर, वायरलेस कनेक्टिविटी, डेटा सेंटर, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, ब्लॉकचेन, रोबोटिक्स, आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस जैसी सेवाओं तक यह सूची बहुत लंबी है, जिनमें चिप हृदय की भूमिका निभाते हैं।
सेमी कंडक्टर चिप्स क्यों महत्वपूर्ण हैं?
चिप आधारित इन उत्पादों और सेवाओं का बाजार इतना बड़ा है, कि सेमी कंडक्टर चिप की कमी बहुत सारे देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। इसीलिए जब भी चिप की सप्लाई पर कोई संकट आता है, दुनिया के बहुत सारे देश बहुत छटपटाने लगते हैं।
कोरोना के समय में चिप के उत्पादन और आपूर्ति की कमी हुई तो हमने इसे शिद्दत से महसूस किया था। इसी साल मार्च के महीने में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था तो भी हम चिप की आपूर्ति को लेकर चिंतित हो उठे थे और कुछ अर्सा पहले जब चीन ने ताइवान पर हमले की मंशा जताई तो इसी डर ने दुनिया के बहुत सारे देशों को चीन के खिलाफ एकजुट कर दिया था।
औद्योगिक क्रांति के चौथे दौर में आज हम डाटा और एआई के एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहॉं सेमीकंडक्टर के बिना विकास का पहिया पूरी तरह थम जायेगा। इसीलिये इनकी आपूर्ति पर निर्भर लगभग सभी देश इस मामले में सारे मतभेद भुलाकर, एक साथ यह सुनिश्चित करने में जुट जाते हैं कि इसकी कमी की वजह से उनके आर्थिक हितों और तकनीकी विकास की गति पर कोई विपरीत असर न पड़े।
चिप उत्पादन में कौन कहॉं है?
इस मामले में दुनिया के शीर्ष पॉंच देशों की बात करें तो 50% मार्केट शेयर के साथ पहले स्थान पर है ताइवान, इसके बाद दक्षिण कोरिया, फिर जापान, चीन और अमेरिका। अन्य देशों में जर्मनी, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, नीदरलैंड जैसे देश हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दुनिया का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश भारत इस सूची में नहीं है। वह भी तब, जब वर्ष 2030 तक, 110 बिलियन डॉलर के खर्च के साथ सेमीकंडक्टर उपभोग के मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा देश बनने जा रहा है।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि इस दौर में जो देश डाटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में अग्रणी रहेगा, दुनिया में उसी का दबदबा रहने वाला है। इसलिए, दुनिया के अनेक देश इस क्षेत्र में काफी धन और संसाधन निवेश कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि क्या हम सेमीकंडक्टर को लेकर अपनी वर्तमान स्थिति को बनाये रखना अफोर्ड कर सकते हैं, जहॉं हम अपनी जरूरतों के लिए अधिकांशत: आयात पर ही निर्भर है।
हम क्या कर रहे हैं?
अच्छी बात यह है कि देर से ही सही, हमने इस बारे में अपनी समझ और प्रयासों का विस्तार किया है और भारत सरकार, सेमी कंडक्टर मैनुफैक्चरिंग के क्षेत्र में अधिक से अधिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए पहले की तुलना में काफी गंभीर और सक्रिय नजर आने लगी है।
पिछले साल जब देश में चिप की कमी से ऑटोमोटिव, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे प्रौद्योगिकी क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे थे, तो सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग को गति देने के लिए दस बिलियन डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की थी और इसके बाद भारत ने इस इंडस्ट्री के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं।
इनमें सेमीकंडक्टर फैब (फैब्रिकेशन प्लांट) और डिस्प्ले फैब, जिसके तहत आवेदकों को प्रोडक्शन कॉस्ट के पचास फीसदी तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जायेगी; सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला, जो आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण के लिए कार्य करेगी और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, जिसके तहत सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले के उत्पादन की सुचारू व्यवस्था विकसित करने के लिए दीर्घकालीन नीतियों को बढ़ावा दिया जायेगा और साथ ही यह मिशन सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले आधारित परियोजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी का भी काम करेगा।
संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि अगर भारत सेमीकंडक्टर की विकसित और विकासशील दुनिया में सेमीकंडक्टर को लेकर अघोषित रूप से चल रही यह रेस जीत लेता है तो भविष्य में हर क्षेत्र में उसकी जीत सुनिश्चित है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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