Akhilesh Yadav: रूठने-मनाने की राजनीति में उलझे अखिलेश
कल तक अखिलेश यादव कांग्रेस से नाराज थे, आज मान गए हैं। सपा मुखिया ने खुद यह बयान दिया है कि कांग्रेस के सबसे बड़े नेता का फ़ोन आ गया है वह कोशिश करेंगे कि इंडिया गतवबंधन न टूटे। ख़बरों मे यही कहा गया है कि राहुल गाँधी ने खुद अखिलेश यादव को फ़ोन किया था।
दो दिन पहले ही अखिलेश यादव ने कांग्रेस को धोखेबाज पार्टी कहा था और उसके प्रदेश के बड़े नेता को 'चिरकुट'। देखा जाए तो पिछले डेढ़ दशक के करियर में अखिलेश यादव रूठने और मनाने की राजनीति में ज्यादातर उलझे ही रहे। पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव, अमर सिंह, मायावती, चौधरी अजित सिंह और राहुल गांधी तक से उनके रूठने मनाने का संबंध रहा है।

साल 2012 के उत्तरप्रदेश विधान सभा चुनाव में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी थी। उनकी उम्र, तजुर्बा और उनके स्वभाव को देखते हुए कोई यह मानने के लिए तैयार नहीं हुआ कि उत्तरप्रदेश जैसा बड़ा राज्य वह संभाल सकते हैं। हुआ भी यही, प्रदेश में चार चार सुपर सीएम हो गए। मुलायम सिंह के अलावा अमरसिंह, शिवपाल यादव और आजम खान अपने अपने ढंग से फैसले करने लगे। कई बार सार्वजनिक तौर पर मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव की गरिमा का उल्लंघन कर दिया। मुख्य मंत्री के रूप में तीन साल बीत जाने के बाद अखिलेश को होश आया कि अब न संभले तो फिर कभी नेतृत्व का अवसर नहीं मिलेगा। पहली बार अखिलेश ने अपनी हनक दिखाई और अपने मेंटर अमर सिंह को ही सपा से बाहर कर दिया। अखिलेश यादव किसी भी सूरत में अमर सिंह को माफ़ करने को तैयार नहीं हुए, भले ही इसके लिए उन्हें अपने पिता से ही विद्रोह करना पड़ गया।
विद्रोह तो उन्होंने चाचा शिवपाल से भी किया। पहले मंत्रिमंडल से हटाया फिर पार्टी से भी जाने पर मज़बूर कर दिया। चाचा और पिता के प्रति उनके रूखे और विद्रोही व्यवहार ने अखिलेश यादव को एक ऐसा ख़राब नाम दे दिया, जिसे सुनकर अखिलेश आज भी तिलमिला उठते हैं। 'टीपू' के नाम से पुकारे जाने वाले अखिलेश को विरोधियों ने औरंगजेब तक कह दिया।
अखिलेश यादव अपनी नाराजगी इतना आगे तक ले गए कि सपा में ही दोफाड़ हो गया और किसी की भी कल्पना से परे मुलायम सिंह ने उन्हें और रामगोपाल यादव को ही पार्टी से बाहर कर दिया। अखिलेश और रामगोपाल यादव के सपा से निष्कासन के बाद सपा दो फाड़ होने के कगार पर पहुंच गई थी। चुनाव की दहलीज पर खड़े राज्य में पार्टी की इस हालत ने न केवल विधानसभा चुनाव के घोषित प्रत्याशियों को बेचैन कर दिया, बल्कि आम सपाइयों को भी अपना सियासी भविष्य खतरे में नजर आने लगा। इसके बाद अखिलेश ने ठहराव का संदेश दिया और पिता से सुलह कर सपा के फिर मुखिया बन गए।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव को दोबारा पार्टी में शामिल किए जाने पर कार्यकर्ता भी खुश हो गए। लेकिन 2017 विधानसभा के चुनाव में भाजपा ने तीन-चौथाई बहुमत के साथ भारी जीत दर्ज की। भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में 320 से अधिक सीटों पर कब्ज़ा जमा कर अखिलेश यादव को भरी शिकस्त दे दी। सपा को केवल 47 सीटें हासिल हुईं। जाहिर है अखिलेश यादव को अपना विद्रोही तेवर भारी पड़ा।
2019 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अखिलेश यादव सपा से दुश्मनी का भाव रखने वाली बसपा के साथ अचानक गठबंधन करने पहुंच गए। बीएसपी प्रमुख मायावती के घर जाकर उन्होंने बुआ - भतीजे का संबंध जोड़ दिया। लेकिन यह संबंध मतदाताओं को समझ नहीं आया और 80 लोकसभा क्षेत्रों में सपा को केवल 5 सीटें मिली। चुनाव परिणाम के कुछ ही दिन बाद अखिलेश ने यह बयान जारी कर दिया कि मायावती से गठबंधन एक भूल थी और उन्होंने संबंध फिर विच्छेद कर दिया। सुप्रीमो मायावती को भी पछतावा हुआ। जबकि पहले उन्होंने यहां तक कह दिया था कि सपा और बसपा का एक साथ आना मतलब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नींद उड़ा देना है।
फिर 2022 का विधान सभा चुनाव आया। अखिलेश यादव ने तुरंत चाचा शिवपाल यादव के साथ अपनी अदावत खत्म करने का फैसला किया। शिवपाल यादव की पार्टी सपा की गठबंधन सहयोगी बन गई। शिवपाल यादव फिर से चुनाव जीत भी गए, पर सपा यूपी जीतने में नाकाम रही और एक बार फिर शिवपाल को अखिलेश ने किनारे लगाना शुरू कर दिया। सपा विधायकों की बैठक में अखिलेश यादव ने अपने चाचा को नहीं बुलाया। अखिलेश यादव ने अपने छोटे भाई की बहू अपर्णा यादव को भी पार्टी से बाहर जाने पर मज़बूर कर दिया।
कांग्रेस के साथ एक बार फिर हेट और लव का खेल जारी है। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर 17 नवंबर को होने वाले चुनावों में सपा के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी है। जवाब में अखिलेश यादव ने कांग्रेस को यह संकेत दिया कि उनकी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही करेगी। ऐसा कहते हुए अखिलेश यादव आत्मविश्वास भी दिखा रहे थे। लेकिन कांग्रेस के सबसे बड़े नेता का संदेश आते ही उन्होंने सुर बदल दिया है। शायद वह लोकसभा चुनाव की बड़ी चुनौतियों को समझ रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications