चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को हुए 100 साल, वैश्विक राजनीति में बढ़ी चुनौतियां
बीजिंग, 01 जुलाई। साल 1921 में शुरु हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के गुरुवार को 100 साल पूरे हो रहे हैं और इस दिन वह देशभर में जश्न और धूमधाम से अपनी 100वीं सालगिरह मना रही है. 1 जुलाई के कई हफ्तों पहले से ही पार्टी नेतृत्व की सफलता का बखान करने वाले बैनर और होर्डिंग लगा दिए गए हैं. और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सोमवार को बीजिंग के नेशनल स्टेडियम में असाधारण परफॉर्मेंस भी दी. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है, यह भारत की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की आधी है. साल 2019 में पार्टी में करीब 9.2 करोड़ सदस्य थे. इसने चीन की सत्ता पर 1949 के गृह युद्ध के बाद कब्जा किया था, और तभी से यहां शासन करती आ रही है.
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पार्टी के विदेश संपर्क विभाग के उप प्रमुख गुओ येझोउ ने इस हफ्ते एक प्रेस कार्यक्रम के दौरान रिपोर्टर्स से कहा, "चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव, अपील और आकर्षण लगातार बढ़ा है, जिससे यह विश्व राजनीति की सबसे अग्रणी पंक्ति में आ गई है." चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन को युद्धों, अकाल और सामाजिक उठा-पटक वाली एक सदी में भी आगे ले जाने का काम किया है. पिछले 20 सालों में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लाखों गरीब, भूखे चीनी लोगों को भारी गरीबी से उबारा है. सामाजिक स्तर पर आए इस बदलाव ने चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में मदद की है.

हालांकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में पार्टी में सत्ता का केंद्रीकरण होने और इसकी विस्तारवादी विदेश नीति ने यह चिंता भी बढ़ा दी है कि चीन और ज्यादा अधिकनायकवाद की ओर बढ़ चला है. चीन में पार्टी और उसकी नीतियों की आलोचना ज्यादा देर नहीं ठहरती. दक्षिण चीन सागर में चीनी सैन्य विस्तारवाद की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हुई है. ऐसी ही प्रतिक्रिया उसकी हांगकांग में नागरिक स्वतंत्रता पर कार्रवाई और पश्चिमी शिनजियांग प्रांत में उइगुर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ बर्ताव पर भी आई है.
सत्ता के शिखर पर राष्ट्रपति शी
जाहिर सी बात है, जश्न के दौरान इस बातों का जिक्र नहीं किया जाएगा. बर्लिन स्थित मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइना स्टडीज (MERICS) की एक विश्लेषक वैलेरी टैन ने डीडब्ल्यू को बताया, "पार्टी अपनी शासन प्रणाली की सफलता और समय के हिसाब से ढलने वाले गुणों की झांकी पेश करेगी." उन्होंने कहा, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए 100वीं सालगिरह का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. यह शी जिनपिंग के लिए बड़ा राजनीतिक महत्व भी रखती है. हफ्ते भर से पार्टी के अधिकारी शी की तारीफें करते आ रहे हैं, जिन्हें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्थापक माओत्से तुंग के बाद चीन का सबसे शक्तिशाली नेता माना जाता है.

वैलेरी टैन ने कहा, "चीनी पार्टी दुनिया को यह दिखाने के लिए उत्साहित है कि इसकी बनाई व्यवस्था न सिर्फ आर्थिक संकटों, प्राकृतिक आपदाओं, राजनीतिक घोटालों और वैश्विक महामारी पर काबू करने में सफल रही है, बल्कि यह अटूट भी रही है और पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आई है. अब यह 2049 तक महाशक्ति के दर्जे को पाने के उस लक्ष्य की ओर बढ़ रही है, जिसे शी जिनपिंग ने तय किया है." वैलेरी टैन मानती हैं कि 100वीं सालगिरह के दौरान पार्टी इसी छवि को पेश करना चाहती है.
चीनी इतिहास में भी कांट-छांट कर रही पार्टी
फरवरी में शी जिनपिंग ने पार्टी के 100 साल होने पर पार्टी के आधिकारिक इतिहास का एक संशोधित संस्करण 'चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का एक संक्षिप्त इतिहास' जारी किया था. यह 500 से अधिक पृष्ठों का है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक इतिहास के इस नए संस्करण में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान एक दशक तक चली खलबली को तीन पन्नों में समेट दिया गया है और माओ के अत्याचारों का जिक्र भी कम कर दिया गया है. पार्टी की 1981 में क्रांति की निंदा को भी नरम स्वर दे दिया गया है.

द ग्रेट लीप फॉरवर्ड सेक्शन को भी छोटा कर दिया गया है और इससे सिर्फ 'आर्थिक कठिनाइयां' होने का जिक्र किया गया है. इसकी तुलना में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 90वीं सालगिरह की किताब में अब भी 'अकाल' और 'अकाल में हुई मौतों' जैसे शब्दों का प्रयोग है. महान चीनी अकाल के दौरान माओ की आर्थिक नीतियों के चलते लाखों लोग मारे गए थे. इसका उल्लेख नई किताब में सिर्फ एक बार 'प्राकृतिक आपदा' के तौर पर किया गया है.
पार्टी के बदले शी जिनपिंग पर जोर
कोलोन विश्वविद्यालय में चीनी विशेषज्ञ फेलिक्स वेमहॉयर कहते हैं, "पार्टी और इसकी विरासत को 'वैधता' दिलाने की कोशिशों में इतिहासलेखन की परंपरागत रूप से एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है. माओ ने भी 'विचारों में एकजुटता' लाने के लिए पार्टी के इतिहासलेखन का इस्तेमाल किया था. वेमहॉयर ने डीडब्ल्यू से कहा, "1989 के तियानमेन स्क्वायर के विरोध को "बहुत संक्षेप में समेट दिया गया है" और इसे समाजवादी व्यवस्था को खत्म करने की मांग करने वाला एक क्रांतिकारी विद्रोह बताया गया है और कहा गया है इसे "सरकार द्वारा दबाया ही जाना था."

वेमहॉयर की राय में, "इस तरह लिखने का उद्देश्य यह संदेश देना है कि "भले ही संकट रहे हों ... पार्टी हमेशा खुद को फिर से खड़ा करने और चीन को समृद्धि की राह पर ले जाने में सक्षम रही है." वेमहॉयर कहते हैं, "यह चौंकाने वाली बात है कि शी जिनपिंग पर लिखा हिस्सा पूरी किताब का लगभग एक-चौथाई है, जबकि पार्टी के 100 साल के इतिहास के मुकाबले देखें तो वे केवल आठ साल के लिए सत्ता में रहे हैं." संशोधित किताब विश्वविद्यालय की परीक्षाओं का हिस्सा भी बनेगी. ऐसे में किताब पर आधारित सवालों और उत्तरों को याद करने के लिए लाखों चीनी लोगों से अपेक्षा की जाएगी.
चीन की वैश्विक छवि संवारने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषक टैन का मानना है कि शी जिनपिंग का मुख्य मकसद इतिहास में संशोधन कर दुनिया के सामने चीन को ऐसे पेश करना है कि चीन की कहानी ठीक से कही जाए. हाल में एक पार्टी सम्मेलन में शी जिनपिंग ने "चीन की विश्वसनीय, प्यारी और सम्मानजनक छवि" बनाने के प्रयासों पर जोर दिया. टैन कहती हैं, "लक्ष्य है चीन की नकारात्मक व्याख्या को प्रतिकार करना, खासकर जो पश्चिम की ओर से की जा रही है."
ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब चीन ने मेड इन चाइना 2025 प्लान में महत्वपूर्ण तकनीकी सेक्टर में आत्मनिर्भरता हासिल करने का फौरी लक्ष्य रखा है. टैन कहती हैं, "इसका समर्थन करने के प्रयास बढ़ाए जाएंगे, चाहे वह ट्विटर पर अभियानों के जरिए हो, वायरल डिजीटल प्रोपेगैंडा हो या चीन के प्रति दोस्ताना रवैया रखने वाले पत्रकारों का समर्थन हो." शी ने 2021 तक चीन को भरी गरीबी खत्म कर खुशहाल देश बनाने की घोषणा की है.
कब तक रहेंगे शी सत्ता में

अब सब यही सवाल पूछ रहे हैं कि 2012 में सत्ता पर काबिज शी जिनपिंग कब तक सत्ता में रहेंगे. उन्होंने अपने शासन की समय सीमा को खत्म कर दिया है और अभी तक कोई उत्तराधिकारी भी नहीं चुना है. 2022 में कम्युनिस्ट पार्टी के पॉलितब्यूरो की मौजूदा स्थायी समिति के इस्तीफा देने और नए नेताओं का चुनाव करने की संभावना है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या अगले साल होने वाले पार्टी कांग्रेस में शी पद छोड़ेंगे, उत्तराधिकारी की घोषणा करेंगे या पार्टी चेयरमैन वाले माओ के टाइटिल को फिर से ले आएंगे.
राजनीतिक विश्लेषक टैन कहती हैं, "अगला साल ये देखने के लिए महत्वपूर्ण होगा कि चीन में नेतृत्व परिवर्तन क्या रूप लेता है." अभी बहुत कुछ साफ नहीं है. ये भी नहीं कि शी जिनपिंग सत्ता में बने रहेंगे या रिटायर कर जाएंगे.
रिपोर्ट: सू जी ब्रुनरसुम
Source: DW
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