इंसान को इतना मीट खाने की क्या जरूरत है?

नई दिल्ली, 12 मई। प्रागैतिहासिक काल से ही इंसान जानवरों का मांस खाता आया है. समय के साथ इसकी खपत बढ़ती ही गई है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार बीते 50 सालों में ही इंसान ने मांस का वैश्विक उत्पादन चार गुना बढ़ा कर सालाना करीब 35 करोड़ टन कर लिया है. आगे भी यह ट्रेंड कम होता नहीं दिख रहा है. हालिया अनुमान दिखाते हैं कि 2050 तक तो उत्पादन 45.5 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है.
खाने के स्रोतों की कमी
वैज्ञानिकों ने बहुत लंबे समय से चिंता जताई है कि औद्योगिक स्तर पर पैदा होने वाला मीट खाने का एक "अयोग्य" स्रोत है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके उत्पादन में बाकी खाने की चीजों के मुकाबले कहीं ज्यादा ऊर्जा, पानी और जमीन लगती है.
अनाज की खेती से तुलना करें तो बीफ के उत्पादन में उससे छह गुना ज्यादा ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं. प्रोटीन के ही पौधों वाले स्रोत मटर के मुकाबले बीफ में 36 गुना ज्यादा जमीन लगती है. ऐसे कई उदाहरण हैं. कई अध्ययनों ने साबित किया है कि मीट और डेयरी उत्पाद नहीं खाना पर्यावरण पर बोझ को घटाने का हमारे पास सबसे प्रभावी उपाय है. अगर मीट और डेयरी की खपत बंद हो जाए तो पूरी दुनिया में खेती की जमीन का इलाका 75 फीसदी कम हो सकता है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अनुसार, मीट खाने के कारण हम दुनिया की करीब 60 फीसदी जैवविविधता को खोते जा रहे हैं.
क्या सोच है मीट खाने के पीछे
कितना भी जान-सुन लें, लोग मीट खाना नहीं छोड़ते. जर्मनी की ट्रियर यूनिवर्सिटी में सोशल साइकोलॉजिस्ट बेन्जामिन बटलर इसका कारण आदत, संस्कृति और जरूरत को बताते हैं. वह कहते हैं कि जब हम पहले से कुछ खाते आए हों तो कभी कोई सवाल ही नहीं उठता कि इसे क्यों खाना है. वह बताते हैं, "कई लोगों को इसका स्वाद अच्छा लगता है. लोग किस तरह का मीट खाते हैं कई परंपराओं में इससे उनकी पहचान जुड़ी होती है."
एक और बात है कि हम जो खा रहे होते हैं वो हमें जीते जागते जानवर की याद नहीं दिलाता और ना ही उस कष्ट की जो उसने हमारी प्लेट तक पहुंचने में झेला है. वहीं, अगर किसी शाकाहारी या वीगन व्यक्ति से बातचीत में यह विषय निकल आए तो यही कह कर निकल जाते हैं कि इंसान ने तो हमेशा से मीट खाया है.

रिसर्च दिखाती है कि मीट खाने को सामान्य और प्राकृतिक बताने का तर्क अकसर पुरुष देते हैं. बटलर बताते हैं, "खाने में ये ट्रेंड दिखता है. बहुत कम पुरुष और बहुत ज्यादा युवा महिलाएं वेजिटेरियन बन रहे हैं. इसका कारण यही है कि कहीं ना कहीं मीट खाने के साथ आज भी ये पौरुष वाली धारणा जुड़ी है कि आदमी मीट खाते हैं. यह विचार उस समय से चला आ रहा है जब शक्तिशाली पुरुष शिकार किया करते थे और मीट खाने के साथ कई सारी विकासवादी भ्रांतियां जुड़ी थीं."
अमेरिका के स्मिथसोनियन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में पेलियोएंथ्रोपोलॉजिस्ट ब्रियाना पॉबिनर और इस स्टडी की सहलेखिका खुद भी नतीजों पर हैरानी जताती हैं. वह कहती हैं, "मैं भी उन लोगों में से थी जो लंबे समय से कहते आए थे कि होमो इरेक्टस का विकास इसी लिए हुआ क्योंकि मीट खाना बढ़ गया था. मैं विकास के सिद्धांतों पर फिर से सोचने को मजबूर हो गई."
पौधों पर आधारित भोजन का विकास पर कैसा असर?
रिसर्चर पॉबिनर बताती हैं कि इंसान के दिमाग के बड़े होने में मीट खाने का उतना हाथ नहीं है जितना माना जाता था. वह बताती हैं, "मस्तिष्क बड़ा जरूर हुआ लेकिन उसी अनुपात में जिसमें पूरा शरीर बड़ा हुआ. हां करीब दस लाख साल पहले ऐसा जरूर हुआ."
इसके सबूत मिले हैं कि दस लाख साल पहले के उसी काल में आदि मानव ने अपना खाना पका कर खाना शुरु किया, जब उसका मस्तिष्क बड़ा हो रहा था. असल में खाने की चीजों को गर्म करने से उसमें ऐसे पोषक तत्व निकलते हैं और पाचन की प्रक्रिया तेज होती है. इसका कारण खाने का मुलायम और चबाने में आसान होना है.

पॉबिनर का मानना है कि मानव के विकास का श्रेय एक खानपान में स्वस्थ मिश्रण को जाता है. वह कहती हैं, "अब कहा जा सकता है कि कोई एक तरह का खाना नहीं बल्कि कई तरह की चीजें खाने की संभावना के कारण ऐतिहासिक रूप से इंसान का इतना विकास हुआ."
इस समय विश्व का तीन-चौथाई भोजन केवल 12 तरह के पौधों और जानवरों की पांच किस्मों से आता है. जब भी इंसान किसी एक तरह के खाने पर सबसे ज्यादा निर्भर रहने लगता है तो कई तरह की सेहत से जुड़ी परेशानियां पैदा होती हैं. अमेरिका में आंतरिक चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉक्टर मिल्टन मिल्स बताते हैं, "ऐसी अनगिनत स्टडीज हैं जो दिखाती हैं कि जब इंसान जानवरों वाला प्रोटीन खाता है तो उससे कई तरह के कैंसर होने का खतरा जुड़ा होता है."
कई लोगों का तर्क होता है कि शाकाहारी और वीगन लोगों को अपने खाने से पर्याप्त प्रोटीन और पोषण नहीं मिलता. लेकिन डॉक्टर मिल्स ऐसा बिल्कुल नहीं मानते हैं. पौधों पर आधारित भोजन की वकालत करने वाले मिल्स कहते हैं, "ये सब थ्योरीज करीब 50,60 साल पहले शुरु हुईं थीं. उस समय लोगों को किसी तरह से ऐसा लगने लगा था कि मीट में पौधों के मुकाबले ज्यादा पोषण मिलता है. लेकिन यह सच नहीं है."

तो अब क्या किया जाए?
अगर मीट की मांग ऐसे ही बनी रहती है तो 2050 आते आते 10 अरब तक पहुंच चुकी दुनिया की आबादी अपना पेट नहीं भर पाएगी. इससे बचने के लिए मीट की खपत कम करनी ही होगी लेकिन ऐसे कैसे किया जा सकता है. मनोविज्ञानी बटलर बताते हैं कि ऊपर से शुरु करके धीरे धीरे इसे नीचे तक लागू करवाना होगा. उनका मानना है कि "मीट को महंगा कर देना होगा क्योंकि असल में जानवरों की देखभाल करने और जलवायु पर उसके असर को देखें तो सही भी है. साथ ही, मीट के विकल्पों को सस्ता बनाने पर भी काम करना होगा."
बटलर का मानना है कि सबसे जरूरी बदलाव लोगों को ये समझाने से आएगा कि पौधों पर आधारित भोजन असल में अच्छा है. एक बार लोगों को स्वाद आने लगेगा, सेहत पर उसका असर दिखने लगेगा, तो जलवायु परिवर्तन और जीव कल्याण के मामले में बदलाव अपने आप आएगा."
मीट प्रेमी देश जर्मनी में भी ऐसे बदलाव दिखने लगे हैं. 2021 के आंकड़ों पता चलता है बाजार में मीट के विकल्पों के आने से पौधों पर आधारित भोजन का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 17 फीसदी बढ़ गया है.
Source: DW
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