पश्चिम बंगाल में चाय की चुनावी चुस्की से क्या जीत पाएंगे मोदी?

पश्चिम बंगाल में चाय की चुनावी चुस्की से क्या जीत पाएंगे मोदी?

कोलकाता, 14 अप्रैल। नरेन्द्र मोदी पश्चिम बंगाल की चुनावी केतली में दार्जिलिंग लीफ से कड़क चाय बनाने की तैयारी में हैं। वे पुराने चाय वाले जो ठहरे। नरेन्द्र मोदी ने 10 अप्रैल को सिलगुड़ी की चुनावी रैली में कहा थी कि अगर पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनती है तो '3टी’ यानी टी (चाय), टूरिज्म (पर्यटन) और टिम्बर (लकड़ी) से विकास का रास्ता तैयार किया जाएगा। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग और उत्तर दिनाजपुर जिले में करीब 350 चाय बागानों में चार लाख से अधिक मजदूर काम करते हैं। लोकसभा चुनाव में चाय बागान मजदूरों ने भाजपा को समर्थन दिया था। इनकी न्यूनतम मजदूरी का सवाल सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है। अभी पश्चिम बंगाल में इन मजदूरों को रोजाना 202 रुपये मिलते हैं। भाजपा के नेताओं ने कहा है कि अगर उन्हें मौका मिला तो रोजाना की न्यूनतम मजदूरी 350 रुपये तय की जाएगी। 17 अप्रैल को जलपाईगुड़ी की 7, दार्जिलिंग जिले की 5, कलिम्पोंग की एक सीट पर चुनाव होना है। उत्तर दिनाजपुर की 9 सीटों पर 22 अप्रैल को चुनाव है। इन 19 सीटों पर चाय बागान मजदूरों की स्थिति निर्णायक है। वे जिस तरफ झुके, उसका पलड़ा भारी।

चाय तो महंगी लेकिन मजदूरी सस्ता

चाय तो महंगी लेकिन मजदूरी सस्ता

दार्जिलिंग की चाय को दुनिया में सबसे अच्छा माना जाता है। यहां की मिट्टी और हिमालय की उत्कृष्ट चाय की पत्तियों का खास बना देती है। यूरोप में यहां की चाय पत्ति की बहुत मांग है। दार्जिलिंग में एक ऐसी चाय का उत्पादन होता है जो विदेश में दो लाख रुपये प्रति किलो बिकती है। भारत में यह खास चाय 94 हजार रुपये प्रति किलो बिकती है। देश में चाय के शौकिनों की कोई कमी नहीं। इतनी महंगी चाय पत्ति भी खूब बिकती है। दार्जिलिंग की चाय अधिकतर निर्यात की जाती है। पश्चिम बंगाल देश का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक प्रदेश है। इस प्रदेश में चाय के व्यापार से बागान मालिकों या कंपनियों को तो बहुत मुनाफा होता है लेकिन मजदूरों की हालत बद से बदतर होती चली गयी है। भाजपा ने उत्तर बंगाल में 132 चाय बागान मजदूरों की भूख से मौत को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है। केरल में चाय बागान मजदूरों को प्रति दिन 310 रुपये मिलते हैं। जब कि पश्चिम बंगाल में यह मजदूरी 202 रुपये है। पहले तो 176 रुपये रोजना ही मिलता था। लेकिन बाद में ममता बनर्जी सरकार ने मामूली अंतरिम बढोतरी कर इसे 202 रुपये कर दिया। राज्य सरकार ने 2014 से न्यूनतम मजदूरी का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया। इसके लिए एक कमेटी बनी थी जिसने 2018 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। लेकिन राज्य सरकार इस रिपोर्ट पर मौन साधे रही। मजदूरों का आरोप है कि राज्य सरकार वाजिब मजदूरी देने में धांधली कर रही है। अब नरेन्द्र मोदी ने चाय बागान मजदूरों को भाजपा के पाले में लाने के लिए 3टी का नया फारमूला पेश किया है।

चाय बागान मजदूरों की समस्याएं

चाय बागान मजदूरों की समस्याएं

चाय बागान प्लांटेशन लेबर एक्ट 1951 के तहत मजदूरों के रहने, खाने-पीने, शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेवारी बागान मालिकों की है। इसलिए यहां के मजदूरों को अन्य क्षेत्र की तुलना में बहुत कम नगद मजदूरी दी जाती है। मजदूरी का अधिकांश हिस्सा कंपनिया राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा पर खर्च होना दिखाती हैं। ममता सरकार और मजदूरों के एक समझौते के तहत 289 रुपये रोजाना मजदूरी तय हुई थी। 132 रुपये नगद और 157 राशन, स्वास्थ्य और जलावन आदि की सुविधा पर खर्च किया जाना था। लेकिन चाय बागान मजदूरों को राशन, मेडिकल की मिलने वाली सुविधा खराब होते-होते बंद हो गयी। अब पीडीएस के जरिये मजदूर परिवारों को एक महीने में दो रुपये की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है। एक मजदूर को रोजाना कम से कम 27 किलो चाय की पत्तियां तोड़नी होती हैं। अगर टरगेट कम हुआ तो उनका पैसा काट लिया जाता है। बहुत कठिन मेहनत के बाद ही मजदूर 27 किलो पत्तियां तोड़ पाते हैं। कम मजदूरी, बेरोजगारी (बागान के बंद होने से), कानूनी मुकदमों और पिछले साल के लॉक डाउन से उनकी कमर टूट चुकी है। वे भुखमरी का सामना कर रहे हैं। पिछले कुछ साल के दौरान पश्चिम बंगाल में करीब 132 चाय बागान मजदूरों की भूख से मरने की बात कही गयी है। दार्जिलिंग के भाजपा सांसद राजू विष्ट ने लोकसभा में यह मामला उठाया भी था।

चाय बागान मजदूर किसकी तरफ ?

चाय बागान मजदूर किसकी तरफ ?

2019 में उत्तर बंगाल ( जहां चाय बागान हैं) की आठ लोकसभा सीटों में से सात पर भाजपा को जीत मिली थी। एक पर कांग्रेस जीती थी। यानी इस इलाके में तृणमूल का सफाया हो गया था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटों में से 34 पर बढ़त मिली थी। तृणमूल 12 सीटों पर आगे रही थी। अब नरेन्द्र मोदी 2021 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भी चाय बागान मजदूरों पर दांव खेलना चाहते हैं। लेकिन चाय बागान मजदूर राजनीतिक छलावों से बेहद दुखी हैं। उनका कहना है कि जब चुनाव आया है तो राजनीतिक दल तीन-सौ चार सौ रोज की मजदूरी देने का सपना दिखा रहे हैं। घर बना देने की बात कह रहे हैं। लेकिन जब चुनाव खत्म हो जाएगा तो कोई देखने भी नहीं आएगा। कई चुनावों से यही देख रहे हैं। अभी तो रोज का 202 रुपया ही मिलता है। सुबह सात बजे बगान आते हैं और चार बजे घर जाते हैं। रहने के लिए जो घर है वह बहुत खराब हालत में है। मरम्मत भी नहीं होती। शौचालय और नहाने तक की सुविधा नहीं है। इतना पैसा नहीं होता कि बच्चों के पढ़ा सकें। छोटे-छोटे बच्चे हैं। जैसे-तैसै कट रही है जिंदगी। किस पर भरोसा करें समझ में नहीं आता। अब देखना है नरेन्द्र मोदी इन चाय बागान मजदूरों का भरोसा जीत पाते हैं या नहीं।

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