Bengal Result: व्हीलचेयर पर बैठकर BJP को मात देने वाली ममता को 2024 में मिलेगी विपक्ष की ड्राइविंग सीट?
कोलकाता, मई 2। पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया है। ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाकर ये साबित कर दिया है कि बंगाल की धरती पर उनसे पार पाना अभी किसी के बस की बात नहीं है। ममता बनर्जी के चुनावी कौशल और जनता पर पकड़ का ही नतीजा है कि उन्होंने बीजेपी को बंगाल का किला भेदने नहीं किया। विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों की फौज उतारी लेकिन टूटी टांग और व्हीलचेयर पर बैठी ममता बनर्जी को मात देना तो दूर बीजेपी उनके आस-पास भी नहीं फटक पाई।

ममता बनर्जी ने दिखाई फाइटर वाली हिम्मत
चुनाव अभियान की शुरुआत में एक कथित हमले में ममता बनर्जी के पैर में चोट लगी थी जिसके बाद उनके पैर में प्लास्टर लगाना पड़ा था। ममता बनर्जी ने पूरा चुनाव प्रचार व्हीलचेयर पर बैठकर किया लेकिन टीएमसी नेता ने अपनी फाइटर वाली छवि को कभी कमजोर नहीं होने दिया था जिसका नतीजा रहा कि वो भले पूरे प्रचार में खड़ी नहीं हुई लेकिन बंगाल का वोटर उनकी इस लड़ाई में साथ खड़ा रहा।
बंगाल के चुनाव नतीजों ने ये साबित किया है कि मां, माटी, मानुष के नारे के साथ साथ सत्ता में आने और 10 साल सत्ता में रहने के बाद भी बंगाल की दीदी के लिए जनता के मन में प्यार कम नहीं हुआ है। यही वजह है कि 2 मई को चुनाव परिणाम में ममता बनर्जी की पार्टी 200 सीट का आंकड़ा पार कर रही है।
जब चुनाव के ऐलान से कुछ समय पहले ही ममता बनर्जी के विश्वस्त सहयोगी सुवेंदु अधिकारी ने उनका साथ छोड़ा तो ममता बनर्जी ने इस लड़ाई को निजी बना लिया। उन्होंने अपनी पारंपरिक भबानीपुर सीट छोड़कर अधिकारी के खिलाफ नंदीग्राम से लड़ने का ऐलान किया। यही नहीं वोटरों में कोई भ्रम न रहे इसके लिए टीएमसी नेता ने सिर्फ नंदीग्राम से ही पर्चा भरा। ममता बनर्जी को नंदीग्राम सीट पर अधिकारी ने कड़ी टक्कर दी लेकिन आखिरकार उन्हें बीजेपी के अधिकारी ने शिकस्त दे दी।

कांग्रेस के सिपाही के रूप में की शुरुआत
नंदीग्राम सीट से भले ही ममता बनर्जी आज चुनाव हार गईं लेकिन इस क्षेत्र ने ही उन्हें बंगाल की राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बनने का मौका दिया। कभी कांग्रेस की सिपाही रहीं ममता बनर्जी स्कूल के दिनों से ही राजनीति में जुड़ी हुई थीं। 70 के दशक में जब वे कॉलेज में थी तभी उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। वे पहली बार राष्ट्रीय पटल पर चर्चा में आईं जब उन्होंने जादवपुर से वरिष्ठ कम्युनिष्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा चुनाव में शिकस्त दी। ममता बनर्जी उस समय देश की सबसे युवा सांसद बनीं।
1991 में उन्होंने कोलकाता से लोकसभा में एंट्री ली और नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में केंद्रीय मंत्री बनीं। लेकिन दो साल बाद मंत्रीमण्डल से छुट्टी हो गई। एक बार फिर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर फोकस किया लेकिन प्रदेश में पार्टी नेताओं से उनकी बन नहीं रही थी।
ममता का बगावती तेवर पार्टी नेताओं को पसंद नहीं आ रहा था। बात बिगड़ती गई और 1996-97 आते-आते स्थिति खराब हो चुकी थी। ममता बनर्जी ने बंगाल कांग्रेस पर वाममोर्चे की पिछलग्गू होने का आरोप लगाया। पार्टी में विरोध के बाद 1997 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
कांग्रेस छोड़ने के बाद 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी बनाने का ऐलान किया जिसका नाम था आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस। पहली बार तृणमूल कांग्रेस ने 1998 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा लिया और 8 सांसद जीते। 1999 में अटल बिहारी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का हिस्सा बनीं और महत्वपूर्ण रेल मंत्रालय मिला। रेल मंत्रालय में उनका सफर उतार चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने एक बार इस्तीफा भी दिया लेकिन फिर खुद ही इस्तीफा वापस ले लिया।

नंदीग्राम आंदोलन ने बना दिया 'दीदी'
ममता बनर्जी का जीवन में बड़ा मोड़ लेकर आया 2007 का नंदीग्राम आंदोलन। बुद्धदेब भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चे की सरकार ने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने का फैसला किया था जिसके लिए जमीनों का अधिग्रहण किया जाना था। इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया। बाद में ममता बनर्जी ने आंदोलन का नेतृत्व किया और वाम मोर्चे की सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया। ये ममता के जीवन की बड़ी राजनीतिक जीत थी जो किसी चुनाव जीतने से भी बड़ी थी।
इसका असर दिखा 2011 के विधानसभा चुनाव में जब ममता बनर्जी ने 35 साल पुरानी वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका और राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 5 साल बाद जब दोबारा चुनाव हुए तो ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने पिछली बार से भी अधिक सीटें हासिल कर सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा। 2021 में एक बार फिर ममता ने अपना जलवा बरकरार रखा है और बीजेपी को धूल चटाते हुए 200 से ज्यादा सीटें हासिल कर जीत की हैट्रिक लगाई है।

तो ममता बनेंगी 2024 में विपक्ष का चेहरा?
ममता बनर्जी की इस जीत के साथ ही 2024 को लेकर चर्चा शुरू हो गई है जिसमें ममता बनर्जी को लोकसभा चुनाव में विपक्ष का चेहरा बनाने की बात होने लगी है। नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिखरे विपक्ष को ममता बनर्जी की जीत ने एक उम्मीद दिखाई है। खास तौर पर ममता ने जिस तेवर के साथ बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का मुकाबला किया उससे विपक्ष को जरूर उम्मीद जगी होगी।
कभी बीजेपी के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने बंगाल चुनाव के दौरान टीएमसी का दामन थामा था। सिन्हा ने कहा है कि पश्चिम बंगाल की जीत का असर 2022 में यूपी के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों पर होगा। यशवंत सिन्हा ने मोदी और शाह के इस्तीफे की भी मांग कर डाली।
ममता बनर्जी ने चुनाव के दौरान ही गैर एनडीए और बीजेपी विरोधी दलों के नेताओं को एक चिठ्ठी लिखी थी जिसमें सभी पार्टियों से आह्वान किया था कि अब वक्त आ गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को हराने के लिए सभी विरोधी दल एकजुट हों।
ममता बनर्जी की जीत के बाद एक बार फिर विपक्षी दलों में हलचल तेज हुई है लेकिन अभी यह देखना होगा कि क्या ये दल ममता बनर्जी को अपना नेता स्वीकार कर पाएंगे। साथ ही यह भी दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इसमें खुद को कहां रखेगी?
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