Kolkata Doctor Case: क्या आरोपी संजॉय रॉय के Polygraph Test में लगेगा अंड़गा? CBI के सामने है ये संकट
Kolkata Doctor Case news: आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुए रेप और हत्याकांड की जांच में सीबीआई के सामने एक चुनौती खड़ी हुई है। जानकारी के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी संजॉय रॉय की पैरवी करने के लिए कोई वकील तैयार नहीं हो रहा है।
न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 31 वर्षीय ट्रेनी डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार आरोपी संजॉय रॉय का केस लेने के लिए कोई वकील तैयार नहीं है। इस जघन्य वारदात में अभी तक संजॉय एकमात्र आरोपी है, जो सीबीआई के शिकंजे में है।

पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए सहमति लेने में अड़चन!
रिपोर्ट के अनुसार आरोपी के खिलाफ वकीलों में इतना गुस्सा है कि नैतिक आधार पर कोई उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। इससे सीबीआई को जांच की गति बढ़ाने में दिक्कतें आ सकती हैं। मुद्दा ये है कि सीबीआई को आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट करवाने के लिए उसकी सहमति लेना जरूरी है।
आरोपी को क्यों चाहिए वकील?
भारत में कानूनी स्थिति ये है कि बिना संजॉय रॉय की सहमति के उसका पॉलीग्राफ टेस्ट या लाय-डिटेक्टर टेस्ट नहीं हो सकता। इसमें उसकी सहमति रहना अनिवार्य है।
अभी एक वकील की आवश्यकता इसलिए है कि वह उसे पॉलीग्राफ टेस्ट के बारे में कानूनी सलाह दे सके। इसका क्या प्रभाव हो सकता है, उसकी जानकारी से उसे अवगत करवा सके, ताकि संजॉय सबकुछ समझते हुए इस टेस्ट के लिए सहमति दे। उसकी सहमति तब ही कानूनी रूप से मान्य होगी, जब उसे इस टेस्ट के बारे में और उसके संभावित परिणाम के बारे में पूरी जानकारी हो।
जर्नल फॉर लॉ स्टूडेंट्स एंड रिसर्चर्स के मुताबिक, किसी व्यवक्ति को टेस्ट के लिए हामी भरने के दौरान 'टेस्ट के बारे में और इसके कानूनी असर की जानकारी होनी चाहिए।'
क्या आरोपी पॉलीग्राफ टेस्ट से इनकार कर सकता है?
कानूनी प्रावधान के मुताबिक आरोपी पॉलीग्राफ टेस्ट से पूरी तरह से मना कर सकता है। उससे जबरन सहमति नहीं ली जा सकती। भारतीय कानून के मुताबिक किसी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना इस तरह के टेस्ट के लिए बाध्य करना उसके अधिकारों का हनन होगा तथा इसके परिणाम अदालत में नामंजूर किए जा सकते हैं।
लीगल एड अटॉर्नी करेगा आरोपी की सहायता
इसी रिपोर्ट के मुताबिक रॉय को वकील नहीं मिल पा रहा है, इसलिए उसके लिए एक लीगल एड अटॉर्नी को नियुक्त किया गया है, जो उसकी पैरवी कर सके।
अगर कोई आरोपी प्राइवेट वकील नहीं रख सकता तो अदालत लीगल एड की नियुक्ति करती है। ऐसे वकील या तो मुफ्त में अपनी सेवाएं दे सकते हैं या फिर अपनी फीस कम सकते हैं। आमतौर पर यह फीस सरकार या किसी एनजीओ की ओर से उपलब्ध करवाई जाती है।












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