पश्चिम बंगाल में कैसे बचेगी बीजेपी, नेताओं में सिर फुटव्वल, प्रदेश नेतृत्व पर उठ रहे हैं सवाल ?
कोलकाता, 22 अप्रैल: पश्चिम बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतकर बीजेपी ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। इसके चलते पिछले साल विधानसभा चुनाव में पार्टी लगभग मान कर बैठी थी कि ममता बनर्जी के शासन (बीजेपी के शब्दों में कुशासन) को उखाड़ फेंकेगी। लेकिन, टीएमसी ने अपना प्रदर्शन ना केवल और बेहतर कर लिया, बल्कि भाजपा से तृणमूल में वापस लौटने वाले नेताओं की लाइन लग गई। हाल में दो उपचुनाव हुए हैं और भाजपा की तो लगभग मिट्टी ही पलीद हो चुकी है। ऐसे में पार्टी की आंतरिक गुटबाजी सतह पर आ चुकी है। प्रदेश नेतृत्व पर अनुभवहीनता के आरोप लग रहे हैं। दिल्ली को संदेश दिया जा रहा है कि संभाल लो सरकार, नहीं तो केरल जैसी स्थिति के लिए हो जाओ तैयार।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के अंदर घमासान
पश्चिम बंगाल में पिछले साल विधानसभा चुनावों में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी का सत्ता में आने का सपना चकनाचूर हुआ था, उससे पार्टी नेताओं का सिर्फ हौसला कमजोर पड़ा था। लेकिन, हाल में बालीगंज विधानसभा और आसनसोल लोकसभा उपचुनाव में जो शिकस्त मिली है, उससे तो लगता है कि नेताओं का हौसला पूरी तरह से टूटता जा रहा है। खुद को अनुशासित पार्टी बताने वाले दल में अब सीधे प्रदेश नेतृत्व की क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व तक नेता दो टूक अपनी बात पहुंचा रहे हैं कि यदि जल्दी नहीं संभाला तो केरल से भी बुरा हाल होगा। भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के लिए यह चिंता की बात जरूर है। क्योंकि, सवाल है कि ऐसे आधे-अधूरे मन से पार्टी टीएमसी और ममता बनर्जी का बंगाल में मुकाबला कैसे कर पाएगी।

दिलीप घोष ने भी प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ खोला मोर्चा
पार्टी सांसद सौमित्र खान और राष्ट्रीय सचिव अनुपम हाजरा के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष ने भी खुलकर प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठा दिए हैं और उनकी यह कहकर आलोचना की है कि पुराने नेताओं के योगदान को नजरअंदाज किया जा रहा है। दिलीप घोष पार्टी के उन नेताओं में से हैं, जिन्होंने प्रदेश में संगठन को खड़ा किया है। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष सुकांता मजूमदार को न केवल 'अनुभवहीन', बल्कि पार्टी पॉलिटिक्स के लिए नया भी बताया है। उन्होंने कहा, 'सुकांता मजूमदार अकेले (पार्टी में नए) नहीं हैं। उन्होंने अभी-अभी चार्ज लिया है। उनके पास अनुभव नहीं है। समर्पित और योग्य नेताओं के दम पर पार्टी ने इतने वर्षों तक संघर्ष किया है। उन्होंने पार्टी को बढ़ाने में मदद की है, जमीन पर संघर्ष किया है, कई आंदोलनों की अगुवाई की है और लोगों के साथ खड़े रहे हैं और उनका भरोसा जीता है। ऐसे नेताओं को सम्मान और महत्त्व देना चाहिए। समय-समय पर नेतृत्व में बदलाव होते रहेंगे। लेकिन,किसी योग्य सदस्य को पार्टी से कोई नहीं हटा सकता। पार्टी उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकती। '

पुराने नेताओं को नजरअंदाज करने का आरोप
पिछले साल सितंबर में ही मजूमदार को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है और घोष को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। दिसंबर से पार्टी की नई प्रदेश समिति से कई नेताओं को हटाया गया है, जिनमें से कई पुराने भी हैं। उसके बाद से पुराने नेताओं ने मजूमदार और पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश के संगठन महामंत्री (महासचिव-संगठन) अमितवा चक्रबर्ती के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है। प्रदेश भाजपा नेता पहले से गुटबाजी में शामिल थे,और जब उपचुनाव में पार्टी की करारी हार हुई है, तो प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आ रही है।

'केरल से भी बुरी हो सकती है' स्थिति
सौमित्र खान और अनुपम हाजरा तो पहले से ही प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं। प्रदेश उपाध्यक्ष खान ने तो पश्चिम बंगाल में बीजेपी को बचाने के लिए गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तक से दखल देने की मांग कर चुके हैं। उन्होंने कहा था, अगर फौरन कदम नहीं उठाए गए, तो 'बहुत ज्यादा नुकसान' होगा और प्रदेश में पार्टी की स्थिति 'केरल से भी बुरी हो सकती है।' उन्होंने कहा था, 'हमें दिशानिर्देश चाहिए, क्योंकि हम दिशाहीन हो चुके हैं। कुछ चीजें ऐसी हैं, जो दिल्ली से ही हो सकता है। अगर हमें दिल्ली से समय पर मदद मिल जाए तो टीएमसी कुछ नहीं कर पाएगी। अगर हम समाधान तलाश लेते हैं तो टीएमसी हमें हतोत्साहित नहीं कर सकेगी।' उन्होंने साफ कहा था इस समय प्रदेश इकाई में सिर्फ सुवेंदु अधिकारी ही, 'अच्छे नेता हैं।' संगठन महामंत्री चक्रबर्ती के बारे में उन्होंने कहा था, 'उन्होंने बंगाल में राजनीति नहीं की है।'

संगठन में बदलाव से पहले लामबदीं ?
वैसे दिल्ली में भाजपा सूत्रों कहा कहना है कि यह सब आने वाले महीनों में संगठन में होने वाले बदलाव से पहले की तैयारी है। जुलाई से नवंबर-दिसंबर तक ब्लॉक स्तर से लेकर प्रांत स्तर तक संगठन में फेरबदल होने वाले हैं और फिर नए राष्ट्रीय अध्यक्ष भी मिलने वाले हैं। उसी से पहले प्रदेश के नेता अपनी-अपनी लामबंदी करने में जुटे हैं। लेकिन, सवाल है कि बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल सबसे चुनौतीपूर्ण राज्यों में से है। ऐसे में नेताओं के बीच इस तरह के सिर फुटव्वल का फायदा, आखिरकार विरोधियों को ही मिलेगा। खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए यह बहुत अहम है, जहां 2019 में 18 सीटें मिली थीं। उनमें से आसनसोल की तो बत्ती उपचुनाव में ही गुम हो चुकी है।












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