Manikarnika Ghat पर बन रहा लकड़ी आधारित आधुनिक ऊर्जा शवदाह संयंत्र, 120 किलो लकड़ी में होगी अंत्येष्टि

वाराणसी के Manikarnika Ghat पर लकड़ी आधारित आधुनिक ऊर्जा शवदाह संयंत्र बनाए जाने को लेकर तैयारी चल रही है, इससे शवदाह के लिए आने वाले लोगों को कफी राहत मिलेगी

मोक्ष नगरी काशी के Manikarnika Ghat पर अब लकड़ी आधारित आधुनिक ऊर्जा शवदाह संयंत्र लगाया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि फाउंडेशन का कार्य हो चुका है और बाढ़ का पानी घटने के बाद बचे हुए कार्यों को पूरा किया जाएगा। यह कार्य पूरा हो जाने के बाद वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर लकड़ी आधारित आधुनिक ऊर्जा शवदाह संयंत्र में अंत्येष्टि प्रारंभ हो जाएगी। कहा जा रहा है कि इसके प्रारंभ हो जाने के बाद जहां लोगों का समय बचेगा वहीं पारंपरिक तरीके से अंत्येष्टि होगी और पर्यावरण को भी कोई हानि नहीं पहुंचेगा।

सुविधाजनक होगा ऊर्जा शवदाह संयंत्र

सुविधाजनक होगा ऊर्जा शवदाह संयंत्र

वाराणसी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर वर्तमान समय में शवदाह किए जाने की परंपरा है। इन दो घाटों पर वाराणसी ही नहीं आसपास के अन्य जनपदों समेत दूसरे राज्यों के लोग भी अपने करीबी के निधन के बाद उनके शव लेकर शवदाह करने के लिए आते हैं। वाराणसी जिले में मणिकर्णिका घाट पर आज भी सर्वाधिक शवदाह होते हैं। शवदाह में लकड़ी का प्रयोग करने से पर्यावरण को हानि पहुंचती है, प्रदूषण भी फैलता है और शवदाह करने आए लोगों को काफी समय तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में अब लकड़ी आधारित ऊर्जा शवदाह संयंत्र स्थापित हो जाने के बाद इन सब पर काफी हद तक लगाम लगेगा।

अपनी इच्छानुसार ले सकेंगे यह सुविधा

अपनी इच्छानुसार ले सकेंगे यह सुविधा

अधिकारियों ने बताया कि लकड़ी आधारित आधुनिक शवदाह संयंत्र का निर्माण हो जाने के बाद केवल 120 किलो लकड़ी में एक शव की अंत्येष्टि हो जाएगी। इसके अलावा नई व्यवस्था के तहत मात्र एक से डेढ़ घंटे में शवदाह हो जाएगा। यह भी बता दे कि अब तक लकड़ी से शवदाह करने में 7 मन से अधिक लकड़ी लगती है और शवदाह में ढाई से तीन घंटे तक समय लगता है। संयंत्र बनाने वाली कंपनी मेसर्स ऊर्जा गैसीफायर प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर अजय कुमार ने बताया कि परंपराओं को देखते हुए लकड़ी आधारित आधुनिक ऊर्जा शवदाह संयंत्र को स्थापित किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति के ऊपर इसका दबाव नहीं डाला जाएगा, लोग अपनी इच्छा के अनुसार इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगे।

एक संयंत्र पर 54 लाख का खर्च

एक संयंत्र पर 54 लाख का खर्च

अधिकारियों का कहना है कि एक संयंत्र बनाने में कंपनी को लगभग 54 लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे। शवदाह संयंत्र बनाने के लिए उचित दूरी का ध्यान रखा जा रहा है, जिससे चिता सजाने के बाद परिक्रमा करने में भी मुश्किलों का सामना न करना पड़े। बताया गया कि 90 फीसदी से अधिक शव जल जाने के बाद कपाल क्रिया के लिए शव के बचे हुए हिस्से को बाहर निकाल लिया जाएगा और मृतक के स्‍वजनों द्वारा कपाल क्रिया भी पूरी की जा सकेगी। इसके अलावा यदि कहीं दूसरे स्थानों पर परिजन अस्थि विसर्जन करने के लिए राख लेना चाहेंगे तो अस्थि विसर्जन के लिए 2 से 3 फीसदी राख को भी बचा कर उन्‍हें दे दिया जाएगा।

संयंत्र को लेकर काशी के लोगों की राय

संयंत्र को लेकर काशी के लोगों की राय

इस बारे में काशी के लोगों से बात किया गया तो उनका इस पर मिलाजुला असर देखने को मिला। लोगों ने कहा कि इसके पहले हरिश्चंद्र घाट पर सीएनजी और इलेक्ट्रिक शवदाह बने हुए हैं, उनका इस्तेमाल बहुत कम लोग ही करते हैं। ऐसे में यह आधुनिक शवदाह संयंत्र कितना सफल होगा? यह वक्त बताएगा। वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह एक अच्छा प्रयास है जिससे पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचेगी और प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। लोगों ने यह भी कहा कि आधुनिक संयंत्र में लकड़ी से भी शवदाह होगा ऐसे में परंपरा को कायम रखा जा रहा है जिसके चलते लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

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