Varanasi News: क्यों नहीं थम रहा बिजली कर्मियों का विरोध, कर्मचारियों का कहना जनता के हित में नहीं निजीकरण

Varanasi news: बनारस में बिजली कर्मचारियों का आंदोलन लगातार सुर्खियों में है। सोमवार को 272वें दिन भी कर्मियों ने निजीकरण का विरोध करते हुए जोरदार प्रदर्शन किया। इस मौके पर कर्मचारियों ने सरकार की नीतियों को संदेहास्पद करार दिया और जवाब मांगते रहे।

संघर्ष समिति का कहना है कि यदि निजी कंपनियों को घाटे की भरपाई के लिए सरकार ही आर्थिक सहयोग देती रहेगी, तो फिर इस निजीकरण से जनता को क्या लाभ होगा? उनका आरोप है कि पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है।

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सभा में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि यह प्रक्रिया किसी सुधार की बजाय सरकारी संपत्तियों को कौड़ियों के भाव बेचने जैसा है। समिति का कहना है कि न तो इससे सेवा में सुधार होगा और न ही जनता को सस्ती बिजली मिलेगी।

दस्तावेजों पर भी उठाए सवाल

विद्युत मंत्रालय द्वारा सितंबर 2020 में जारी ड्राफ्ट बिडिंग डॉक्यूमेंट का हवाला देते हुए कर्मचारियों ने सवाल उठाए। उनके अनुसार, दस्तावेज की धारा 2.2 (बी) कहती है कि निजी कंपनी के मुनाफे में आने तक सरकार सब्सिडी देती रहेगी।

संघर्ष समिति ने सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है कि यह सब्सिडी कितने वर्षों तक जारी रहेगी। कर्मचारियों का कहना है कि यदि अरबों रुपए का बोझ सरकार उठाएगी, तो आखिर इसका लाभ जनता को कब तक मिलेगा?

निजी बिजली खरीद समझौते बने समस्या

कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि घाटे का सबसे बड़ा कारण निजी बिजली घरों से महंगे दामों पर बिजली खरीदना है। ऐसे अनुबंध भी हैं जिनके तहत बिजली खरीदी न जाने पर भी करोड़ों रुपये का फिक्स चार्ज देना पड़ता है।

उनका कहना है कि निजीकरण के बाद भी सरकार इन्हीं करारों का भार उठाएगी। ऐसे में सुधार के नाम पर निजी कंपनियों को फायदा और सरकारी खजाने पर बोझ डालना किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।

जमीन भी सवालों के घेरे में

समिति ने बताया कि 42 जिलों की महंगी जमीनें मात्र एक रुपये वार्षिक लीज पर निजी कंपनियों को दी जाएंगी। कर्मचारियों ने कहा कि वाराणसी, गोरखपुर, आगरा और कानपुर जैसी जगहों की जमीनें कौड़ियों के भाव देने का औचित्य क्या है?

उनका कहना है कि यह कदम रिफॉर्म के बजाय सरकारी संपत्तियों के हस्तांतरण जैसा है। अगर यही सब करना है तो वर्षों से सुधार कर रही सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में देने का तर्क बेमानी साबित होता है।

मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग

कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि वह इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करें। समिति का कहना है कि निजीकरण की यह पूरी कवायद अव्यवहारिक है और इसका असर सीधा जनता पर पड़ेगा।

सभा को संबोधित करने वालों में ई. राजेंद्र सिंह, जिउतलाल, नीरज बिंद, कृष्णा सिंह समेत कई पदाधिकारी शामिल रहे। सभी ने कहा कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक सरकार निजीकरण की प्रक्रिया को वापस नहीं लेती।

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