कोरोना काल में नहीं मिला काम तो शवों को कंधा देने को मजबूर हुए काशी के मजदूर, मिलते है 250 से 500 रुपए
कोरोना काल में नहीं मिला काम तो शवों को कंधा देने को मजबूर हुए काशी के मजदूर, मिलते है 250 से 500 रुपए
वाराणसी, अप्रैल 30: कोरोना वायरस संक्रमण के चलते रिश्ते भी बिखर रहे हैं। परिजन संक्रमण के डर से अपनों को भी कंधा देने से गुरेज कर रहे हैं। तो वहीं, यह विभीषिका वाराणसी के मजदूरों के लिए खतरा मोल लेकर दो पैसे कमाने की मजबूरी बन गई है। दरअसल, कोरोना काल में मजदूरों का काम नहीं मिल रहा है, जिसकी वजह वो शवों को कंधा देने के लिए मजबूर है। जिन्हें संक्रमण के डर से अपने कंधा नहीं दे रहे हैं। इन मजदूरों की मानें तो वह यह काम अपने परिवार को पालने के लिए कर रहे है। तो वहीं, कुछ ऐसा काम शराब के नशे के लिए भी कर रहे हैं।

बगैर मांगे ही लोग एक-दूसरे की मदद कर दिया करते थे, लेकिन अब इस मदद की भी कीमत तय है। सुनने में भले ही थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यह सच है। दरअसल, मजदूर कुछ रुपयों के एवज में शवों को श्मशान घाट तक कंधा दे रहा है और अंतिम संस्कार में भी मदद कर रहे हैं। मजदूरी करने वाले त्रिवेणी का कहना है कि पहले मजदूरी करते थे, लेकिन कोरोना के चलते काम नहीं मिल रहा है। अब मुर्दा घाट तक पहुंचा रहे हैं। किसी को आवश्यकता होती है तो हम चार लोग जाते हैं। 1000 से 1500 रुपए घाट तक पहुंचाने का मिल जाता है। कोरोना से हम लोगों को डर नहीं लगता। मेहनत मजदूरी करते हैं। हम लोग यहीं मैदागिन स्टैंड पर ही रहते हैं। शराब पीकर मस्त रहते हैं। मणिकर्णिका श्मशान घाट पर शव को छोड़कर चले आते हैं।
मजदूर बाबू राम ने बताया कि कोरोना की वजह से उन्हें कहीं भी काम नहीं रहा है। हम लोग शवों को कंधा देना शुरू कर दिए हैं। एक आदमी को 250 से 500 रुपए तक मिल जाता है। प्रत्यक्षदर्शी विशाल चौधरी ने बताया कि मजदूर लोग शवों को घाट तक पहुंचाते हैं। शवों के साथ आए लोग अक्सर यहां गाड़ी से आते हैं। कोरोना की वजह से परिवार के लोग कंधा नहीं देते हैं। तब यही मजदूर मदद करते हैं। 500 से 1000 रुपए तक भी कभी कभी मिल जाता है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र श्मशान पर रोज 100 से 150 शव आते हैं। कोरोना संक्रमितों का शव हरिश्चंद्र घाट पर ही जलता है।
पेट की आग के आगे मजहब की दीवार भी बौनी हो जाती है। ऐसा नहीं है कि शव को कंधा देने वाले सिर्फ हिंदू ही हैं, बल्कि मुसलमान मजदूर भी लगे हुए हैं। बलिया के वाले सलाउद्दीन अंसारी ने बताया कि लेबर का काम करते हैं और शवों को भी कंधा देते हैं। दिन भर में एक-दो शव मिलते हैं। डर तो लगता है, क्योंकि मौत से किसको डर नहीं लगता? लेकिन काम न मिलने पर भूखे प्यासे सोना पड़ता है।












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