UP Varanasi News: काशी में 15 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध, जाने क्यों लेना पड़ा ऐसा फैसला?
UP Varanasi News: काशी के दशाश्वमेध घाट पर रविवार को आगमन संस्था द्वारा 15000 अजन्मी बेटियों का श्राद्ध किया गया। 'अंतिम प्रणाम का दिव्य अनुष्ठान' दशाश्वमेध घाट पर कर्मकांडी ब्राह्मण श्रीनाथ पाठक 'रानी गुरु' के सानिध्य में पं. दिनेश दुबे के आचार्यत्व में हुआ।
श्राद्ध की दृष्टि से त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान दोपहर में शुरू हुआ। श्राद्ध में जौ, चावल और खोवा की पिण्ड बनाकर प्रत्येक अजन्मी बेटी को दान किया गया। संस्था के लोगों ने बताया कि संस्था द्वारा अजन्मी बेटियों के श्राद्ध का यह दसवां वर्ष है।

इससे पूर्व के नौ वर्षों में 67 हजार अजन्मी बेटियों के लिए सविधिक मोक्ष अनुष्ठान करा गया। दसवें वर्ष 15 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध कराया जाना है। इस वर्ष के अनुष्ठान के बाद 10 वर्ष में कुल 82 हजार अजन्मी बेटियों के श्राद्ध का कर्मकांड पूरा हो चुका है।
पिछले नौ वर्षों में 67 हजार अजन्मी बेटियों के लिए विधिवत मोक्ष अनुष्ठान किए चा चुके हैं। इस साल दसवें वर्ष में 15 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध किया गया। इस तरह संस्था द्वारा 10 वर्षों में कुल 82 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध कर्म संपन्न हो चुका है।
जानिए क्यों लिया गया ऐसा फैसला
संस्था के डॉ. संतोष ओझा ने बताया कि 'यह साल 2001 की बात है जब हम आगमन टीम के साथ मिलकर एड्स महामारी पर जन जागरूकता अभियान चलाते थे। उसी दौरान एक दिन हमारी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जिसने बेटे की चाहत में अपनी पत्नी के गर्भ में पल रहे कन्या भ्रूण को मार डाला।'
उन्होंने कहा कि उसके लिए यह एक सामान्य घटना थी लेकिन इस घटना ने ही हमें बेटियों के जन्म से जुड़े मुद्दों पर जनजागरूकता पैदा करने के लिए प्रेरित किया। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए आगमन संस्था एक दशक से अधिक समय से जन जागरूकता अभियान चला रही है।
कहा कि इसके तहत विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये गये। साल 2013 में फिर एक घटना से मुझे कोख में मारी गई बेटियों को मोक्ष दिलाने के लिए प्रेरणा मिली। उसके बाद मेरे मन में विचार आया कि कोख में पल रही बेटियों को बचाने में सफल नहीं हो सका, तो कम से कम उनकी मुक्ति की कामना तो कर ही सकता हूं।
डा. संतोष ओझा बताते हैं कि यहीं से बेटियों के मोक्ष के लिए 'अंतिम प्रणाम का दिव्य अनुष्ठान' कार्यक्रम शुरू हुआ। इस अनुष्ठान के संबंध में काशी के विद्वान एकमत नहीं थे। हमारे परिवार वाले भी किसी अनहोनी, अपशकुन या बाधा से चिंतित थे।
हालांकि श्रेष्ठ विद्वानों से मिलकर, शास्त्रों की जानकारी प्राप्त करके तथा किसी प्रकार परिजनों की नाराजगी एवं सहमति के बाद काशी के दशाश्वमेध घाट पर अनुष्ठान प्रारम्भ किया गया, जो हर साल आयोजित होता चला आ रहा है।
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