उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिला ही तय करेगा सत्ता और विपक्ष की कुर्सी, तीनों सीटों पर इतिहास बदलना मुश्किल

उत्तरकाशी जिले में 3 सीटें,पुरोला,यमुनोत्री और गंगोत्री

देहरादून, 31 जनवरी। उत्तराखंड में सभी 70 सीटों पर 14 फरवरी को मतदान होना है। हर विधानसभा के मतदाता को अपने विधायक का चयन करना है। उत्तराखंड में विधानसभा की शुरूआत उत्तरकाशी जिले से होती है। जहां विधानसभा की 3 सीटें आती है। इनमें पहली पुरोला दूसरी यमुनोत्री और तीसरी सीट गंगोत्री है। तीनों सीटों पर क्या है समीकरण और जनता के बड़े मुद्दे आइए जानने की कोशिश करते हैं।

पुरोला, सुरक्षित सीट- जीतने के बाद बैठना होगा विपक्ष में

पुरोला, सुरक्षित सीट- जीतने के बाद बैठना होगा विपक्ष में

उत्तराखंड की पहली विधानसभा सीट पुरोला सुरक्षित सीट है। जो कि हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटी है। इस सीट के साथ एक अनोखा मिथक जुड़ा है। जिस पार्टी का विधायक पुरोला से चुनकर आया वह पार्टी विपक्ष में बैठी। राज्य गठन के बाद 2002 में यहां पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में भाजपा के मालचंद विधायक चुने गए थे। 2007 में कांग्रेस के राजेश जुवांठा विधायक चुने गए। 2012 में मालचंद दोबारा विधायक चुने गए। 2017 में कांग्रेस के राजकुमार विधायक चुने गए थे। इस बार मालचंद कांग्रेस जबकि भाजपा से दुर्गेशलाल चुनावी मैदान में हैं। पुरोला के इतिहास और यहां के जनता के फीडबैक के आधार पर इस बार पुरोला में भाजपा मजबूत स्थिति में है।

प्रत्याशियों पर एक नजर-

मालचंद, कांग्रेस
पक्ष -सरल स्वभाव, जातिगत राजनीति नहीं
विपक्ष-10 साल विधायक रहे लेकिन कोई बड़ा काम नहीं किया।

दुर्गेश, भाजपा
पक्ष- नया चेहरा, भाजपा और मोदी के चेहरे का लाभ
विपक्ष- क्षेत्रवाद का आरोप, अभी तक कोई चुनाव नहीं जीता

  • समस्या-
  • पुरोला की सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य
  • अस्पताल है डॉक्टर नहीं, विशेषकर महिला डॉक्टर नहीं
  • शिक्षा की दृष्टि से कोई भी प्रशिक्षण सेंटर नहीं है।
  • बाजार में जाम की ​समस्या
  • पर्यटन की अपार संभावनाएं लेकिन कोई पहल नहीं
 यमुनोत्री, पार्टी नहीं प्रत्याशी के चेहरे पर विश्वास

यमुनोत्री, पार्टी नहीं प्रत्याशी के चेहरे पर विश्वास

यमुनोत्री विधानसभा सीट उत्तरकाशी जिले की गंगा और यमुना घाटी को जोड़ती है। इस सीट से एक-एक बार कांग्रेस-भाजपा और दो बार क्षेत्रीय दल ने चुनाव जीता है। ऐसे में यमुनोत्री सीट पर जनता पार्टी नहीं प्रत्याशी को तरजीह देती है। 2002 में यूकेडी, 2007 में कांग्रेस, 2012 में यूकेडी व 2017 में भाजपा से विधायक चुने गए। 2002 और 2012 के चुनाव में यू​केडी के प्रीतम पंवार यहां से विधायक बने। 2007 में कांग्रेस के प्रत्याशी केदार सिंह रावत और 2017 में भाजपा के टिकट पर केदार सिंह ने यह सीट जीती। इस बार यमुनोत्री सीट पर भाजपा से केदार सिंह रावत, कांग्रेस से दीपक बिजल्वाण और निर्दलीय संजय डोभाल के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। अभी तक तीनों प्रत्याशियों में कड़ी टक्कर मानी जा रही है।

एक नजर प्रत्याशियों पर-

केदार सिंह रावत, भाजपा
पक्ष -स्पष्टवादी, स्वच्छ राजनीति
विपक्ष -जनता से संवाद नहीं, जनता से दूरी

दीपक बिजल्वाण, कांग्रेस
पक्ष- युवाओं के बीच पेंठ
विपक्ष-भ्रष्ट्राचार का आरोप


संजय डोभाल, निर्दलीय

पक्ष-स्वच्छ साफ चेहरा, सभी के बीच पंसदीदा चेहरा

विपक्ष- किसी दल से न होना, ​चुनाव न जीतना

  • समस्याएं-
  • यमुनोत्री धाम में सुरक्षा के कार्य।
  • जिला की मांग अब तक पूरी न होना।
गंगोत्री में त्रिकोणीय मुकाबला, ​इतिहास बदलना नहीं आसान

गंगोत्री में त्रिकोणीय मुकाबला, ​इतिहास बदलना नहीं आसान

गंगोत्री विधानसभा सीट मां गंगा के मायके और जिला मुख्यालय का क्षेत्र की सीट है। गंगोत्री सीट के साथ एक खास मिथक जुड़ा है। जिस दल का विधायक चुना गया, राज्य में सरकार उसी दल ने बनाई। 2002 में पहले चुनाव में कांग्रेस के विजयपाल सजवाण ने चुनाव जीता, 2007 में भाजपा के गोपाल रावत विधायक बने। 2012 दोबारा विजय पाल सजवाण और 2017 में दोबारा गोपाल रावत विधायक बने। लेकिन इस बार समीकरण बदल गए हैं। दिवंगत विधायक गोपाल रावत के बाद भाजपा ने सुरेश चौहान पर दांव खेला है। जबकि आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री के चेहरे कर्नल अजय कोठियाल ने भी गंगोत्री से पर्चा भरा है। कांग्रेस की ओर से विजयपाल सजवाण ही चेहरा है। अभी तक त्रिकोणीय मुकाबला तो नजर आ रहा है। लेकिन भाजपा, कांग्रेस में से कोई एक ही बाजी मारेगा ये तय माना जा रहा है।


एक नजर प्रत्याशियों पर-
सुरेश चौहान, भाजपा
पक्ष- जमीनी नेता, स्वच्छ छवि
विपक्ष- नया चेहरा, ज्यादा अनुभव नहीं

विजयपाल सजवाण, कांग्रेस
पक्ष- सरल, व्यवहार कुशल, जनता के बीच रहना
विपक्ष- 10 साल विधायक लेकिन कोई खास उप​लब्धि नहीं

कर्नल अजय कोठियाल, आप
पक्ष- ईमानदार छवि, केदारनाथ पुर्ननिर्माण और युवाओं को रोजगार दिलाने में भूमिका
विपक्ष- पहली बार चुनाव में, अनुभव न होना।

  • समस्याएं-
  • जिला मुख्यालय होने के बाद भी ​स्वास्थ्य की सुविधाएं ना के बराबर।
  • सैनिक और भटवाड़ी में केन्द्रीय विद्यालय की मांग।
  • पर्यटन के क्षेत्र में कोई खास पहल नहीं।

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