उत्तराखंड में सीएम और पूर्व सीएम की हॉट सीट, खटीमा और लालकुंआ, दोनों सीट पर तीसरा फैक्टर हावी
खटीमा से सीएम धामी, लालकुंआ से पूर्व सीएम हरदा मैदान में
देहरादून, 10 फरवरी। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2022 का मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। ऐसे में दोनों सियासी दलों के बड़े चेहरों की किस्मत भी दांव पर लगी है। भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। जबकि कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सबसे बड़ा चेहरा हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की खटीमा सीट और हरीश रावत की लालकुंआ सीट हॉट सीट बन गई है। खास बात ये है कि दोनों सीट पर भाजपा, कांग्रेस के अलावा तीसरा फैक्टर ही हार जीत का कारण बनेगा।

खटीमा-धामी की टक्कर कांग्रेस से, आप बिगाड़ रही समीकरण
सबसे पहले बात मुख्यमंत्री की विधानसभा सीट खटीमा की। खटीमा उत्तराखंड की 70 विधानसभा की 70वीं सीट हैं। लेकिन इस सीट पर सबसे पहले नजरें टिकी हुई हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अपनी ही नहीं भाजपा की अधिकतम सीटें जीतकर अपने नेतृत्व को भी साबित करने की चुनौती है। हालांकि मुख्यमंत्री धामी को उस मिथक को भी गलत साबित करना होगा, जिसके अनुसार उत्तराखंड में अब तक कोई भी बतौर मुख्यमंत्री चुनाव जीतकर नहीं आया। इतना ही नहीं धरातल पर भी धामी की सीट निकलना आसान नहीं लग रही है। टिकट फाइनल होने से पहले भी धामी के खटीमा छोड़ने की खबरें जमकर वायरल हुई। हालांकि धामी ने खटीमा की चुनौती को स्वीकार किया। धामी लगातार दो बार से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस बार धामी हैट्रिक बनाने के साथ ही सीएम कुर्सी को दोबारा पाने वाले पहले सीएम बनाने का इतिहास रचने की कोशिश में लगे हैं। हालांकि ये जीत इतना आसान नजर नहीं लग रही है। जातीय रूप से यहां क्षत्रिय वोटर सबसे ज्यादा और राणा और अल्पसंख्यक वोटरों की भी अपनी भूमिका है। धामी को सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और प्रत्याशी भुवन चंद्र कापड़ी दे रहे हैं। जो कि काफी मजबूत माने जा रहे हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे एसएस कलेर इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला बना रहे हैं। इस सीट पर दो बार कांग्रेस और दो बार भाजपा का कब्जा रहा। 2002 और 2007 में कांग्रेस के गोपाल सिंह राणा विधायक बने जबकि 2012 और 2017 में भाजपा के पुष्कर सिंह धामी जीते।
- खटीमा सीट-
- कुल वोटर-119980
- पुरुष- 60797
- महिलाएं- 59178
लालकुंआ में हरीश रावत की अपनों से ही चुनौती
कांग्रेस की चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की विधानसभा सीट का चयन किसी फिल्मी अंदाज से कम नहीं रहा। पहले रामनगर सीट से टिकट मिलना और उसके बाद अचानक टिकट बदलकर लालकुंआ भेजना हरीश रावत के लिए इस बार बड़ी चुनौती बन गई है। कांग्रेस पार्टी से टिकट मिलने के बाद टिकट कट जाने से नाराज हुईं पूर्व ब्लाक प्रमुख संध्या डालाकोटी ने भी ' महिला के अपमान में संध्या डालाकोटी मैदान में 'के स्लोगन के साथ अपना निर्दलीय नामांकन करके कांग्रेस बागी के रूप में हरीश रावत के सामने चुनौती पेश कर दी। ऐसे में हरीश रावत के सामने भाजपा से बड़ी चुनौती अपने परिवार को संभालने में आ रही है। लालकुंआ से संध्या डालाकोटी को टिकट देना और फिर काट देना हरीश रावत के लिए सबसे बड़ा चुनौती बन गई है। जो कि इस सीट पर हरीश रावत की किस्मत का फैसला करने जा रही है। हरीश रावत के लिए राहत की बात ये है कि पुराने दिग्गज हरीश दुर्गापाल और हरेन्द्र बोरा इस समय रावत के साथ कदम से कदम मिला रहे हैं। दोनों बतौर निर्दलीय यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। दुर्गापाल 2012 में 25 हजार से अधिक वोट लेकर यहां निर्दलीय चुनाव जीते थे। 2017 में दुर्गापाल को टिकट मिलने पर हरेन्द्र बोरा ने बगावत की और उन्हें 14,709 से अधिक वोट मिले थे। लेकिन हरीश रावत को इस बात का एहसास है कि लालकुंआ जीतना उनके लिए आसान नहीं है, इसकी वजह से हरीश रावत पिछले लंबे समय से लालकुंआ में ही ज्यादा समय बिता रहे हैं। हरीश रावत के सामने निर्दलीय के अलावा भाजपा के मजबूत दावेदार हैं। भाजपा ने अपने सिटिंग विधायक नवीन दुमका का टिकट काटकर बीजेपी से निष्कासित रहे मोहन बिष्ट पर भरोसा जताया। जो कि काफी मजबूत बताए जा रहे हैं। लालकुंआ सीट पर करीब 42 परसेंट ब्राह्मण मतदाता हैं, ठाकुर मतदाताओं की संख्या करीब 33 परसेंट है। हालांकि एससी और अल्पसंख्यक मतदाता ही यहां हार जीत तय करेंगे। लालकुंआ सीट पर एक बार निर्दलीय और एक बार भाजपा का कब्जा रहा है।
2012 में हरीश चंद्र दुर्गापाल ने निर्दलीय चुनाव जीता।
2017 में भाजपा के नवीन चंद्र दुम्का यहां से विधायक बने।












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