कानून से लेकर कनेक्टिविटी तक, उत्तराखंड में स्थिर सरकार ने 5 सालों में कितनी बदली राज्य की तस्वीर?

उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता की चर्चा में रही। मुख्यमंत्री बदलते रहे, प्राथमिकताएँ बदलती रहीं और कई योजनाएँ फाइलों से बाहर निकलने में वर्षों लगा देती थीं। पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर कुछ बदली है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार का जोर बड़े नीतिगत फैसलों को लागू करने और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने पर रहा है। सरकार का दावा है कि इसी स्थिरता ने उसे ऐसे फैसले लेने का अवसर दिया, जिन पर लंबे समय से चर्चा तो होती थी, लेकिन अमल नहीं हो पाया था।

इसी दौर में राज्य ने बुनियादी ढाँचे, सड़क और रेल संपर्क, स्वास्थ्य, पर्यटन, डिजिटल प्रशासन और सामाजिक कल्याण से जुड़े कई क्षेत्रों में नई पहलें शुरू कीं। सरकार इन्हें उत्तराखंड के दीर्घकालिक विकास की दिशा में उठाए गए कदम बताती है।

Uttarakhand pushkar singh dhami government

यूसीसी: लंबे विमर्श के बाद एक बड़ा कदम

धामी सरकार के कार्यकाल का सबसे चर्चित फैसला समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) रहा। 27 जनवरी 2025 को इसे लागू करने के साथ उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बन गया, जहाँ विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू हुई।

सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य नागरिकों के लिए समान कानूनी ढाँचा उपलब्ध कराना और महिलाओं के अधिकारों को अधिक मजबूत बनाना है। सरकार के अनुसार, बाल विवाह, बहुविवाह और तीन तलाक जैसी प्रथाओं से जुड़े प्रश्नों पर भी यह कानून स्पष्ट व्यवस्था प्रदान करता है। वहीं, इस कानून को लेकर देशभर में संवैधानिक, सामाजिक और कानूनी स्तर पर बहस भी हुई, जिससे यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।

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भर्ती परीक्षाओं में सख्ती: नकल माफिया पर कड़ा संदेश

उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामलों ने युवाओं के भरोसे को झटका दिया था। इसके बाद सरकार ने उत्तराखंड लोक परीक्षाएँ (भर्ती में अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2023 लागू किया। सरकार के अनुसार, यह देश के सबसे कड़े एंटी-कॉपीगिं कानूनों में शामिल है। संगठित नकल गिरोह, कोचिंग संस्थान, प्रिंटिंग प्रेस और अन्य संबंधित संस्थाओं के खिलाफ उम्रकैद और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वाले अभ्यर्थियों के लिए जेल, आर्थिक दंड और प्रतियोगी परीक्षाओं से प्रतिबंध जैसी सजा का भी प्रावधान है। सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि मेहनत से तैयारी करने वाले लाखों युवाओं का विश्वास वापस जीतना है।

कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति पर नया जोर

सरकार ने उत्तराखंड लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली अध्यादेश, 2024 भी लागू किया। इसके तहत दंगे, हिंसक प्रदर्शन, बंद या हड़ताल के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से क्षतिपूर्ति वसूलने का प्रावधान किया गया है।

इस कानून के तहत पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा नियंत्रण अभियान में हुए खर्च की भी वसूली की जा सकती है। दावों के निपटारे के लिए अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी की अध्यक्षता में क्लेम ट्रिब्यूनल गठित करने का प्रावधान किया गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

धर्मांतरण कानून में संशोधन

अगस्त 2024 में राज्य सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून में संशोधन करते हुए सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और अन्य डिजिटल माध्यमों को भी इसके दायरे में शामिल किया। सरकार का कहना है कि यह कदम ऑनलाइन माध्यमों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए उठाया गया।

संशोधन के बाद कुछ मामलों में सजा की अवधि बढ़ाई गई और जिला मजिस्ट्रेट को अतिरिक्त अधिकार दिए गए। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य धोखाधड़ी, दबाव या लालच के जरिए होने वाले अवैध धर्मांतरण को रोकना और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

अतिक्रमण हटाने का अभियान

इसी अवधि में सरकारी और वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का अभियान भी तेज हुआ। सरकार के अनुसार, इस दौरान बड़ी मात्रा में सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की गई।
प्रशासन को भूमि खरीद-फरोख्त की निगरानी और नए बसने वालों के सत्यापन के निर्देश भी दिए गए हैं। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य भूमि अभिलेखों में पारदर्शिता बढ़ाना और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

इन फैसलों पर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। समर्थक इन्हें प्रशासनिक सुधार और कानून के सख्त अनुपालन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हैं, जबकि आलोचकों ने कुछ प्रावधानों पर सवाल भी उठाए हैं। इतना तय है कि इन नीतिगत कदमों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है।

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