पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे भाजपा के 5 गणित समझिए
देहरादून, 4 जुलाई: उत्तराखंड भाजपा में 45 वर्षीय पुष्कर सिंह धामी को सत्ता की कमान सौंपने के फैसले से थोड़ी असहजता जरूर दिख रही है, लेकिन पार्टी ने काफी सोच-समझकर चुनाव से ठीक पहले यह सिसासी दांव खेला है। चार महीने पहले तीरथ सिंह रावत को सत्ता की बागडोर सौंपने के बाद नए फैसले पर सवाल भले ही उठ रहे हों, लेकिन धामी पर बाजी लगाकर पार्टी ने प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की खेमेबाजी से निपटने की एक कोशिश जरूर की ही है, लगे हाथ विपक्षी कांग्रेस की राजनीति को भी हिलाने की चाल चल दी है। मोटे तौर पर देखें तो भाजपा नेतृत्व के इस फैसले के पीछे पांच तरह के गणित लग रहे हैं।
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गढ़वाल और कुमाऊं की सियासत में बैलेंस
जानकारों की मानें तो पार्टी ने 21 साल के उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री के तौर पर पुष्कर सिंह धानी का नाम आगे बढ़ाकर प्रदेश की राजनीति के सबसे अहम फैक्टर गढ़वाल-कुमाऊं के बीच बैलेंस स्थापित करने की कोशिश की है। क्योंकि, निवर्तमान सीएम तीरथ सिंह रावत और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन सिंह कौशिक दोनों गढ़वाल से आते हैं। ऐसे में बीजेपी ने मुख्यमंत्री का पद कुमाऊं को देकर दोनों जगह अपनी राजनीतिक गोटी को सेट करने का प्रयास किया है। यह कुमाऊं के लोगों के लिए चुनाव से पहले एक बड़ा संदेश है, जिस क्षेत्र की 29 सीटों में से 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 23 सीटें जीती थी।

ठाकुर-ब्राह्मण की राजनीति में बैलेंस
उत्तरखंड की राजनीति में एक और फैक्टर महत्वपूर्ण है। ठाकुर और ब्राह्मण की राजनीति। प्रदेश अध्यक्ष की कमान पहले से ही कौशिक के पास है, जो कि ब्राह्मण हैं। इसलिए धामी को सीएम बनाकर भाजपा ने एक राजपूत की जगह सिर्फ दूसरे राजपूत का चेहरा भर बदला है। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि 'धामी को चुनने के पीछे निश्चित रूप से इस बात को ध्यान में रखा गया है कि वो ठाकुर हैं, जिससे ठाकुर मतदाताओं का बड़ा हिस्सा चुनाव से पहले नाखुश ना हो जाएं...' क्योंकि, तीरथ सिंह रावत भी ठाकुर हैं।

भविष्य के लिए युवा नेतृत्व पर दांव
धामी को चेहरा बनाकर बीजेपी ने न केवल आज की राजनीति को साधने की कोशिश की है, बल्कि उसने आने वाले तीन दशकों की राजनीति का एक खाका तैयार करने की कोशिश की है। 16 सितंबर, 1975 को पिथौरागढ़ जिले के कनालीछीना गांव में जन्मे पुष्कर सिंह धामी को उनकी पार्टी ने राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर चुना है। भाजपा ने राजनीति के लिए मोटे तौर पर 75 वर्ष की उम्र की जो एक सीमा तय कर रखी है, उसके मुताबिक धामी के पास अभी कम से कम 30 वर्षों का सियासी करियर बचा हुआ है। ऐसे में वो प्रदेश में पार्टी को लंबे समय तक नेतृत्व दे सकते हैं और इस एक स्टैंड से पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं की गुटबाजी से निपटने की भी चाल चली है। धामी शुरू में विधार्थी परिषद से भी जुड़े रह चुके हैं और भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं, इसलिए बीजेपो को उम्मीद है कि युवा वोटरों में उनकी अपील काफी मायने रखेगी।

कांग्रेस की राजनीति की धार कुंद करने की भी कोशिश
2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ लड़कर राज्य की 70 में से 57 सीटें जीत ली थीं। उस चुनाव में पूर्व सीएम हरीश सिंह रावत कांग्रेस के चेहरा थे और इस समय भी वही प्रदेश में पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। कांग्रेस की एक और कद्दावर नेता इंदिरा हृदयेश का पिछले महीने ही निधन हो चुका है। ये दोनों नेता कुमाऊं क्षेत्र से ही आते हैं, जहां से धामी आते हैं। वो ऊधम सिंह नगर की खटीमा विधानसभा सीट से लगातार दो बार चुनाव जीतकर आए हैं। इसलिए, जिस कुमाऊं मंडल में अबकी बार कांग्रेस भाजपा को घेरने की तैयारी में थी, वहां पार्टी ने उसके खिलाफ ऐसा तीर मारा है कि कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से दुरुस्त करनी पड़ेगी।

सेना से जुड़ा पारिवारिक बैकग्राउंड
उत्तराखंड देश का एक सीमावर्ती राज्य है, जहां के अधिकतर युवाओं के लिए सेना में जाना पहली पसंद होती है। इस राज्य में सेना के बैकग्राउंड से जुड़े परिवारों का अपना ही सम्मान है। गौर फरमाइए कि सीएम के तौर पर नाम घोषित होने के बाद धामी ने मीडिया से अपनी पहली ही टिप्पणी में क्या कहा है, 'पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता हूं, एक सैनिक का बेटा हूं और पिथौरागढ़ के दूर-दराज बॉर्डर इलाके में पैदा हुआ हूं।' यही नहीं, धामी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी आशीर्वाद प्राप्त है और पूर्व सीएम और महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की नजदीकियों का भी फायदा मिलने की उम्मीद है। दिलचस्प तथ्य ये है कि कोश्यारी भी कुमाऊं के ही बागेश्वर से आते हैं।
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