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मछलियोंं को पकड़ने के लिए अगलाड़ नदी में उतरने की परंपरा, जानिए क्यों खास है जौनपुर का प्रसिद्ध मौण मेला

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर और परंपरा की अपनी खास पहचान है। ​जो कि यहां के लोगों को सबसे अलग बनाती है। जौनपुर क्षेत्र का प्रसिद्ध मौण मेला भी अपनी खास पहचान बनाता है। इस मेले में सभी लोग नदी में उतरकर मछलियां पकड़कर परंपरा को निभाते हैं। मेले में ढोल-दमाऊ की थाप पर ग्रामीणों ने पारंपरिक नृत्य भी किया।

अगलाड़ नदी में मनाया जाने वाला यह मौण मेला लगभग 159 साल पुराना है। इतिहासकारों का मानना है कि यह मौण मेला साल 1866 में राजशाही काल में शुरू हुआ था। राजशाही काल में टिहरी नरेश मौण मेले में मौजूद रहते थे। प्रत्येक साल जून के आखिरी हफ्ते में अगलाड़ नदी में मछली पकड़ने का सामूहिक त्योहार मनाया जाता रहा है।

tradition entering Aglad river catch fish know why famous Maun fair Jaunpur special

मेले में यमुना घाटी, अगलाड़ घाटी और भद्री घाटियों के दर्जनों गांवों के साथ ही समीपवर्ती जौनसार के अलावा मसूरी व विकासनगर के लोग शामिल होते हैं। लालूर पट्टी खैराड़, नैनगांव, मरोड़, मताली, मुनोग, कैथ और भूटगांव के ग्रामीण टिमरू या तिमूर के पाउडर लेकर ढोल-दमाऊं के साथ अगलाड़ नदी के मौण कोट नामक स्थान पर पहुंचे। जल देवता की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ टिमरू पाउडर से सभी पांतीदारों का टीका किया गया। फिर टिमरू पाउडर नदी में डाला गया। इसके बाद ग्रामीण मछलियां पकड़ने नदी में उतरे।

मौणकोट से लेकर अगलाड़ व यमुना नदी के संगम स्थल तक करीब 4 किमी क्षेत्र में लोगों ने मछलियां पकड़ी। हजारों ग्रामीणों और पर्यटकों की मौजूदगी में यह मेला न केवल एक पारंपरिक मछली शिकार उत्सव बना, बल्कि यह सामुदायिक एकता, लोक संस्कृति और पर्यावरणीय चेतना का भी संदेश देता नजर आया।

स्थानीय बुजुर्गों और लोककथाओं के अनुसार, यह मेला जौनपुर क्षेत्र की जनजातीय संस्कृति से जुड़ा है। प्राचीन काल में जब लोग नदी और नालों पर ही अपने भोजन व जल स्रोत के लिए निर्भर रहते थे, तब सामूहिक रूप से मछलियों के शिकार की यह परंपरा शुरू हुई थी। यह परंपरा समय के साथ सामूहिक पर्व का रूप लेती गई। जो हर साल वर्षा ऋतु के आगमन से पहले यह उत्सव मनाया जाने लगा।

इस मेले में मछलियों को पकड़ने के लिए कोई आधुनिक उपकरण नहीं, बल्कि स्थानीय जड़ी-बूटी टिमरू का इस्तेमाल किया जाता है। इस पौधे की पत्तियों और टहनियों को पीसकर उसका पाउडर नदी में डाला जाता है, जिससे मछलियां कुछ देर के लिए बेहोश हो जाती हैं। इसके बाद उन्हें आसानी से पकड़ लिया जाता है।

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