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Swachh Survekshan 2024-25 के नतीजे घोषित, जानिए उत्तराखंड का कैसा रहा प्रदर्शन, शहरों की क्या है रैंक

Swachh Survekshan 2024-25 स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 के नतीजे घोषित कर दिए गए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 के पुरस्कार प्रदान किए। उत्तराखंड के लालकुआं नगर को "प्रोमिसिंग स्वच्छ शहर - राज्य श्रेणी" में स्थान मिला है। वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण में देहरादून नगर निगम को 62 वीं रैंक मिली।

पिथौरागढ़ की 177 रैंक, कोटद्वार की 232, हरिद्वार की 363, अल्मोड़ा की 907, हल्द्वानी की 291, कोटद्वार की 232, अल्मोड़ा की 907 रैंक आई। हरबर्टपुर नगर पालिका खुले में शौच मुक्त भी नहीं हो पाई। स्वच्छ भारत मिशन के दस वर्ष पूर्ण होने के बाद भी उत्तराखंड एक भी प्रमुख पुरस्कार श्रेणी में स्थान नहीं बना सका है।

Swachh Survekshan 2024-25 results declared know how Uttarakhand performed what rank cities

देहरादून स्थित एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने बताया कि कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य लगातार राष्ट्रीय रैंकिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि उत्तराखंड लगातार गायब है। यह किसी एक शहर की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के सिस्टम की उदासीनता और राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्राथमिकता की कमी का परिणाम है।

उन्होंन कहा कि स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 के तहत देशभर के शहरों को पाँच जनसंख्या श्रेणियों में विभाजित कर सम्मानित किया गया जिसमे 10 लाख से अधिक, 3-10 लाख, 50,000-3 लाख, 20,000-50,000 और 20,000 से कम जनसंख्या वाले शहर शामिल हुए। उन्होंने दुख जताया कि जहां इंदौर, सूरत, नोएडा, चंडीगढ़, लखनऊ, उज्जैन, मैसूर, अंबिकापुर, तिरुपति और लोनावाला जैसे कई अन्य शहर लगातार मिसाल पेश कर रहे हैं, वहीं देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, ऋषिकेश, हल्द्वानी और उत्तराखंड के अन्य सभी शहर लगातार सूची से बाहर हैं।

एसडीसी फाउंडेशन पिछले कई वर्षों से स्वच्छ सर्वेक्षण के नतीजों का विश्लेषण उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में कर रहा है। अनूप नौटियाल ने कहा की हमारे बड़े शहर जो 3 से 10 लाख जनसंख्या की श्रेणी में आते हैं लगातार असफल हो रहे हैं, तो कम से कम राज्य को 50,000-3 लाख, 20,000-50,000 या 20,000 से कम जनसंख्या वाले शहरों में एक मॉडल आदर्श स्वच्छ नगर विकसित करने का गंभीर प्रयास करना चाहिए।

इस समन्वय और जवाबदेही के संकट को दूर करने के लिए उन्होंने एक स्वतंत्र "वेस्ट मैनेजमेंट कमीशन (कचरा प्रबंधन आयोग)" गठित करने की मांग को फिर दोहराया। उन्होंने कहा की समग्र कचरा प्रबंधन किसी एक विभाग का काम नहीं है। इसमें शहरी निकाय, शहरी विकास विभाग, पंचायती राज, वन विभाग, पर्यटन, पेयजल निगम, जल संस्थान और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित कई विभाग शामिल हैं। भारत सरकार ने भी 2016 में प्लास्टिक, ठोस कचरा, ई-कचरा, बायोमेडिकल, खतरनाक और निर्माण व ध्वस्तीकरण कचरे को लेकर छह अलग अलग कानून बनाए थे।

अनूप ने मांग की की जब उत्तराखंड राज्य में पलायन आयोग बन सकता है, तो राज्य में वेस्ट मैनेजमेंट कमीशन क्यों नहीं बन सकता? अनूप ने दोहराया कि कचरा प्रबंधन कोई हल्का विषय नहीं है। यह उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य के लिए सबसे जटिल, गंभीर और प्रभावशाली मुद्दों में से एक है। जब तक हम अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं में संस्थागत और व्यापक सुधार नहीं लाएंगे, तब तक हमारे शहर और गाँव राष्ट्रीय मानकों से पिछड़ते रहेंगे और आम नागरिकों और पर्यटकों को इसकी कीमत बीमारियों, पर्यावरण क्षरण, आर्थिक अवसरों की कमी और प्रशासनिक उदासीनता के रूप में चुकानी पड़ेगी," उन्होंने कहा।

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